Wednesday, October 11, 2023

श्राद्ध के प्रकार
१. आन्तरिक श्राद्ध-(आदरणीय कृपाशंकर मुद्गल जी से) इसमें स्थूल तत्त्वों का क्रमशः सूक्ष्म तत्त्वों में लय होता है। भगवान् के परम धाम जाने पर युधिष्ठिर द्वारा साधना क्रम-वाक् की मन में आहुति, मन की प्राण में, प्राण की अपान में, उत्सर्ग सहित अपान की मृत्यु में, मृत्यु की पञ्चत्व में, पञ्चत्वकी त्रित्व में, त्रित्व की एकत्व में, आत्मा की आहुति अव्यय में की।
वाचं जुहाव मनसि तत्प्राणे इतरे च तं।
मृत्यावपानं सोत्सर्गं तं पञ्चत्वेह्यजोहवीत्॥४१॥
त्रित्वे हुत्वाथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः।
सर्वमात्मन्यजुहवीद् ब्रह्मण्यात्मानमव्यये॥४२॥
(भागवत पुराण, १/१५/४१-४२)
हर चक्र से क्रमशः उत्थान का प्रतीक है, दूर्वा जो हर काण्ड से बढ़ती है। दूर्वा दान का मन्त्र है-
काण्डात् काण्डात् प्ररोहन्ति परुषः परुषस्परि। एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्रेण शतेन च॥ (पुरुष सूक्त, वाज. यजु, १३/२०)
इसका आरम्भ मूलाधार के अन्नमय कोष से होता है-
तदन्नेनातिरोहति (पुरुष सूक्त, २)
अन्नमय कोष अर्थात् मूलाधार के भूमि तत्त्व से ऊपर क्रमशः जल, अग्नि, वायु, आकाश और मन तत्त्व वाले चक्रों को पार परने पर पराशक्ति कुण्डलिनी सहस्रार में परमेश्वर के साथ विहार करती है-
महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं, स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्त्वा कुलपथं, सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसि॥
(सौन्दर्य लहरी, ९) 
२. पार्वण श्राद्ध- प्रतिवर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष में सभी पितरों का श्राद्ध किया जाता है। अमावास्या के दिन ज्ञात अज्ञात सभी पितरों का श्राद्ध होता है। माता-पिताका श्राद्ध उनकि मृत्यु तिथि के अनुसार होगा। उनका वार्षिक श्राद्ध भी मृत्यु की मास-तिथि के अनुसार होगा। ५ दैनिक महायज्ञों में एक पितृ यज्ञ है जिसमें पितरों को दैनिक जल द्वारा तर्पण करते हैं।
३. एकोद्दिष्ट-दशगात्र-किसी एक व्यक्ति के लिए किया जाता है। सृष्टि का आरम्भ १० सर्गों में हुआ-१ अव्यक्त से ९ व्यक्त सर्ग। इनको ब्रह्मा का दिन कहा गया है-अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वे प्रभवन्त्यहरागमे। (गीता, ८/१८)। वेद में निर्माण काल को रात्रि कहा है। शान्त स्थिति में ही गर्भ में निर्माण कार्य होता है। अतः गर्भ धारण करने वाली देवी की पूजा रात्रि में होती है।
श्रीः वै दशमम् अहः (ऐतरेय ब्राह्मण, ५/२२)
मितमेव देवकर्म्म यद्दशममहः (कौषीतकि ब्राह्मण, २७/१)
अथ यद्दशरात्रं उपयन्ति। विश्वानेव देवान् देवतां यजन्ते (शतपथ ब्राह्मण, १२/१/३/१७)
मनुष्य का गर्भ में निर्माण चान्द्र मण्डल (चन्द्र कक्षा का गोल) में भृगु (सूर्य आकर्षण द्वारा ब्रह्माण्ड का सोम) तथा अंगिरा (सूर्य से प्रकाश विकिरण-अंगारा) के मिलन से होता है।
भृगूणाम् अङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम्॥ (वाज. यजु, १/१८)
इत्येतद् वै तेजिष्ठं तेजो यद् भृगु-अङ्गिरसाम् (शतपथ ब्राह्मण, १/२/१/१३)
अथ नयन समुत्थं ज्योतिरत्रेरिवद्यौः सुरसरिदिव तेजो वह्निनिष्ठ्यूतमैशम्।
नरपतिकुलभूत्यै गर्भमाधत्त राज्ञी गुरुभिरभिनिविष्टं लोकपालानुभावैः॥ (रघुवंश २/७५)  
(नयन = सूर्य रूप चक्षु, समुत्थ ज्योति = अंगिरा, सुरसरि या आकाशगंगा का तेज = सोम)
अतः मनुष्य का जन्म चन्द्र की १० परिक्रमा (२७३ दिन में होता है। प्रेत शरीर चान्द्र लोक (चन्द्र माण्डला का बाह्य भाग) का है। उसका जन्म पृथ्वी के १० अक्ष भ्रमण (दिन) में होता है। १० दिन में प्रेत शरीर के निर्माण को दशगात्र कहते हैं। उसके बाद ११वें दिन श्राद्ध होता है। किन्तु अशौच १३ दिन रहता है। १ वर्ष में चन्द्र की १३ परिक्रमा (१२ तिथि चक्र सूर्य तुलना में) के प्रतीक १३ दिन हैं। महाभारत में बहुत बड़ा नर संहार होने के कारण ३० दिन का अशौच पालन हुआ था। 
४. एकोद्दिष्ट के भेद-
(१) विष्णु के ३ पद और परम पद-यह मुझे मुंगेर के एक विद्वान् महापात्र ने १९९९ ई. में बड़े भाई के श्राद्ध के समय बताया था। पण्डित ठीक से मन्त्र नहीं पढ़ पा रहे थे, तो उन्होंने कहा कि अशुद्ध उच्चारण द्वारा वेद का अपमान नहीं करें और पण्डित के बदले स्वयं पाठ किया। उसकी दक्षिणा भी पण्डित को ही दी। उसके बाद चर्चा में उन्होंने २ वैदिक मन्त्रों का अर्थ बताया। गुरु दक्षिणा रूप में उन्होंने महापात्र का अर्थ पूछा।
श्राद्ध में २ वैदिक मन्त्र श्राद्ध के भेद बताते हैं।
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूळ्हमस्य पांसुरे॥१७॥
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥२०॥
(ऋक्, १/२२/१७, २०)
ब्रह्म का चेतन या क्रिया रूप विष्णु है। उस परमात्मा की प्रतिमा मनुष्य आत्मा है। दोनों की गति एक प्रकार की है। विष्णु का प्रत्यक्ष रूप सूर्य है, जो प्रथम सविता या पिता है। उसका पिता ब्रह्माण्ड है, और उसका भी अन्तिम जनक परम-पिता या ब्रह्म है। इसे गायत्री मन्त्र में तत्-सविता कहा गया है। दृश्य सविता सूर्य है।
सूर्य के ३ पद इस पांसु (धूलि समूह, यह सौर मण्डल) में हैं। ताप क्षेत्र पृथ्वी तक अर्थात् सूर्य से १०० सूर्य व्यास दूर है। यहां सूर्य का रुद्र तेज शान्त होता है, अतः १०० को शत (शान्त) कहते हैं। १०० वर्ष बाद मनुष्य भी शान्त हो जाता है। 
तद्यदेतँ शतशीर्षाणँ रुद्रमेतेनाशमयंस्तस्माच्छतशीर्ष रुद्र शमनीयँ शतशीर्ष रुद्र शमनीयँ ह वै तच्छत रुद्रियमित्याचक्षते परोऽक्षम्। (शतपथ ब्राह्मण, ९/१/१/७)
शतयोजने ह वा एष (आदित्यः) इतस्तपति। (कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद्, ८/३)
सहस्र योजन (सूर्य व्यास) तक या शनि कक्षा तक तेज क्षेत्र है। यह शिवतर या अधिक शान्त है। सूर्य अक्ष (आंख, धुरी) होने से इसे सहस्राक्ष भी कहा गया है। यहां तक के ग्रहों का प्रभाव पड़ता है। आधुनिक गणित में भी पृथ्वी की कक्षा गति पर शनि तक के ग्रहों द्वारा विचलन की ही गणना होती है। इन ग्रहों के संयुक्त चक्र को सूर्य रथ का चक्र कहा गया है। इसका मान ४३,२०,००० वर्ष को ज्योतिष का युग कहा है। 
युक्ताह्यस्य (इन्द्रस्य) हरयः शतादशेति। (ऋक्, ६/४७/१८)
सहस्रं हैत आदित्यस्य रश्मयः (हरयः = रश्मयः)। (जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण, १/४४/५)
हे सूर्य सहस्रांशो तेजो राशि जगत्पते (स्तोत्र)
उसके बाद सौर मण्डल की सीमा तक सूर्य का तृतीय पद है। वहां तक सूर्य का प्रकाश ब्रह्माण्ड से अधिक है। 
त्रिंशद् धाम वि राजति वाक् पतङ्गाय धीयते। प्रति वस्तो रहद्युभिः॥ (ऋक्, १०/१८९/३)
नमः शिवाय च शिवतराय च (वाज.सं. १६/४१, तैत्तिरीय सं., ४/५/८/१, मैत्रायणी सं. १२६/५)
यो वः शिवतमो रसः(ऋक्, १०/९/२, अथर्व, १०/५/१७, वाज. सं. ११/५१) 
सूर्य प्रकाश की अन्तिम सीमा परम पद है, जहां तक सूर्य विन्दु रूप में दीखता है। इसे चक्षु (सूर्य) का आतत (विस्तार) कहा है। सूर्य सिद्धान्त में ब्रह्माण्डकी परिभाषा है कि वहां तक सूर्य किरणों का प्रसार या व्याप्ति है। 
आकाशकक्षा सा ज्ञेया करव्याप्तिस्तथा रवेः॥८१॥
ख व्योम ख-त्रय ख-सागर षट्क नाग व्योमाष्ट शून्य यम-रूप नगाष्ट चन्द्राः।
ब्रह्माण्ड सम्पुटपरिभ्रमणं समन्तादभ्यन्तरा दिनकरस्य कर प्रसाराः॥ (सूर्य सिद्धान्त, १२/८१, ९०)
यहां शिव का रूप महोदेव (ऋक्, ) या सदाशिव है।
महोदेवो मर्त्यां आविवेश॥ (ऋक्, ४/५८/३)
सदाशिवाय विद्महे, सहस्राक्षाय धीमहि तन्नो साम्बः प्रचोदयात्। (वनदुर्गा उपनिषद्, १४१)
(२) मासिक श्राद्ध-पृथ्वी से मनुष्य की आत्मा निकलने पर वह प्रेत हुआ। प्रेत = प्र + इतः, अर्थात् इह लोक (पृथ्वी) से प्रयाण हुआ।
पृथ्वी से चन्द्र मण्डल की गति एक वर्ष में पूर्ण होती है, प्रति मास वह थोड़ा थोड़ा आगे बढ़ता है। इसके लिए मृत्यु तिथि पर हर मास मासिक श्राद्ध होता है। 
चान्द्र मण्डल के बाह्य भाग में पितर रहते हैं। 
विधूर्ध्वभागे पितरो वसन्ति (सिद्धान्त शिरोमणि, गोलाध्याय, त्रि, १३)
पितृलोकः सोमः (कौषीतकि ब्राह्मण, १६/५)
मासि पितृभ्यः क्रियते (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/४/९/१)
मासा वै पितरो बर्हिषदः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/६/८/३, ३/३/६/४)
ऋक् के सूक्त (१०/१५) में पितरों का विशद् वर्णन है।
उदीरतां अवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः॥१॥
नीचे या भूमि के (अवर) पितर हैं, वह दूर हट जायें (उदीरताम्)। मध्यम या वायु के पितर थोड़ा और ऊपर जायें (अन्तरिक्ष गति में चन्द्र तक पहुंचे)।
पितरों को पिण्ड देते समय यह मन्त्र पढ़ते है। जिस पितर के लिए पिण्ड है, वह शान्ति से ग्रहण करे, बाकी हट जायें। भूमि पूजन के बाद भी ऐसा ही मन्त्र पढ़ा जाता है-
अपसर्पन्तु ते भूताः ये भूताः भूतले स्थिताः।
वैदिक मन्त्र भोजपुरी में गाली रूप में प्रचलित है, अर्थात् जीवित् व्यक्ति को प्रेत कह रहे हैं।
उदीरताम् = उधिया जा। उत्परासः = ऊफर पर।
(३) वार्षिक श्राद्ध-चान्द्र मण्डल में महान् आत्मा पृथ्वी के आकर्षण से बन्ध कर सूर्य की वार्षिक परिक्रमा कर रहा है। इसके लिए वार्षिक श्राद्ध होता है।
चान्द्र मण्डल में सोम युक्त महान् आत्मा है। उसका एक अंश सूर्य किरणों के दबाव से धीरे धीरे सौर मण्डल से बाहर निकलता है। रास्ते में मंगल (सेनापति रूप) के २ उपग्रह २ कुत्ते हैं। अवान्तर ग्रहों को देव सेना कहा गया है। उसके बाद वे शनि अर्थात् यम लोक तक पहुंचते हैं। शनि के वलय भाग को ३ भागों में बांटा गया है-शनि गैसीय पिण्ड है, उसकी सीमा पर प्रथम जल जैसा प्रवाह उदन्वती है, मध्य में अन्न (पीलु) के कणों का प्रवाह पीलुमती, आकाश (द्यौ) के निकट प्रद्यौ (paradise) है।
सूर्यं चक्षुषा गच्छ वातमात्मना दिवं च गच्छ पृथिवीं च धर्मभिः॥७॥
यास्ते शिवास्तन्वो जातवेदस्ताभिर्वहैनं सुकृतामु लोकम्॥८॥
अति द्रव श्वानौ सारमेयौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पथा॥११॥
या ते श्वानौ यम रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिषदि नृचक्षसा॥१२॥
उत् त्वां वहन्तु मरुत उदवाहा उदप्रुतः॥२२॥
ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिताः। 
सर्वान् तानग्न आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे॥३४॥
(४ प्रकार की अन्त्येष्टि-खात या गड्ढे में दबाना, परोप्ता (ऊपर रखे गये-पारसी विधि), दग्ध (दाह संस्कार), उद्धित (समुद्र में मृत्यु होने पर जल में फेंकने के अतिरिक्त अन्य उपाय नहीं है)
उदन्वती द्यौरवमापीलुमतीति मध्यमा। 
तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितर आसते॥४८॥
ये नः पितुः पितरो ये पितामहा य आविविशुरुर्वन्तरिक्षम्।
य आक्षियन्ति पृथिवीमुत द्यां तेभ्यः पितृभ्यो नमसा विधेम॥४९॥ अथर्व वेद (१८/२)
(४) गया श्राद्ध-आत्मा परमात्मा या विष्णु का रूप है, अतः इसका वाहन भी गरुड़ रूप है जिसकी गति के लिए गरुड़ पुराण का पाठ है। सूर्य किरण का दबाव गौ पुच्छ है। यहां गौ का अर्थ किरण है।
गय प्राण शनि तक जाने पर उसका गया श्राद्ध होता है जो सूर्य की उत्तर गति की सीमा कर्क रेखा की मध्यम स्थिति पर है। अभी कर्क रेखा थोड़ा दक्षिण हट गयी है। गय प्राण इसके बाहर के लोक में जाने परया सौर मण्डल के बाहर जाने पर उसका ब्रह्म कपाल (ब्रह्माण्ड) में जाने का श्राद्ध होता है। यह बद्रीनाथ में होता है जो सौर मण्डल के ३० धाम ( पृथ्वी सतह पर ३० अक्षांश) की प्रतिमा है।
स यदाह गयो असीति सोमं या एतदाहैष ह वै चन्द्रमाभूत्वा सर्वान् लोकान् गच्छति तद् यद् गच्छति तस्माद् गयः तद् गयस्य गयत्वम् (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, ५/१४)
प्राणा वै गयाः (शतपथ ब्राह्मण, १४/८/१५/७)
गयस्फानः प्रतरणः सुवीर इति गवां नः स्फावयिता प्रतारयितैधीत्याह (ऐतरेय ब्राह्मण, १/१३)
गयस्फानः प्रतरणः सुवीरो अवीरहा प्र चरा सोम दुर्यान्॥ (ऋक्, १/९१/१९)
५. महापात्र-पात्र का अर्थ बर्तन है। सबसे बहुमूल्य वस्तु मनुष्य मस्तिष्क है। उसका पात्र अर्थात् सिर महापात्र है। अतः किसी विभाग के मुख्य को भी उसका सिर या महापात्र कहते हैं। कथा सरित्सागर में एक कथा है कि महावतों में विवाद होने पर वे हाथी-महापात्र के पास निर्णय के लिए गये। भुवनेश्वर में लिंगराज मन्दिर के निकट हाथी महापात्र मार्ग है।
पात्रता का अर्थ योग्यता है, अर्थात् शरीर रूपी पात्र में कितनी शक्ति या बुद्धि आ सकती है। 
दान के लिए पात्र वह है, जो उसका उचित उपयोग कर सके। मनुष्य की मरणोत्तर गति के लिए दान का सबसे योग्य पात्र खोजते हैं-वह महापात्र है।
मृतक का सिर दक्षिण दिशा की ओर ही क्यों रखना चाहिए एवं कपाल क्रिया का सच
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मृत देह को दक्षिणोत्तर क्यों रखते हैं ?👉
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जीव की प्रेतवत् अवस्था, पंचप्राणों एवं उपप्राणों के स्थूल देह संबंधी कार्य की समाप्ति दर्शाती है । जिस समय जीव निष्प्राण हो जाता है, उस समय जीव के शरीर में तरंगों का वहन लगभग थम सा जाता है व उसका रूपांतर ‘कलेवर’ में होता है । ‘कलेवर’ अर्थात स्थूल देह की किसी भी तरंग को संक्रमित करने की असमर्थता दर्शाने वाला अंश । ‘कलेवर’ अवस्था में देह से निष्कासन योग्य सूक्ष्मवायुओं का वहन बढ जाता है । मृत देह को दक्षिणोत्तर रखने से कलेवर की ओर दक्षिणोत्तर में भ्रमण करने वाली यम तरंगें आकर्षित होती हैं और मृत देह के चारों ओर इन तरंगों का कोष तैयार हो जाता है । इससे मृत देह की निष्कासन योग्य सूक्ष्म वायुओं का अल्प कालावधि में विघटन होता है । निष्कासन योग्य सूक्ष्म वायुओं का कुछ भाग मृत देह की नासिका व गुदा (मलद्वार) से वातावरण में उत्सर्जित होता है । इस प्रक्रिया के कारण, निष्कासन योग्य रज-तमात्मक दूषित वायुओं से मृत देह मुक्त हो जाता है, जिससे वातावरण में संचार करने वाली अनिष्ट शक्तियों के लिए देह को वश में करना बहुत कठिन हो जाता है । इसीलिए मृतदेह को दक्षिणोत्तर रखा जाता है ।

व्यक्ति की मृत्यु होने के उपरांत उस की देह घर में रखते समय उसके पैर दक्षिण दिशा की ओर क्यों करते हैं ?
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👉 दक्षिण यम दिशा है । व्यक्ति का प्राणोत्क्रमण होते समय उसके प्राण यम दिशा की ओर खींचे जाते हैं । देह से प्राण बाहर निकलने के उपरांत अन्य निष्कासन-योग्य वायु का देह से उत्सर्जन प्रारंभ होता है । इस उत्सर्जन की तरंगों की गति तथा उनका आकर्षण/खींचाव भी अधिक मात्रा में दक्षिण दिशा की ओर होता है ।

👉 व्यक्ति की कटि के निचले भाग से (कमर के नीचे का भाग) अधिक मात्रा में वासनात्मक तरंगों का उत्सर्जन होता रहता है, वह अधिक उचित पद्धति से हो, इसके लिए यम तरंगो के वास्तव्य वाली दक्षिण दिशा की ओर ही उस व्यक्ति के पैर रखने का शास्त्र है । ऐसा करने से यम तरंगों की सहायता प्राप्त होकर व्यक्ति की देह से उसके पैर की दिशा से अधोगति से अधिकाधिक निष्कासन-योग्य तरंगे खिंचकर इस वायु का योग्य प्रकार से अधिकतम मात्रा में उत्सर्जन होता है जिससे चिता पर रखने से पूर्व देह अधिकतम मात्रा में रिक्त हो जाती है । यह दिशा अधिकाधिक स्तर पर देह से बाह्य दिशा में विसर्जित होने वाली निष्कासन-योग्य वायु के प्रक्षेपण के लिए पूरक होती है ।

👉 यम (दक्षिण) दिशा में यम देवता का अस्तित्व होता है । इसलिए उन के सान्निध्य में देह से प्रक्षेपित होने वाली निष्कासन योग्य वायु के उत्सर्जन के उपरांत विलिनीकरणात्मक प्रक्रिया अधिकाधिक प्रमाण में दोष विरहित करने का प्रयास किया जाता है, अन्यथा निष्कासन-योग्य वायु के उत्सर्जन के लिए संबंधित दिशा पूरक न रखने पर, ये तरंगें घर में अधिक समय तक घनीभूत होने की संभावना होती है; इसलिए यमदिशा की ओर इस निष्कासन-योग्य तरंगों का वहन होने के लिए मृत व्यक्ति के पैर घर में दक्षिण दिशा की ओर रखने की पद्धति है ।’
मृत देह घर में रखते समय मृतक के पैर दक्षिण दिशा में रखने का शास्त्र ज्ञात न होने के कारण वर्तमान में कुछ स्थानों पर घर में मृतदेह रखते समय मृतक के पैर उत्तर की ओर रखने का अयोग्य कृत्य किया जाता है ।
मृतदेह को श्मशान में ले जाने के उपरांत मृतदेह चिता पर रखते समय मृतक के पैर उत्तर दिशा में रखना आवश्यक होता है ।

अंतिम संस्कार के समय कपाल क्रिया का सच
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हम सभी ने शमशान में अंत्येष्टि के समय देखा है कि मृतक व्यक्ति की चिता जलने के कुछ समय उपरांत सिर पर लकड़ी का डंडा मारा जाता है।

शव को मुखाग्नि देने के करीब आधे घंटे बाद जब शव की चमड़ी और मांस का ज्यादातर भाग जल चुका होता है, तब एक बांस में लोटा बांधकर शव के सिर वाले हिस्से में और घी डाला जाता है।

जिससे की सिर का कोई हिस्सा जलने से न बच जाए। इसे कपाल क्रिया कहते हैं। गरुड़ पुराण की मान्यता अनुसार अगर सिर या दिमाग का कोई हिस्सा जलने से रह जाए तो इंसान को अगले जन्म में पिछले जन्म की बातें याद रह जाती हैं।

इसीलिए अच्छी तरह से जलाया जाता है। अगर पिछले जन्म में इंसान की मृत्यु किसी दुखद कारण की वजह से हुई है तो नए जन्म में उसको याद रखने से मनुष्य फिर दुःखी हो जाएगा और लगातार उसके दिमाग में पूर्व जन्म की बातें और अपने करीबियों का दुःख घूमता रहेगा।

इस बात में मतभेद यह है कि कपाल क्रिया करने से इस जन्म की यादाश्त भूल कर आत्मा अगले जन्म को स्वीकार कर लेती है। दूसरा मतभेद यह है कि कपाल क्रिया करने से सहस्रार चक्र खुल जाता है, और आत्मा ज्ञान मार्ग से मोक्ष को प्राप्त होति है।

पहला मत को पूर्णतया सत्य नही कहा जा सकता है, यादाशत आत्मा के साथ रहती ही है, चाहे भले ही अगले जन्म में वह उसे भूल जाए, परंतु पिछले सभी जन्मों की याद आत्मा या अवचेत्तन मन में हमेशा रहती है। इसलिए कपाल क्रिया का इससे कोई संबंध नहीं।

जहाँ तक दुसरे मत का सवाल है, बहुत हद तक वह सत्य है। सहस्रार चक्र से आत्मा के गमन से ज्ञान मार्ग से आत्मा को मोक्ष मिल सकता है। लेकिन तभी जब आत्मा सहस्रार चक्र से निकले। यहाँ तो आत्मा पहले ही शरीर छोड़ चुकी है, सिर्फ शव पड़ा है आपके सामने। फिर क्यों किया जाए कपाल क्रिया?

बौद्ध धर्म में ख़ास तौर से तिब्बत के कुछ लामा मंत्रो से मृत्यु शय्या पर पड़े कुछ लोगो की आत्मा सहस्रार चक्र से निकालने का दावा करते है। यह एक बहुत बड़ा व्यवसाय भी बन गया है जिसके लिए लाखों रूपए भी लिए जाते है। सनातन धर्म में भी समाधि द्वारा मृत्यु से पूर्व आसन लगा कर आत्मा को सहस्रार चक्र से निकाला जाता है, लेकिन यह एक योगी ही कर सकता है, आम आदमी नहीं।

फिर कपाल क्रिया क्यों? और क्या यह जरूरी है?

जी, यह जरूरी है। यह कर्म कांड का हिस्सा तो नहीं है, लेकिन इसे बाद में कर्म कांड का हिस्सा बना दिया गया। इसका कारण थे दुष्ट तांत्रिक। बहुत से दुष्ट तांत्रिक शमशान से कपाल इखट्टे कर लेते है। इन्ही कपाल द्वारा मृत इंसान की आत्मा को प्रेत बना कर अपने काम निकाले जाते है। इसलिए ही अघोरियों ने इस दुष:क्रिया को रोकने के लिए यह प्रथा चलायी की सभी की कपाल क्रिया कर दी जाय। जब कपाल ही नहीं रहेगा तो उससे कोई दुष:क्रिया नहीं होगी। यह कारण किसी को बताया नहीं जाता, अन्यथा कोई इसे मानेगा कोई नहीं। परंतु मानने या न मानने से तांत्रिकों को तो कोई फर्क नहीं पड़ता न। समय समय पर ऐसे मामले आते ही है जहाँ कोई अच्छी आत्मा को भी प्रेत बना कर गलत कार्य करवाये जाते है। इसलिए यह क्रिया जरूरी है।
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Friday, September 29, 2023

पितृ पक्ष (श्राद्ध करने की विधि)〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️पितृलोक से पृथ्वी लोक पर पितरो के आने का मुख्य कारण उनकी पुत्र-पौत्रादि से आशा होती है की वे उन्हें अपनी यथासंभव शक्ति के अनुसार पिंडदान प्रदान करे अतएवं प्रत्येक सद्गृहस्थ का धर्म है कि स्पष्ट तिथि के अनुसार श्राद्ध अवस्य करे यदि पित्र पक्ष मे परिजनों का श्राद्ध नहीं किया गया तो वे श्राप दे देते हैं और ये परिवार के सदस्यों पर अपना प्रभाव छोड़ सकता है जिससे हानि होनी ही होनी है। अतः इस पक्ष में श्राद्ध अवश्य किया जाना चाहिये। श्राद्ध में पंचबली की महता: 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️पित्र पक्ष में ब्राह्मण भोजन और जलमिश्रित तिल से तर्पण करने जितना ही अनिवार्य पञ्चबलि भी है पञ्चबलि का नियम कुछ इस प्रकार है।एक थाली के पांच भिन्न भिन्न भाग करके थोड़े थोड़े सभी प्रकार के भोजन को परोसकर हाथ मे तिल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प करते समय निम्न का उचारण करे: अद्यामुक गोत्र अमुक शर्माहं/बर्माहं/गुप्तोहं/दासोहं अमुकगोत्रस्य मम पितुः/मातु आदि वार्षिकश्राद्धे (महालयश्राद्धे) कृतस्य पाकस्य शुद्ध्यर्थं पंचसूनाजनितदोषपरिहारार्थं च पंचबलिदानं करिष्ये। पंचबलि-विधि इस प्रकार है:〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ (1)👉 गोबलि (पत्ते पर)〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ऊँ सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पुण्यराशयः। प्रतिगृह्वन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः।। इदं गोभ्यो न मम। इस श्लोक का उचारण पश्चिम दिशा की और पुष्प और पते को दिखाकर करे। पंचबली का एक निहित भाग गाय को खिलायें। (2)👉 श्वानबलि (पत्ते पर)〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोöवौ। ताभ्यामन्नं प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ।। इदं श्वभ्यां न मम। इस श्लोक का उचारण कुत्तों को बलि देने के लिए करे। इस पंचबलि के समय कान मे जनेऊ डालना अनिवार्य है। (3)👉 काकबलि (पृथ्वी पर)〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ऊँ ऐन्द्रवारूणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा। वायसाः प्रतिगृह्वन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम्।। इदमन्नं वायसेभ्यो न मम। इस श्लोक का उचारण कौओं को भूमि पर अन्न देने के लिए करे। पंचबली का एक निहित भाग कौओं के लिये छत पर रख दें।(4)👉 देवादिबलि (पत्ते पर)〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ऊँ देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसंघाः। प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम्।। इदमन्नं देवादिभ्यो न मम। इस श्लोक का उचारण देवता आदि के लिय अन्न देने के लिए होता है। पंचबली का एक निहित भाग अग्नि के सपुर्द कर दें।(5)👉 पिपीलिकादिबलि (पत्ते पर)〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️पिलीलिकाः कीटपतंगकाद्या बुभुक्षिताः कर्मनिबन्धबद्धाः। तेषां हि तृप्त्यर्थमिदं मयान्नं तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु।। इदमन्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम। इस श्लोक का उचारण चींटी आदि को बलि देने के लिए होता है। पंचबली का एक निहित भाग चींटीयों के लिये रख दें पंचबलि देने के बाद एक थाल मे खाना परोसक निम्न मंत्र का उचारण कर ब्राह्मणों के पैर धोकर सभी व्यंजनों का भोजन करायें।यत् फलं कपिलादाने कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे। तत्फलं पाण्डवश्रेष्ठ विप्राणां पादसेचने।।इसे बाद उन्हें अन्न, वस्त्र और द्रव्य-दक्षिणा देकर तिलक करके नमस्कार करें। तत्पश्चात् नीचे लिखे वाक्य यजमान और ब्राह्मण दोनों बोलें यजमान 👉 शेषान्नेन किं कर्तव्यम्। (श्राद्ध में बचे अन्न का क्या करूँ?) ब्राह्मण 👉 इष्टैः सह भोक्तव्यम्। (अपने इष्ट-मित्रों के साथ भोजन करें।) इसके बाद अपने परिवार वालों के साथ स्वयं भी भोजन करें तथा निम्न मंत्र द्वारा भगवान् को नमस्कार करें👉प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः।श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है, क्योंकि कई बार विधि पूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं।श्राद्धकर्म के नियम〰️〰️〰️〰️〰️〰️1👉 श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।2👉 श्राद्ध में चांदी के बर्तन का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।3👉 श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए गए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।4👉 ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए, क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं, जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।5👉 जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए। पिंडदान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।6👉 श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं। ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।7👉 श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटर सरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।8👉 दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है। अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।9👉 चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।10👉 जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहनी वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।11👉 श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।12👉 शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग)में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए। धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है। अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।13👉 श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं। श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।14👉 रात्रि को राक्षसी समय माना गया है। अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए। दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।15👉 श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं- गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल। केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है। सोना, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं। इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।16👉 तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं। तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।17👉 रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं। आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।18👉 चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।19👉 भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ।20👉 श्राद्ध के प्रमुख अंग〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।भोजन व पिण्ड दान:👉 पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।वस्त्रदान👉 वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।दक्षिणा दान👉 यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।21👉 श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें। श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।22👉 पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।23👉 तैयार भोजन में से गाय, कुत्ता कौआ, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें। इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।24👉 कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं। पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।25👉 ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं। ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।26👉 पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए । एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करें या सबसे छोटा।भारतीय शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि, पितृगण पितृपक्ष में पृथ्वी पर आते हैं, और 15 दिनों तक पृथ्वी पर रहने के बाद अपने लोक लौट जाते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि, पितृपक्ष के दौरान पितृ अपने परिजनों के आस-पास रहते हैं, इसलिए इन दिनों कोई भी ऐसा काम नहीं करें, जिससे पितृगण नाराज हों। पितरों को खुश रखने के लिए पितृ पक्ष में कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मण, जामाता, भांजा, गुरु या नाती को भोजन कराना चाहिए। इससे पितृगण अत्यंत प्रसन्न होते हैं। ब्राह्मणों को भोजन करवाते समय भोजन का पात्र दोनों हाथों से पकड़कर लाना चाहिए, अन्यथा भोजन का अंश राक्षस ग्रहण कर लेते हैं, जिससे ब्राह्मणों द्वारा अन्न ग्रहण करने के बावजूद पितृगण भोजन का अंश ग्रहण नहीं करते हैं। पितृ पक्ष में द्वार पर आने वाले किसी भी जीव-जंतु को मारना नहीं चाहिए बल्कि उनके योग्य भोजन का प्रबंध करना चाहिए। हर दिन भोजन बनने के बाद एक हिस्सा निकालकर गाय, कुत्ता, कौआ अथवा बिल्ली को देना चाहिए। मान्यता है कि इन्हें दिया गया भोजन सीधे पितरों को प्राप्त हो जाता है। शाम के समय घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर पितृगणों का ध्यान करना चाहिए।सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार जिस तिथि को जिसके पूर्वज गमन करते हैं, उसी तिथि को उनका श्राद्ध करना चाहिए। इस पक्ष में जो लोग अपने पितरों को जल देते हैं, तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं, उनके समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं। जिन लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए पितृ पक्ष में कुछ विशेष तिथियां भी निर्धारित की गई हैं, जिस दिन वे पितरों के निमित्त श्राद्ध कर सकते हैं।आश्विन कृष्ण प्रतिपदा👉 इस तिथि को नाना-नानी के श्राद्ध के लिए सही बताया गया है। इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि याद न हो, तो आप इस दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं।पंचमी👉 जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाना चाहिए।नवमी👉 सौभाग्यवती यानि पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गई हो, उन स्त्रियों का श्राद्ध नवमी को किया जाता है। यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है। इसलिए इसे मातृनवमी भी कहते हैं। मान्यता है कि, इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।एकादशी और द्वादशी👉 एकादशी में वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध करते हैं। अर्थात् इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है, जिन्होंने संन्यास लिया हो।चतुर्दशी👉 इस तिथि में शस्त्र, आत्म-हत्या, विष और दुर्घटना यानि जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध किया जाता है, जबकि बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को करने के लिए कहा गया है।सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या👉 किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं, या पितरों की तिथि याद नहीं है, तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्र अनुसार, इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है। यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो, उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिए। बाकी तो जिनकी जो तिथि हो, श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए, यही उचित भी है।पिंडदान करने के लिए👉 सफेद या पीले वस्त्र ही धारण करें। जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं, वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं।विशेष: श्राद्ध कर्म करने वालों को निम्न मंत्र तीन बार अवश्य पढ़ना चाहिए। यह मंत्र ब्रह्मा जी द्वारा रचित आयु, आरोग्य, धन, लक्ष्मी प्रदान करने वाला अमृतमंत्र है।देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिश्च एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत ।। (वायु पुराण)श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें। प्रातः एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। हमारे धर्म-ग्रंथों में पितरों को देवताओं के समान संज्ञा दी गई है। सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ के अनुसार चंद्रमा की ऊधर्व कक्षा में पितृलोक है, जहां पितृ रहते हैं। पितृ लोक को मनुष्य लोक से आंखों द्वारा नहीं देखा जा सकता। जीवात्मा जब इस स्थूल देह से पृथक होती है, उस स्थिति को मृत्यु कहते हैं। यह भौतिक शरीर 27 तत्वों के संधान से बना है। स्थूल पंच महाभूतों एवं स्थूल कर्मेन्द्रियों को छोड़ने पर अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी 17 तत्वों से बना हुआ सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है।सनातन मान्यताओं के अनुसार एक वर्ष तक प्रायः सूक्ष्म जीव को नया शरीर नहीं मिलता। मोहवश वह सूक्ष्म जीव स्वजनों व घर के आसपास भ्रमण करता रहता है। श्राद्ध कार्य के अनुष्ठान से सूक्ष्म जीव को तृप्ति मिलती है, इसीलिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। अगर किसी के कुंडली में पितृदोष है, और वह इस श्राद्ध पक्ष में अपनी कुंडली के अनुसार उचित निवारण करते हैं तो, जीवन की बहुत सी समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं। योग्य ब्राह्मण द्वारा ही श्राद्ध कर्म पूर्ण करवाये जाने चाहिएं।ऐसा कुछ भी नहीं है कि, इस अनुष्ठान में ब्राह्मणों को जो भोजन खिलाया जाता है, वही पदार्थ ज्यों का त्यों उसी आकार, वजन और परिमाण में मृतक पितरों को मिलता है। वास्तव में श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध में दिए गए भोजन का सूक्ष्म अंश परिणत होकर, उसी अनुपात व मात्रा में प्राणी को मिलता है, जिस योनि में वह प्राणी इस समय है।पितृ लोक में गया हुआ प्राणी श्राद्ध में दिए हुए अन्न का स्वधा रूप में परिणत भाग को प्राप्त करता है। यदि शुभ कर्म के कारण मर कर पिता देवता बन गया हो तो, श्राद्ध में दिया हुआ अन्न उसे अमृत में परिणत होकर देवयोनि में प्राप्त होगा। गंधर्व बन गया हो तो, वह अन्न अनेक भोगों के रूप में प्राप्त होता है। पशु बन जाने पर घास के रूप में परिवर्तित होकर उसे तृप्त करता है। यदि नाग योनि में है तो, श्राद्ध का अन्न वायु के रूप में तृप्ति देता है। दानव, प्रेत व यक्ष योनि मिलने पर श्राद्ध का अन्न नाना प्रकार के अन्न पान और भोग्य रसादि के रूप में परिणत होकर प्राणी को तृप्त करता है। अगर किसी की जन्मकुंडली में पितृदोष है तो, जन्म कुंडली के अनुसार उचित उपाय करें।〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

पितृ पक्ष (श्राद्ध करने की विधि)
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पितृलोक से पृथ्वी लोक पर पितरो के आने का मुख्य कारण उनकी पुत्र-पौत्रादि से आशा होती है की वे उन्हें अपनी यथासंभव शक्ति के अनुसार पिंडदान प्रदान करे अतएवं प्रत्येक सद्गृहस्थ का धर्म है कि स्पष्ट तिथि के अनुसार श्राद्ध अवस्य करे यदि पित्र पक्ष मे परिजनों का श्राद्ध नहीं किया गया तो वे श्राप दे देते हैं और ये परिवार के सदस्यों पर अपना प्रभाव छोड़ सकता है जिससे हानि होनी ही होनी है। अतः इस पक्ष में श्राद्ध अवश्य किया जाना चाहिये। 

श्राद्ध में पंचबली की महता: 
〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️पित्र पक्ष में ब्राह्मण भोजन और जलमिश्रित तिल से तर्पण करने जितना ही अनिवार्य पञ्चबलि भी है पञ्चबलि का नियम कुछ इस प्रकार है।

एक थाली के पांच भिन्न भिन्न भाग करके थोड़े थोड़े सभी प्रकार के भोजन को परोसकर हाथ मे तिल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प करते समय निम्न का उचारण करे: अद्यामुक गोत्र अमुक शर्माहं/बर्माहं/गुप्तोहं/दासोहं अमुकगोत्रस्य मम पितुः/मातु आदि वार्षिकश्राद्धे (महालयश्राद्धे) कृतस्य पाकस्य शुद्ध्यर्थं पंचसूनाजनितदोषपरिहारार्थं च पंचबलिदानं करिष्ये। 

पंचबलि-विधि इस प्रकार है:
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(1)👉 गोबलि (पत्ते पर)
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ऊँ सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पुण्यराशयः। प्रतिगृह्वन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः।। इदं गोभ्यो न मम। 

इस श्लोक का उचारण पश्चिम दिशा की और पुष्प और पते को दिखाकर करे। पंचबली का एक निहित भाग गाय को खिलायें। 

(2)👉 श्वानबलि (पत्ते पर)
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द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोöवौ। ताभ्यामन्नं प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ।। इदं श्वभ्यां न मम। 

इस श्लोक का उचारण कुत्तों को बलि देने के लिए करे। इस पंचबलि के समय कान मे जनेऊ डालना अनिवार्य है। 

(3)👉 काकबलि (पृथ्वी पर)
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ऊँ ऐन्द्रवारूणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा। वायसाः प्रतिगृह्वन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम्।। इदमन्नं वायसेभ्यो न मम। 

इस श्लोक का उचारण कौओं को भूमि पर अन्न देने के लिए करे। पंचबली का एक निहित भाग कौओं के लिये छत पर रख दें।

(4)👉 देवादिबलि (पत्ते पर)
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ऊँ देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसंघाः। प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम्।। इदमन्नं देवादिभ्यो न मम। 

इस श्लोक का उचारण देवता आदि के लिय अन्न देने के लिए होता है। पंचबली का एक निहित भाग अग्नि के सपुर्द कर दें।

(5)👉 पिपीलिकादिबलि (पत्ते पर)
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पिलीलिकाः कीटपतंगकाद्या बुभुक्षिताः कर्मनिबन्धबद्धाः। तेषां हि तृप्त्यर्थमिदं मयान्नं तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु।। इदमन्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम। 

इस श्लोक का उचारण चींटी आदि को बलि देने के लिए होता है। पंचबली का एक निहित भाग चींटीयों के लिये रख दें पंचबलि देने के बाद एक थाल मे खाना परोसक निम्न मंत्र का उचारण कर ब्राह्मणों के पैर धोकर सभी व्यंजनों का भोजन करायें।

यत् फलं कपिलादाने कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे। 
तत्फलं पाण्डवश्रेष्ठ विप्राणां पादसेचने।।

इसे बाद उन्हें अन्न, वस्त्र और द्रव्य-दक्षिणा देकर तिलक करके नमस्कार करें। तत्पश्चात् नीचे लिखे वाक्य यजमान और ब्राह्मण दोनों बोलें 

यजमान 👉 शेषान्नेन किं कर्तव्यम्। (श्राद्ध में बचे अन्न का क्या करूँ?) 

ब्राह्मण 👉  इष्टैः सह भोक्तव्यम्। (अपने इष्ट-मित्रों के साथ भोजन करें।) इसके बाद अपने परिवार वालों के साथ स्वयं भी भोजन करें तथा निम्न मंत्र द्वारा भगवान् को नमस्कार करें👉

प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादिति श्रुतिः।

श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है, क्योंकि कई बार विधि पूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं।

श्राद्धकर्म के नियम
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1👉 श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।

2👉 श्राद्ध में चांदी के बर्तन का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।

3👉 श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए गए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।

4👉 ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए, क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं, जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।

5👉 जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए। पिंडदान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।

6👉 श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं। ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।

7👉 श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटर सरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।

8👉 दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है। अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।

9👉 चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।

10👉 जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहनी वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।

11👉 श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।

12👉 शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग)में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए। धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है। अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।

13👉 श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं। श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।

14👉 रात्रि को राक्षसी समय माना गया है। अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए। दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।

15👉 श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं- गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल। केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है। सोना, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं। इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।

16👉 तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं। तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।

17👉 रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं। आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।

18👉 चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।

19👉 भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-
1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ।

20👉 श्राद्ध के प्रमुख अंग
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तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।

भोजन व पिण्ड दान:👉 पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।

वस्त्रदान👉 वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।

दक्षिणा दान👉 यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।

21👉  श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें। श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।

22👉 पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।

23👉 तैयार भोजन में से गाय, कुत्ता कौआ, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें। इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।

24👉 कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं। पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।

25👉 ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं। ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।

26👉 पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए । एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करें या सबसे छोटा।

भारतीय शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि, पितृगण पितृपक्ष में पृथ्वी पर आते हैं, और 15 दिनों तक पृथ्वी पर रहने के बाद अपने लोक लौट जाते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि, पितृपक्ष के दौरान पितृ अपने परिजनों के आस-पास रहते हैं, इसलिए इन दिनों कोई भी ऐसा काम नहीं करें, जिससे पितृगण नाराज हों। पितरों को खुश रखने के लिए पितृ पक्ष में कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मण, जामाता, भांजा, गुरु या नाती को भोजन कराना चाहिए। इससे पितृगण अत्यंत प्रसन्न होते हैं। ब्राह्मणों को भोजन करवाते समय भोजन का पात्र दोनों हाथों से पकड़कर लाना चाहिए, अन्यथा भोजन का अंश राक्षस ग्रहण कर लेते हैं, जिससे ब्राह्मणों द्वारा अन्न ग्रहण करने के बावजूद पितृगण भोजन का अंश ग्रहण नहीं करते हैं। पितृ पक्ष में द्वार पर आने वाले किसी भी जीव-जंतु को मारना नहीं चाहिए बल्कि उनके योग्य भोजन का प्रबंध करना चाहिए। हर दिन भोजन बनने के बाद एक हिस्सा निकालकर गाय, कुत्ता, कौआ अथवा बिल्ली को देना चाहिए। मान्यता है कि इन्हें दिया गया भोजन सीधे पितरों को प्राप्त हो जाता है। शाम के समय घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर पितृगणों का ध्यान करना चाहिए।

सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार जिस तिथि को जिसके पूर्वज गमन करते हैं, उसी तिथि को उनका श्राद्ध करना चाहिए। इस पक्ष में जो लोग अपने पितरों को जल देते हैं, तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं, उनके समस्त मनोरथ पूर्ण होते हैं। जिन लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए पितृ पक्ष में कुछ विशेष तिथियां भी निर्धारित की गई हैं, जिस दिन वे पितरों के निमित्त श्राद्ध कर सकते हैं।

आश्विन कृष्ण प्रतिपदा👉  इस तिथि को नाना-नानी के श्राद्ध के लिए सही बताया गया है। इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि याद न हो, तो आप इस दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं।

पंचमी👉 जिनकी मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाना चाहिए।

नवमी👉 सौभाग्यवती यानि पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गई हो, उन स्त्रियों का श्राद्ध नवमी को किया जाता है। यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है। इसलिए इसे मातृनवमी भी कहते हैं। मान्यता है कि, इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।

एकादशी और द्वादशी👉 एकादशी में वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध करते हैं। अर्थात् इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है, जिन्होंने संन्यास लिया हो।

चतुर्दशी👉 इस तिथि में शस्त्र, आत्म-हत्या, विष और दुर्घटना यानि जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध किया जाता है, जबकि बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को करने के लिए कहा गया है।

सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या👉 किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गए हैं, या पितरों की तिथि याद नहीं है, तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्र अनुसार, इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है। यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो, उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिए। बाकी तो जिनकी जो तिथि हो, श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिए, यही उचित भी है।

पिंडदान करने के लिए👉 सफेद या पीले वस्त्र ही धारण करें। जो इस प्रकार श्राद्धादि कर्म संपन्न करते हैं, वे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनंत काल तक स्वर्ग का उपभोग करते हैं।
विशेष: श्राद्ध कर्म करने वालों को निम्न मंत्र तीन बार अवश्य पढ़ना चाहिए। यह मंत्र ब्रह्मा जी द्वारा रचित आयु, आरोग्य, धन, लक्ष्मी प्रदान करने वाला अमृतमंत्र है।

देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिश्च एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत ।। (वायु पुराण)

श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें। प्रातः एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। हमारे धर्म-ग्रंथों में पितरों को देवताओं के समान संज्ञा दी गई है। सिद्धांत शिरोमणि ग्रंथ के अनुसार चंद्रमा की ऊधर्व कक्षा में पितृलोक है, जहां पितृ रहते हैं। पितृ लोक को मनुष्य लोक से आंखों द्वारा नहीं देखा जा सकता। जीवात्मा जब इस स्थूल देह से पृथक होती है, उस स्थिति को मृत्यु कहते हैं। यह भौतिक शरीर 27 तत्वों के संधान से बना है। स्थूल पंच महाभूतों एवं स्थूल कर्मेन्द्रियों को छोड़ने पर अर्थात मृत्यु को प्राप्त हो जाने पर भी 17 तत्वों से बना हुआ सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है।
सनातन मान्यताओं के अनुसार एक वर्ष तक प्रायः सूक्ष्म जीव को नया शरीर नहीं मिलता। मोहवश वह सूक्ष्म जीव स्वजनों व घर के आसपास भ्रमण करता रहता है। श्राद्ध कार्य के अनुष्ठान से सूक्ष्म जीव को तृप्ति मिलती है, इसीलिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। अगर किसी के कुंडली में पितृदोष है, और वह इस श्राद्ध पक्ष में अपनी कुंडली के अनुसार उचित निवारण करते हैं तो, जीवन की बहुत सी समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं। योग्य ब्राह्मण द्वारा ही श्राद्ध कर्म पूर्ण करवाये जाने चाहिएं।
ऐसा कुछ भी नहीं है कि, इस अनुष्ठान में ब्राह्मणों को जो भोजन खिलाया जाता है, वही पदार्थ ज्यों का त्यों उसी आकार, वजन और परिमाण में मृतक पितरों को मिलता है। वास्तव में श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध में दिए गए भोजन का सूक्ष्म अंश परिणत होकर, उसी अनुपात व मात्रा में प्राणी को मिलता है, जिस योनि में वह प्राणी इस समय है।
पितृ लोक में गया हुआ प्राणी श्राद्ध में दिए हुए अन्न का स्वधा रूप में परिणत भाग को प्राप्त करता है। यदि शुभ कर्म के कारण मर कर पिता देवता बन गया हो तो, श्राद्ध में दिया हुआ अन्न उसे अमृत में परिणत होकर देवयोनि में प्राप्त होगा। गंधर्व बन गया हो तो, वह अन्न अनेक भोगों के रूप में प्राप्त होता है। पशु बन जाने पर घास के रूप में परिवर्तित होकर उसे तृप्त करता है। यदि नाग योनि में है तो, श्राद्ध का अन्न वायु के रूप में तृप्ति देता है। दानव, प्रेत व यक्ष योनि मिलने पर श्राद्ध का अन्न नाना प्रकार के अन्न पान और भोग्य रसादि के रूप में परिणत होकर प्राणी को तृप्त करता है। अगर किसी की जन्मकुंडली में पितृदोष है तो, जन्म कुंडली के अनुसार उचित उपाय करें।
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कब से शुरू हो रहा है श्राद्ध पक्ष, जानिए क्या है इसका महत्व...

श्राद्ध करना हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यतानुसार अगर किसी मृत व्यक्ति का विधिपूर्वक श्राद्ध नहीं हो पाता है तो उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती है जिसके कारण वह बंधनों से मुक्त नहीं हो पाता है और इसी लोक में भटकता रहता है। इसलिए पितरों की मुक्ति के लिए श्राद्धपक्ष का बेहद महत्व है।

इस बार श्राद्ध पक्ष 29 सितंबर 2023 से शुरू हो रहा है। लेकिन पितृ पक्ष का पहला श्राद्ध अगस्त मुनि का होता है जो भाद्र पक्ष पूर्णिमा को लगता है। प्रतिपदा का पहला पितृ श्राद्ध 29 सितंबर 2023 को होगा। इस बार पितृपक्ष का समापन 14 अक्टूबर को होगा। अंतिम श्राद्ध यानी अमवस्या का श्राद्ध 14 अक्टूबर को किया जाएगा।

हिन्दू ज्योतिष के अनुसार भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक माना जाता है। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानि पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए। माना जाता है जिनके पूर्वज प्रसन्न होते हैं उनके जीवन में किसी प्रकार के कष्ट नहीं होते हैं।

पितरों की शांति के लिए हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष श्राद्ध होते हैं। मान्यता है कि इस समय पूर्वज पृथ्वी पर होते हैं, इसलिए पितृपक्ष में उनका श्राद्ध करने से वे अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

ऐसे करें श्राद्ध कर्म
-पितरों का श्राद्ध कर्म जिस दिन करना हो उस दिन सुबह उठकर साफ सुथरे वस्त्र पहनें।
-श्राद्ध कर्म करते समय बिना सिले वस्त्र पहनें।
-अपने पूर्वजों की पसंद का भोजन बनाएं और उन्हें अर्पित करें।
-श्राद्ध में तिल, चावल और जौं को जरूर शामिल करें।
-अपने पितरों को पहले तिल अर्पण करें उसके बाद भोजन की पिंडी बनाकर चढ़ाएं।
-पितृपक्ष में कोऔं को पितरो का रुप माना जाता है इसलिए कोऔं को भोजन अवश्य डालें। गरीब और जरुरतमंद को दान करें। भांजे-भांजी को भोजन करवाएं।