Thursday, February 15, 2024

गुरू ग्रह का महत्व ।

गुरु (बृहस्पति) ज्योतिष के नव ग्रहों में सबसे अधिक शुभ ग्रह माने जाते हैं. गुरू मुख्य रूप से आध्यात्मिकता को विकसित करने का कारक हैं. तीर्थ स्थानों तथा मंदिरों, पवित्र नदियों तथा धार्मिक क्रिया कलाप से जुडे हैं. गुरु ग्रह को अध्यापकों, ज्योतिषियों, दार्शनिकों, लेखकों जैसे कई प्रकार के क्षेत्रों में कार्य करने का कारक माना जाता है. गुरु की अन्य कारक वस्तुओं में पुत्र संतान, जीवन साथी, धन-सम्पति, शैक्षिक गुरु, बुद्धिमता, शिक्षा, ज्योतिष तर्क, शिल्पज्ञान, अच्छे गुण, श्रद्धा, त्याग, समृ्द्धि, धर्म, विश्वास, धार्मिक कार्यो, राजसिक सम्मान देखा जा सकता है.

गुरु से संबन्धित कार्य क्षेत्र कौन से है ।

गुरू जीवन के अधिकतर क्षेत्रों में सकारात्मक उर्जा प्रदान करने में सहायक हैं. अपने सकारात्मक रुख के कारण व्यक्ति कठिन से कठिन समय को आसानी से सुलझाने के प्रयास में लगा रहता है. गुरू आशावादी बनाते हैं और निराशा को जीवन में प्रवेश नहीं करने देते हैं. गुरू के अच्छे प्रभाव स्वरुप जातक परिवार को साथ में लेकर चलने की चाह रखने वाला होता है. गुरु के प्रभाव से व्यक्ति को बैंक, आयकर, खंजाची, राजस्व, मंदिर, धर्मार्थ संस्थाएं, कानूनी क्षेत्र, जज, न्यायाल्य, वकील, सम्पादक, प्राचार्य, शिक्षाविद, शेयर बाजार, पूंजीपति, दार्शनिक, ज्योतिषी, वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता होता है.

गुरु के मित्र ग्रह सूर्य, चन्द्र, मंगल हैं. गुरु के शत्रु ग्रह बुध, शुक्र हैं, गुरु के साथ शनि सम संबन्ध रखता है. गुरु को मीन व धनु राशि का स्वामित्व प्राप्त है. गुरु की मूलत्रिकोण राशि धनु है. इस राशि में गुरु 0 अंश से 10 अंश के मध्य अपने मूलत्रिकोण अंशों पर होते है. गुरु कर्क राशि में 5 अंश पर होने पर अपनी उच्च राशि अंशों पर होते हैं. गुरु मकर राशि में 5 अंशों पर नीच राशिस्थ होते हैं, गुरु को पुरुष प्रधान ग्रह कहा गया है यह उत्तर-पूर्व दिशा के कारक ग्रह हैं.गुरु के सभी शुभ फल प्राप्त करने के लिए पुखराज रत्न धारण किया जाता है. गुरु का शुभ रंग पिताम्बरी पीला है. गुरु के शुभ अंक 3, 12, 21 है. गुरु के अधिदेवता इन्द्र, शिव, ब्रह्मा, भगवान नारायण है.

गुरु का बीज मंत्र 

ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरुवे नम:

गुरु का वैदिक मंत्र 

देवानां च ऋषिणा च गुर्रु कान्चन सन्निभम ।
बुद्यिभूतं त्रिलोकेश तं गुरुं प्रण्माम्यहम ।।

गुरु की दान की वस्तुएं 
गुरु की शुभता प्राप्त करने के लिए निम्न वस्तुओं का दान करना चाहिए. स्वर्ण, पुखराज, रुबी, चना दान, नमक, हल्दी, पीले चावल, पीले फूल या पीले लडडू. इन वस्तुओं का दान वीरवार की शाम को करना शुभ रहता है.

गुरु का जातक पर प्रभाव

गुरु लग्न भाव में बली होकर स्थित हों, या फिर गुरु की धनु या मीन राशि लग्न भाव में हो, अथवा गुरु की राशियों में से कोई राशि व्यक्ति की जन्म राशि हो, तो व्यक्ति के रुप-रंग पर गुरु का प्रभाव रहता है. गुरु बुद्धि को बुद्धिमान, ज्ञान, खुशियां और सभी चीजों की पूर्णता देता है. गुरू का प्रबल प्रभाव जातक को मीठा खाने वाला तथा विभिन्न प्रकार के पकवानों तथा व्यंजनों का शौकीन बनाता है. गुरू चर्बी का प्रभाव उत्पन्न करता है इस कारण गुरू से प्रभावित व्यक्ति मोटा हो सकता है इसके साथ ही व्यक्ति साफ रंग-रुप, कफ प्रकृति, सुगठित शरीर का होता है.

गुरु के खराब होने पर 
गुरु कुण्डली में कमजोर हो, या पाप ग्रहों के प्रभाव में हो नीच का हो षडबल हीन हो तो व्यक्ति को गाल-ब्लेडर, खून की कमी, शरीर में दर्द, दिमागी रुप से विचलित, पेट में गडबड, बवासीर, वायु विकार, कान, फेफडों या नाभी संबन्धित रोग, दिमाग घूमना, बुखार, बदहजमी, हर्निया, मस्तिष्क, मोतियाबिन्द, बिषाक्त, अण्डाश्य का बढना, बेहोशी जैसे दिक्कतें परेशान कर सकती हैं. बृहस्पति के बलहीन होने पर जातक को अनेक बिमारियां जैसे मधुमेह, पित्ताशय से संबधित बिमारियों प्रभावित कर सकती हैं. कुंडली में गुरू के नीच वक्री या बलहीन होने पर व्यक्ति के शरीर की चर्बी भी बढने लगती है जिसके कारण वह बहुत मोटा भी हो सकता है. बृहस्पति पर अशुभ राहु का प्रबल व्यक्ति को आध्यात्मिकता तथा धार्मिक कार्यों दूर ले जाता है व्यक्ति धर्म तथा आध्यात्मिकता के नाम पर लोगों को धोखा देने वाला हो सकता है.

गुरु ग्रह के 12 भावो मे फल -

1. लग्न में -

जिस जातक के लग्न में बृहस्पति स्थित होता है, वह जातक दिव्य देह से युक्त, आभूषणधारी, बुद्धिमान, लंबे शरीर वाला होता है। ऐसा व्यक्ति धनवान, प्रतिष्ठावान तथा राजदरबार में मान-सम्मान पाने वाला होता है। शरीर कांति के समान, गुणवान, गौर वर्ण, सुंदर वाणी से युक्त, सतोगुणी एवं कफ प्रकृति वाला होता है। दीर्घायु, सत्कर्मी, पुत्रवान एवं सुखी बनाता है लग्न का बृहस्पति। 

2. द्वितीय भाव में -

जिस जातक के द्वितीय भाव में बृहस्पति होता है, उसकी बुद्धि, उसकी स्वाभाविक रुचि काव्य-शास्त्र की ओर होती है। द्वितीय भाव वाणी का भी होता है। इस कारण जातक वाचाल होता है। उसमें अहम की मात्रा बढ़ जाती है। क्योंकि द्वितीय भाव कुटुंब, वाणी एवं धन का होता है और बृहस्पति इस भाव का कारक भी है, इस कारण द्वितीय भाव स्थित बृहस्पति, कारक: भावों नाश्यति के सूत्र के अनुसार, इस भाव के शुभ फलों में कमी ही करता देखा गया है। धनार्जन के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना, वाणी की प्रगल्भता, अथवा बहुत कम बोलना और परिवार में संतुलन बनाये रखने हेतु उसे प्रयास करने पड़ते हैं। राजदरबार में वह दंड देने का अधिकारी होता है। अन्य लोग इसका मान-सम्मान करते हैं। ऐसा जातक शत्रुरहित होता है। आयुर्भाव पर पूर्ण दृष्टि होने के कारण वह दीर्घायु और विद्यावान होता है। पाप ग्रह से युक्त होने पर शिक्षा में रुकावटें आती हैं तथा वह मिथ्याभाषी हो जाता है। दूषित गुरु से शुभ फलों में कमी आती है और घर के बड़ों से विरोध कराता है। 

3. तृतीय भाव में -

जिस जातक के तृतीय भाव में बृहस्पति होता है, वह मित्रों के प्रति कृतघ्न और सहोदरों का कल्याण करने वाला होता है। वराह मिहिर के अनुसार वह कृपण होता है। इसी कारण धनवान हो कर भी वह निर्धन के समान परिलक्षित होता है। परंतु शुभ ग्रहों से युक्त होने पर उसे शुभ फल प्राप्त होते हैं। पुरुष राशि में होने पर शिक्षा अपूर्ण रहती है, परंतु विद्यावान प्रतीत होता है। इस स्थान में स्थित गुरु के जातक के लिए सर्वोत्तम व्यवसाय अध्यापक का होता है। शिक्षक प्रत्येक स्थिति में गंभीर एवं शांत बने रहते हैं तथा परिस्थितियों का कुशलतापूर्वक सामना करते हैं। 

4. चतुर्थ स्थान में -

जिस जातक के चतुर्थ स्थान में बलवान बृहस्पति होता है, वह देवताओं और ब्राह्मणों से प्रीति रखता है, राजा से सुख प्राप्त करता है, सुखी, यशस्वी, बली, धन-वाहनादि से युक्त होता है और पिता को सुखी बनाता है। वह सुहृदय एवं मेधावी होता है। इस भाव में अकेला गुरू पूर्वजों से संपत्ति प्राप्त कराता है। जिस 

5. पंचम स्थान में -

जातक के पंचम स्थान में बृहस्पति होता है, वह बुद्धिमान, गुणवान, तर्कशील, श्रेष्ठ एवं विद्वानों द्वारा पूजित होता है। धनु एवं मीन राशि में होने से उसकी कम संतति होती है। कर्क में वह संततिरहित भी देखा गया है। सभा में तर्कानुकूल उचित बोलने वाला, शुद्धचित तथा विनम्र होता है। पंचमस्थ गुरु के कारण संतान सुख कम होता है। संतान कम होती है और उससे सुख भी कम ही मिलता है। 

6. छठे स्थान में -

रिपु स्थान, अर्थात जन्म लग्न से छठे स्थान में बृहस्पति होने पर जातक शत्रुनाशक, युद्धजया होता है एवं मामा से विरोध करता है। स्वयं, माता एवं मामा के स्वास्थ्य में कमी रहती है। संगीत विद्या में अभिरुचि होती है। पाप ग्रहों की राशि में होने से शत्रुओं से पीड़ित भी रहता है। गुरु- चंद्र का योग इस स्थान पर दोष उत्पन्न करता है। यदि गुरु शनि के घर राहु के साथ स्थित हो, तो रोगों का प्रकोप बना रहता है।इस भाव का गुरु वैद्य, डाक्टर और अधिवक्ताओं हेतु अशुभ है। इस भाव के गुरु के जातक के बारे में लोग संदिग्ध और संशयात्मा रहते हैं। पुरुष राशि में गुरु होने पर जुआ, शराब और वेश्या से प्रेम होता है। इन्हें मधुमेह, बहुमूत्रता, हर्निया आदि रोग हो सकते हैं। धनेश होने पर पैतृक संपत्ति से वंचित रहना पड़ सकता है। 

7. सप्तम भाव में -

जिस जातक के जन्म लग्न से सप्तम भाव में बृहस्पति हो, तो ऐसा जातक, बुद्धिमान, सर्वगुणसंपन्न, अधिक स्त्रियों में आसक्त रहने वाला, धनी, सभा में भाषण देने में कुशल, संतोषी, धैर्यवान, विनम्र और अपने पिता से अधिक और उच्च पद को प्राप्त करने वाला होता है। इसकी पत्नी पतिव्रता होती है। मेष, सिंह, मिथुन एवं धनु में गुरु हो, तो शिक्षा के लिए श्रेष्ठ है, जिस कारण ऐसा व्यक्ति विद्वान, बुद्धिमान, शिक्षक, प्राध्यापक और न्यायाधीश हो सकता है। 

8. अष्टम भाव में -

जिस व्यक्ति के अष्टम भाव में बृहस्पति होता है, वह पिता के घर में अधिक समय तक नहीं रहता। वह कृशकाय और दीर्घायु होता है। द्वितीय भाव पर पूर्ण दृष्टि होने के कारण धनी होता है। वह कुटुंब से स्नेह रखता है। उसकी वाणी संयमित होती है। यदि शत्रु राशि में गुरु हो, तो जातक शत्रु से घिरा हुआ, विवेकहीन, सेवक, निम्न कार्यों में लिप्त रहने वाला और आलसी होता है।स्वग्रही एवं शुभ राशि में होने पर जातक ज्ञानपूर्वक किसी उत्तम स्थान पर मृत्यु को प्राप्त करता है। वह सुखी होता है। बाह्य संबंधों से लाभान्वित होता है। स्त्री राशि में होने के कारण अशुभ फल और पुरुष राशि में होने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। 

9. नवम स्थान में -

जिस जातक के नवम स्थान में बृहस्पति हो, उसका घर चार मंजिल का होता है। धर्म में उसकी आस्था सदैव बनी रहती है। उसपर राजकृपा बनी रहती है, अर्थात जहां भी नौकरी करेगा, स्वामी की कृपा दृष्टि उसपर बनी रहेगी। वह उसका स्नेह पात्र होगा। बृहस्पति उसका धर्म पिता होगा। सहोदरों के प्रति वह समर्पित रहेगा और ऐश्वर्यशाली होगा। उसका भाग्यवान होना अवश्यंभावी है और वह विद्वान, पुत्रवान, सर्वशास्त्रज्ञ, राजमंत्री एवं विद्वानों का आदर करने वाला होगा। 

10. दसवें भाव में -

जिस जातक के दसवें भाव में बृहस्पति हो, उसके घर पर देव ध्वजा फहराती रहती है। उसका प्रताप अपने पिता-दादा से कहीं अधिक होता है। उसको संतान सुख अल्प होता है। वह धनी और यशस्वी, उत्तम आचरण वाला और राजा का प्रिय होता है। इसे मित्रों का, स्त्री का, कुटुंब का धन और वाहन का पूर्ण सुख प्राप्त होता है। दशम में रवि हो, तो पिता से,चंद्र हो, तो माता से, बुध हो, तो मित्र से, मंगल हो, तो शत्रु से, गुरु हो, तो भाई से, शुक्र हो, तो स्त्री से एवं शनि हो, तो सेवकों से उसे धन प्राप्त होता है। 

11. एकादश भाव में -

जिस जातक के एकादश भाव में बृहस्पति हो, उसकी धनवान एवं विद्वान भी सभा में स्तृति करते हैं। वह सोना- चांदी आदि अमूल्य पदार्थों का स्वामी होता है। वह विद्यावान, निरोगी, चंचल, सुंदर एवं निज स्त्री प्रेमी होता है। परंतु कारक: भावों नाश्यति, के कारण इस भाव के गुरु के फल सामान्य ही दृष्टिगोचर होते हैं, अर्थात इनके शुभत्व में कमी आती है। 

12. द्वादश भाव में -

जिस जातक के द्वादश भाव में बृहस्पति हो, तो उसका द्रव्य अच्छे कार्यों में व्यय होने के पश्चात भी, अभिमानी होने के कारण, उसे यश प्राप्त नहीं होता है। निर्धन , भाग्यहीन, अल्प संतति वाला और दूसरों को किस प्रकार से ठगा जाए, सदैव ऐसी चिंताओं में वह लिप्त रहता है। वह रोगी होता है और अपने कर्मों के द्वारा शत्रु अधिक पैदा कर लेता है। उसके अनुसार यज्ञ आदि कर्म व्यर्थ और निरर्थक हैं। आयु का मध्य तथा उत्तरार्द्ध अच्छे होते हंै। इस प्रकार यह अनुभव में आता है कि गुरु कितना ही शुभ ग्रह हो, लेकिन यदि अशुभ स्थिति में है, तो उसके फलों में शुभत्व की कमी हो जाती है और अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं और शुभ स्थिति में होने पर गुरु कल्याणकारी होता है।
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ 

श्रीमद्भागवतमहापुराण 
प्रथम स्कन्ध--दूसरा अध्याय..

भगवत्कथा और भगवद्भक्ति का माहात्म्य

सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तैः
     युक्तः परः पुरुष एक इहास्य धत्ते ।
स्थित्यादये हरिविरिञ्चिहरेति संज्ञाः
     श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनोः नृणां स्युः ॥ २३ ॥
पार्थिवाद् दारुणो धूमः तस्मादग्निस्त्रयीमयः ।
तमसस्तु रजस्तस्मात् सत्त्वं यद् ब्रह्मदर्शनम् ॥ २४ ॥
भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तं अधोक्षजम् ।
सत्त्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पन्ते येऽनु तानिह ॥ २५ ॥
मुमुक्षवो घोररूपान् हित्वा भूतपतीनथ ।
नारायणकलाः शान्ता भजन्ति ह्यनसूयवः ॥ २६ ॥
रजस्तमःप्रकृतयः समशीला भजन्ति वै ।
पितृभूतप्रजेशादीन् श्रियैश्वर्यप्रजेप्सवः ॥ २७ ॥

प्रकृतिके तीन गुण हैं—सत्त्व, रज और तम। इनको स्वीकार करके इस संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयके लिये एक अद्वितीय परमात्मा ही विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र—ये तीन नाम ग्रहण करते हैं। फिर भी मनुष्योंका परम कल्याण तो सत्त्वगुण स्वीकार करनेवाले श्रीहरिसे ही होता है ॥ २३ ॥ जैसे पृथ्वीके विकार लकड़ीकी अपेक्षा धुआँ श्रेष्ठ है और उससे भी श्रेष्ठ है अग्रि— क्योंकि वेदोक्त यज्ञ-यागादिके द्वारा अग्रि सद्गति देनेवाला है—वैसे ही तमोगुणसे रजोगुण श्रेष्ठ है और रजोगुणसे भी सत्त्वगुण श्रेष्ठ है; क्योंकि वह भगवान्‌का दर्शन करानेवाला है ॥ २४ ॥ प्राचीन युगमें महात्मालोग अपने कल्याणके लिये विशुद्ध सत्त्वमय भगवान्‌ विष्णुकी ही आराधना किया करते थे। अब भी जो लोग उनका अनुसरण करते हैं, वे उन्हींके समान कल्याणभाजन होते हैं ॥ २५ ॥ जो लोग इस संसारसागरसे पार जाना चाहते हैं, वे यद्यपि किसीकी निन्दा तो नहीं करते, न किसीमें दोष ही देखते हैं, फिर भी घोररूपवाले—तमोगुणी-रजोगुणी भैरवादि भूतपतियोंकी उपासना न करके सत्त्वगुणी विष्णुभगवान्‌ और उनके अंश—कलास्वरूपोंका ही भजन करते हैं ॥ २६ ॥ परन्तु जिसका स्वभाव रजोगुणी अथवा तमोगुणी है, वे धन, ऐश्वर्य और संतान की कामना से भूत, पितर और प्रजापतियोंकी उपासना करते हैं; क्योंकि इन लोगोंका स्वभाव उन (भूतादि) से मिलता-जुलता होता है ॥ २७ ॥
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कुंडली से जानें क्या, कैसे और कितनी पढ़ाई करेगी आपकी संतान 
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शिक्षा मनुष्य को विनयशील बनाती है। विनयशीलता से योग्यता और योग्यता हो तो धन की प्राप्ति होती है। धन हो तो मनुष्य के मन में धर्म के प्रति आस्था का संचार होता है और जहां धर्म होता है और फिर उसे सुखों की प्राप्ति होती है। ऐसे में प्रत्येक माता-पिता का यह परम कर्तव्य बनता है कि वे अपनी संतान की बेहतर शिक्षा की व्यवस्था करे। चाणक्य ने भी कहा है कि संतान को विद्या में लगाना चाहिए क्योंकि नीतिका: शील सम्पन्ना: भवति कुल पूजिता:।' अर्थात नीतिमान तथा शील संपन्न कुल में नीतिमान तथा शील संपन्न व्यक्ति का ही पूजन होता है। लेकिन अक्सर लोगों के सामने यक्ष प्रश्न होता है कि आखिर उनकी संतान क्या पढ़ाई करे, जिससे उसका उज्जवल भविष्य बने। ज्योतिष के पास इसका सटीक जवाब होता है, जिसके जरिए आप अपने बच्चे को सही दिशा दे सकते हैं।

मसलन, किसी जातक की कुंडली में यदि भावेश सुदृण हों और नवांश में शुभ ग्रह हो तो उसके उच्च शिक्षा का योग बनता है। जातक की कुंडली में शिक्षा का के योग को देखने के लिए उसकी कुंडली के द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, नवम तथा एकादश आदि भावों की विवेचना की जाती है। उच्च शिक्षा हेतु जातक की कुंडली में बुधादित्य योग, गज केसरी योग, उपाध्याय योग, हंस योग, सरस्वती योग आदि होने चाहिए ।

द्वितीय भाव : आज के दौर में शिक्षा अर्जित करने के लिए आर्थिक स्थिति का मजबूत होना बहुत आवश्यक है, और आर्थिक स्थिति देखने के लिए जातक की कुंडली में द्वितीयेश तथा लाभेश केंद्र में हों तथा दोनों के बीच गृह परिवर्तन होना चाहिए।

चतुर्थ भाव : शिक्षा कैसे संस्थान में होगी इसकी जानकारी के लिए कुंडली के चतुर्थ भाव की पड़ताल की जाती है, यदि व्यक्ति की कुंडली में चतुर्थेश बली होता है तो व्यक्ति की शिक्षा बड़े संस्थानों में होती है।

पंचम भाव : व्यक्ति की बुद्धिमता का परीक्षण करने के लिए कुंडली के पंचम भाव का विश्लेषण किया जाता है । पंचमेश का अन्य ग्रहों से कैसा संबंध है आदि की पड़ताल करके व्यक्ति के बौद्धिक स्तर की जांच की जाती है।

नवम भाव : जातक की उच्च शिक्षा की जानकारी नवम भाव से की जाती है यदि कुंडली में नवमेश का नवांश वर्गोत्तम या शुभ वर्ग है तो व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त करता है।

एकादश भाव : मजबूत एकादशेश का नवमेश तथा पंचमेश के साथ केंद्र त्रिकोण में दृष्टि या युति सम्बन्ध हो तो उच्च शिक्षा का योग बनता है।

ग्रहों की दृष्टि से देखें तो किसी भी जातक की कुंडली में मौजूद तमाम स्थिति को देखकर जाना जा सकता है कि बच्चा पढ़ाई में कैसा होगा और किस क्षेत्र में कामयाब होगा —

चंद्र - यदि कुंडली में चंद्र वृश्चिक का हो तो, स्मरण शक्ति काफी मजबूत होती है। चंद्र के बलाबल और दुर्बलता से व्यक्ति की स्मरण शक्ति की जानकारी प्राप्त होती है यदि चंद्र दुर्बल है और सही स्थान पर नहीं है तो व्यक्ति की स्मरण शक्ति काफी कमजोर होती है। बली चंद्र केंद्र त्रिकोण तथा शुक्ल पक्ष की पंचमी तक हो, तो व्यक्ति की स्मरण शक्ति काफी मजबूत होती है।  

बुध - जातक की गणितीय क्षमता, अभिव्यक्ति और आंकलन की क्षमता, सहज बुद्धि, विश्लेषण क्षमता, वाक् शक्ति, विश्लेषण क्षमता लेखन क्षमता आदि का पता बुध ग्रह के बलाबल से चलता है।

सूर्य - सूर्य की स्थिति से व्यक्ति की तेजस्विता और सफलता का आंकलन किया जाता है।
व्यक्ति के पंचम भाव तथा नवम भाव का सम्बन्ध व्यक्ति की तकनीकी शिक्षा से है। कुंडली में शनि, राहु, केतु तथा मंगल का सम्बन्ध उच्च तकनीकी शिक्षा से होता है।

उच्च शिक्षा प्राप्त करने के तीन मार्ग हैं - योग्यता के आधार पर, राजकीय शिक्षण संस्थाओं में नामांकन से और डोनेशन देकर प्रबंधन पाठ्यक्रम में नामांकन के जरिए। जिन छात्रों की जन्मकुंडली में गुरु केंद्र में हो, एकादशेश, पंचमेश तथा नवमेश भी केंद्र त्रिकोण तथा एकादश भाव में हों तो ऐसे प्रतिभावान छात्र योग्यता के आधार पर चयनित प्रतियोगिता परीक्षा में सफल होते हैं और उनका नामांकन राजकीय शिक्षण संस्थाओं में होता है।

पेमेंट - जातक की जन्मकुंडली में द्वितीय, पंचम तथा नवम तथा एकादश भाव की संधियों के नक्षत्रों के स्वामियों या केंद्र में या द्वितीय भाव में हो तथा नवम और द्वितीय भावों के स्वामियों के नक्षत्र के साथ यथा द्वादश भाव की संधि के नक्षत्र के स्वामियों के उपस्वामियों का सम्बन्ध इनके साथ हो तो ऐसे जातक का नामांकन पेमेंट शीट पर होता है।

डोनेशन - जब कुंडली में पंचमेश या नवमेश बली होकर केंद्र या त्रिकोण में हो तथा दोनों का द्वादशेश से युति या दृष्टि सम्बन्ध हो और पंचमेश, नवमेश तथा द्वितीयेश के नवांश में यदि द्वादशेश पड़ता हो तो जातक का नामांकन डोनेशन द्वारा होता है।

विदेश शिक्षा- जातक की कुंडली में यदि नवमेश पक्षी द्रेष्काण में हो तो व्यक्ति शिक्षा हेतु या किसी विषय में विशेषज्ञता हेतु विदेश जाने का योग बनता है। यदि पंचमेश, नवमेश तथा चतुर्थेश का सम्बन्ध या इनके उपस्वामियों का सम्बन्ध युति दृष्टि या अन्य ढंग से द्वादश एवं अष्टम भाव से हो तो व्यक्ति विदेश में शिक्षा ग्रहण करता है

पंचम तथा नवम भाव जिस जिस गृह के प्रभाव में होते हैं व्यक्ति की शिक्षा उस ग्रह से सम्बंधित विषयों में होती है। कुंडली में ग्रहों से सम्बंधित विषयों का संक्षिप्त विवरण —

सूर्य : दवा रसायन, प्रशासन राजनीति शास्त्र, आदि ।

चंद्र : समुद्र अभियंत्रण, मत्स्य पालन, संगीत, नर्स, गृहविज्ञान, टेक्सटाइल टेक्नोलॉजी, खेती, मनोविज्ञान आदि।

मंगल : सभी प्रकार का अभियंत्रण विशेषकर मेटलर्जी तथा माइनिंग, सर्जरी, पदार्थ विज्ञान, दवा, युद्ध विद्या आदि।

बुध : वाणिज्य, चार्टेड अकॉउंटेन्सी बैंकिंग, पत्रकारिता, गणित आर्किटेक आदि।

गुरु : धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र, मानवशास्त्र, समाज विज्ञान आदि।

शुक्र: सुन्दर्य, प्रसाधन, नाट्य, सिनेमा, आर्किटेक्चर, फैशन डिज़ाइनर आदि।

शनि : कृषि मैकैनिकल इंजीनियरिंग, आर्किओलॉजी, इतिहास, वनस्पति शास्त्र, ज्योतिष।

राहु व केतु : ज्योतिष, तंत्र, लेदर टेक्नोलॉजी, विष विद्या, कंप्यूटर विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलीकम्युनिकेशन आदि।

कुंडली विश्लेषण के लिए अवश्य सम्पर्क करे। 

सम्पर्क - 004797335299

                  ।पंडित दिनेश शास्त्री  ।।

जानें पंचमुखी हनुमान जी की साधना का रहस्य और पूजा की विधि...हिंदू धर्म में संकटमोचन श्री हनुमान जी की साधना अत्यंत ही शुभ और शीघ्र फलदायी मानी जाती है। मान्यता है कि सप्त चिरंजीवी में से एक श्री हनुमान जी, पृथ्वी पर प्रत्येक युग में मौजूद रहते हैं और सच्चे मन से सुमिरन करने पर अपने भक्तों की मदद करते हैं। यही कारण है कि कलियुग में बड़ी संख्या में लोग उनकी उपासना करते हैं। शक्ति के पुंज माने जाने वाले पवन पुत्र हनुमान जी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा का अलग-अलग फल मिलता है। इसमें पंचमुखी हनुमान जी की साधना का विशेष धार्मिक महत्व है।मान्यता है कि जब भगवान श्रीराम के साथ युद्ध करते समय रावण को अपनी हार नज़र आने लगी, तो उससे बचने के लिए उसने अपने भाई अहिरावण को युद्ध के मैदान में भेजा। अहिरावण, मां भवानी का भक्त और रावण की तरह तंत्र-मंत्र का ज्ञाता था। अहिरावण जब युद्ध के मैदान में गया तो उसने अपनी माया से भगवान राम की सेना को सुला दिया और श्री राम और लक्ष्मण जी को बंदी बना कर पाताल लोक ले गया। इसके बाद जब माया का असर कम हुआ तो होश में आने पर विभीषण ने समझ लिया कि यह काम अहिरावण का है। तो उन्होंने इस संकट से उबरने के लिए श्री हनुमान जी को, देवी के परम भक्त अहिरावण का राज़ बताकर पाताल लोक भेजा।हनुमान जी जब पाताल लोक पहुंचे तो उन्होंने पाया कि अहिरावण ने मां भवानी के लिए पांच अलग-अलग दिशाओं में पांच दीपक जला रखे थे। जिसके बारे में विभीषण ने उन्हें बताया था कि एक साथ उन्हें बुझाने पर अहिरावण का वध हो जाएगा। तब अहिरावण के वध के लिए हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया। जिसमें उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की तरफ़ हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख शामिल हैं।मान्यता है कि जिस घर में पंचमुखी हनुमान की तस्वीर या मूर्ति की पूजा होती है, वहां स्थित सभी प्रकार के वास्तु दोष दूर हो जाते हैं। पंचमुखी हनुमान जी की कृपा से साधक को शक्ति, सुख, संपन्नता और सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। उसे जीवन में किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता। पंचमुखी हनुमान जी की साधना से साधक को शत्रुओं पर शीघ्र ही विजय प्राप्त होती है और उसके जीवन में किसी भी प्रकार के भय या फिर बाधा का स्थान नहीं रहता है। हनुमान जन्मोत्सव या फिर किसी भी मंगलवार के दिन से पंचमुखी हनुमान जी की मूर्ति के सामने शुद्ध घी का दीया जला कर उनकी महिमा का गुणगान या उनके मंत्रों का जाप करें। इस उपाय को करने पर आपको शीघ्र ही परेशानियों से छुटकारा मिल सकता है।

जानें पंचमुखी हनुमान जी की साधना का रहस्य और पूजा की विधि...

हिंदू धर्म में संकटमोचन श्री हनुमान जी की साधना अत्यंत ही शुभ और शीघ्र फलदायी मानी जाती है। मान्यता है कि सप्त चिरंजीवी में से एक श्री हनुमान जी, पृथ्वी पर प्रत्येक युग में मौजूद रहते हैं और सच्चे मन से सुमिरन करने पर अपने भक्तों की मदद करते हैं। यही कारण है कि कलियुग में बड़ी संख्या में लोग उनकी उपासना करते हैं। शक्ति के पुंज माने जाने वाले पवन पुत्र हनुमान जी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा का अलग-अलग फल मिलता है। इसमें पंचमुखी हनुमान जी की साधना का विशेष धार्मिक महत्व है।

मान्यता है कि जब भगवान श्रीराम के साथ युद्ध करते समय रावण को अपनी हार नज़र आने लगी, तो उससे बचने के लिए उसने अपने भाई अहिरावण को युद्ध के मैदान में भेजा। अहिरावण, मां भवानी का भक्त और रावण की तरह तंत्र-मंत्र का ज्ञाता था। अहिरावण जब युद्ध के मैदान में गया तो उसने अपनी माया से भगवान राम की सेना को सुला दिया और श्री राम और लक्ष्मण जी को बंदी बना कर पाताल लोक ले गया। इसके बाद जब माया का असर कम हुआ तो होश में आने पर विभीषण ने समझ लिया कि यह काम अहिरावण का है। तो उन्होंने इस संकट से उबरने के लिए श्री हनुमान जी को, देवी के परम भक्त अहिरावण का राज़ बताकर पाताल लोक भेजा।

हनुमान जी जब पाताल लोक पहुंचे तो उन्होंने पाया कि अहिरावण ने मां भवानी के लिए पांच अलग-अलग दिशाओं में पांच दीपक जला रखे थे। जिसके बारे में विभीषण ने उन्हें बताया था कि एक साथ उन्हें बुझाने पर अहिरावण का वध हो जाएगा। तब अहिरावण के वध के लिए हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया। जिसमें उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की तरफ़ हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख शामिल हैं।

मान्यता है कि जिस घर में पंचमुखी हनुमान की तस्वीर या मूर्ति की पूजा होती है, वहां स्थित सभी प्रकार के वास्तु दोष दूर हो जाते हैं। पंचमुखी हनुमान जी की कृपा से साधक को शक्ति, सुख, संपन्नता और सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। उसे जीवन में किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता। पंचमुखी हनुमान जी की साधना से साधक को शत्रुओं पर शीघ्र ही विजय प्राप्त होती है और उसके जीवन में किसी भी प्रकार के भय या फिर बाधा का स्थान नहीं रहता है। 

हनुमान जन्मोत्सव या फिर किसी भी मंगलवार के दिन से पंचमुखी हनुमान जी की मूर्ति के सामने शुद्ध घी का दीया जला कर उनकी महिमा का गुणगान या उनके मंत्रों का जाप करें। इस उपाय को करने पर आपको शीघ्र ही परेशानियों से छुटकारा मिल सकता है।

Saturday, January 27, 2024

माघमास मे (स्नान-दान का फल) एवं व्रत त्यौहार 
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माघ एक ऐसा माह जो भारतीय संवत्सर का ग्यारहवां चंद्रमास व दसवां सौरमास कहलाता है। दरअसल मघा नक्षत्र युक्त पूर्णिमा होने के कारण यह महीना माघ का महीना कहलाता है। वैसे तो इस मास का हर दिन पर्व के समान जाता है। लेकिन कुछ खास दिनों का खास महत्व भी इस महीने में हैं। उत्तर भारत में 25 जनवरी को पौष पूर्णिमा के साथ ही माघ स्नान की शुरुआत हो जायेगी जिसका समापन 24 फरवरी को माघी पूर्णिमा के दिन होगा।

महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 106 के अनुसार 

माघं तु नियतो मासमेकभक्तेन य: क्षिपेत्।
श्रीमत्कुले ज्ञातिमध्ये स महत्त्वं प्रपद्यते।। 

अर्थात जो माघ मास में नियमपूर्वक एक समय भोजन करता है, वह धनवान कुल में जन्म लेकर अपने कुटुम्बजनों में महत्व को प्राप्त होता है।

पद्मपुराण, उत्तरपर्व में कहा गया है 

ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी।
मासानां च तथा माघः श्रेष्ठः सर्वेषु कर्मसु।।

अर्थात जैसे ग्रहों में सूर्य और नक्षत्रों में चन्द्रमा श्रेष्ठ है, उसी प्रकार महीनों में माघ मास श्रेष्ठ है।

माघ में मूली का त्याग करना चाहिए। देवता और पितर को भी मूली अर्पण न करें।  

माघ में तिलों का दान जरूर जरूर करना चाहिए। विशेषतः तिलों से भरकर ताम्बे का पात्र दान देना चाहिए। 

महाभारत अनुशासन पर्व के 66वें अध्याय के अनुसार 

माघ मासे तिलान् यस्तु ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति। सर्वसत्वसमकीर्णं नरकं स न पश्यति॥

जो माघ मास में ब्राह्मणों को तिल दान करता है, वह समस्त जन्तुओं से भरे हुए नरक का दर्शन नहीं करता। 

श्री हरि नारायण को माघ मास अत्यंत प्रिय है। वस्तुत: यह मास प्रातः स्नान (माघ स्नान), कल्पवास, पूजा-जप-तप, अनुष्ठान, भगवद्भक्ति, साधु-संतों की कृपा प्राप्त करने का उत्तम मास है। माघ मास की विशिष्टता का वर्णन करते हुए महामुनि वशिष्ठ ने कहा है, ‘जिस प्रकार चंद्रमा को देखकर कमलिनी तथा सूर्य को देखकर कमल प्रस्फुटित और पल्लवित होता है, उसी प्रकार माघ मास में साधु-संतों, महर्षियों के सानिध्य से मानव बुद्धि पुष्पित, पल्लवित और प्रफुल्लित होती है। यानी प्राणी को आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। 

माघ स्नान का महात्म्य
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'पद्म पुराण' के उत्तर खण्ड में माघ मास के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि व्रत, दान व तपस्या से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी माघ मास में ब्राह्ममुहूर्त में उठकर स्नानमात्र से होती है।

              व्रतैर्दानस्तपोभिश्च  न  तथा  प्रीयते  हरिः। 
              माघमज्जनमात्रेण यथा प्रीणाति केशवः।। 

          अतः सभी पापों से मुक्ति व भगवान की प्रीति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ-स्नान व्रत करना चाहिए। इसका प्रारम्भ पौष की पूर्णिमा से होता है। 
         
माघ मास की ऐसी विशेषता है कि इसमें जहाँ कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान होता है। इस मास की प्रत्येक तिथि पर्व हैं। कदाचित् अशक्तावस्था में पूरे मास का नियम न ले सकें तो शास्त्रों ने यह भी व्यवस्था की है तीन दिन अथवा एक दिन अवश्य माघ-स्नान व्रत का पालन करें। इस मास में स्नान, दान, उपवास और भगवत्पूजा अत्यन्त फलदायी है।
         
माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी 'षटतिला एकादशी' के नाम से जानी जाती है। इस दिन काले तिल तथा काली गाय के दान का भी बड़ा माहात्म्य है।

1. तिल मिश्रित जल से स्नान, 2. तिल का उबटन, 3. तिल से हवन, 4. तिलमिश्रित जल का पान व तर्पण, 5. तिलमिश्रित भोजन, 6. तिल का दान।

ये छः कर्म पाप का नाश करने वाले हैं।माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या 'मौनी अमावस्या' के रूप में प्रसिद्ध है। इस पवित्र तिथि पर मौन रहकर अथवा मुनियों के समान आचरणपूर्वक स्नान दान करने का विशेष महत्त्व है। 
         
मंगलवारी चतुर्थी, रविवारी सप्तमी, बुधवारी अष्टमी, सोमवारी अमावस्या, ये चार तिथियाँ सूर्यग्रहण के बराबर कही गयी हैं। इनमें किया गया स्नान, दान व श्राद्ध अक्षय होता है।
         
माघ शुक्ल पंचमी अर्थात् 'वसंत पंचमी' को माँ सरस्वती का आविर्भाव-दिवस माना जाता है। इस दिन प्रातः सरस्वती-पूजन करना चाहिए। पुस्तक और लेखनी (कलम) में भी देवी सरस्वती का निवास स्थान माना जाता है, अतः उनकी भी पूजा की जाती है।
         
शुक्ल पक्ष की सप्तमी को 'अचला सप्तमी' कहते हैं। षष्ठी के दिन एक बार भोजन करके सप्तमी को सूर्योदय से पूर्व स्नान करने से पापनाश, रूप, सुख-सौभाग्य और सदगति प्राप्त होती है।
         
ऐसे तो माघ की प्रत्येक तिथि पुण्यपर्व है, तथापि उनमें भी माघी पूर्णिमा का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है। इस दिन स्नानादि से निवृत्त होकर भगवत्पूजन, श्राद्ध तथा दान करने का विशेष फल है। जो इस दिन भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर भगवान विष्णु के लोक में प्रतिष्ठित होता है।
         
माघी पूर्णिमा के दिन तिल, सूती कपड़े, कम्बल, रत्न, पगड़ी, जूते आदि का अपने वैभव के अनुसार दान करके मनुष्य स्वर्गलोक में सुखी होता है। 'मत्स्य पुराण' के अनुसार इस दिन जो व्यक्ति 'ब्रह्मवैवर्त पुराण' का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

माघ मास के व्रत त्यौहार
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26 जनवरी 👉 भारतीय गणतंत्र दिवस, दशाश्वमेघ घाट (काशी) स्नान आरम्भ।

29 जनवरी 👉 संकष्ट माघी तिल चतुर्थी।

2 फरवरी 👉 श्री रामानन्दाचार्य जयन्ती, सर्वाप्ति सप्तमी, कालाष्टमी।

3 फरवरी 👉 स्वामी विवेकानन्द जयन्ती (तिथि प्रमाण)।

6 फरवरी 👉 षटतिला एकादशी व्रत (सभी के लिए)।

7 जनवरी 👉 प्रदोष व्रत।

8 जनवरी 👉 मासिक शिवरात्री, मेरू त्रयोदशी जैन।

9 जनवरी 👉 देवपितृ कार्ये मौनी अमावस्या।

10 जनवरी 👉 गुप्त नवरात्रि विधान प्रारम्भ, पंचक आरम्भ 10:01 से.

11 जनवरी 👉 चन्द दर्शन, शुक्र मकर में 28:51 से, शनि पश्चिम अस्त 29:15 से, बाबा रामदेव बीज।

12 जनवरी 👉 गौरी तृतीया, तिल (कुन्द) चतुर्थी।

13 जनवरी 👉 संक्रान्ति सूर्य कुम्भ में 15:41 से (पुण्यकाल 09:20 ये तक), वरद विनायक चतुर्थी।

14 जनवरी 👉 बसंत पंचमी, सरस्वती जन्मोत्सव, पंचक समाप्त 10:42 पर.

15 जनवरी 👉 शीतला षष्ठी (बंगाल), मंदार षष्ठी।

16 जनवरी 👉 अचला-रथ-आरोग्य सप्तमी, श्री नर्मदा जयन्ती, भीमाष्टमी।

17 जनवरी 👉 खोडियार माँ जयन्ती।

18 जनवरी 👉 गुप्त नवरात्रि समाप्त, महानन्दा नवमी.

19 जनवरी 👉 वसन्त ऋतु प्रारम्भ, शिवाजी जयन्ती (ता०प्र०).

20 जनवरी 👉 जया एकादशी व्रत (सभी के लिए), भीष्म द्वादशी।

21 जनवरी 👉 प्रदोष व्रत, तिल द्वादशी।

22 जयन्ती 👉 विश्वकर्मा जयन्ती, गुरू गोरखनाथ जयन्ती, गुरू पुष्य योग।

23 जयन्ती 👉 श्री सत्यनारायण (पूर्णिमा) व्रत, स्वामी करपात्री जी पुण्य।

24 जयन्ती 👉 स्नान-दान हेतु माघी पूर्णिमा, गुरू रविदास जयन्ती, श्री ललिता जयन्ती, माघ स्नान पूर्ण, भैरवी जयन्ती।

माघ मास में प्रतिदिन माघ महात्म्य पाठ के एक अध्याय पोस्ट किया जाएगा।
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Wednesday, October 11, 2023

श्राद्ध के प्रकार
१. आन्तरिक श्राद्ध-(आदरणीय कृपाशंकर मुद्गल जी से) इसमें स्थूल तत्त्वों का क्रमशः सूक्ष्म तत्त्वों में लय होता है। भगवान् के परम धाम जाने पर युधिष्ठिर द्वारा साधना क्रम-वाक् की मन में आहुति, मन की प्राण में, प्राण की अपान में, उत्सर्ग सहित अपान की मृत्यु में, मृत्यु की पञ्चत्व में, पञ्चत्वकी त्रित्व में, त्रित्व की एकत्व में, आत्मा की आहुति अव्यय में की।
वाचं जुहाव मनसि तत्प्राणे इतरे च तं।
मृत्यावपानं सोत्सर्गं तं पञ्चत्वेह्यजोहवीत्॥४१॥
त्रित्वे हुत्वाथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः।
सर्वमात्मन्यजुहवीद् ब्रह्मण्यात्मानमव्यये॥४२॥
(भागवत पुराण, १/१५/४१-४२)
हर चक्र से क्रमशः उत्थान का प्रतीक है, दूर्वा जो हर काण्ड से बढ़ती है। दूर्वा दान का मन्त्र है-
काण्डात् काण्डात् प्ररोहन्ति परुषः परुषस्परि। एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्रेण शतेन च॥ (पुरुष सूक्त, वाज. यजु, १३/२०)
इसका आरम्भ मूलाधार के अन्नमय कोष से होता है-
तदन्नेनातिरोहति (पुरुष सूक्त, २)
अन्नमय कोष अर्थात् मूलाधार के भूमि तत्त्व से ऊपर क्रमशः जल, अग्नि, वायु, आकाश और मन तत्त्व वाले चक्रों को पार परने पर पराशक्ति कुण्डलिनी सहस्रार में परमेश्वर के साथ विहार करती है-
महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं, स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्त्वा कुलपथं, सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसि॥
(सौन्दर्य लहरी, ९) 
२. पार्वण श्राद्ध- प्रतिवर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष में सभी पितरों का श्राद्ध किया जाता है। अमावास्या के दिन ज्ञात अज्ञात सभी पितरों का श्राद्ध होता है। माता-पिताका श्राद्ध उनकि मृत्यु तिथि के अनुसार होगा। उनका वार्षिक श्राद्ध भी मृत्यु की मास-तिथि के अनुसार होगा। ५ दैनिक महायज्ञों में एक पितृ यज्ञ है जिसमें पितरों को दैनिक जल द्वारा तर्पण करते हैं।
३. एकोद्दिष्ट-दशगात्र-किसी एक व्यक्ति के लिए किया जाता है। सृष्टि का आरम्भ १० सर्गों में हुआ-१ अव्यक्त से ९ व्यक्त सर्ग। इनको ब्रह्मा का दिन कहा गया है-अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वे प्रभवन्त्यहरागमे। (गीता, ८/१८)। वेद में निर्माण काल को रात्रि कहा है। शान्त स्थिति में ही गर्भ में निर्माण कार्य होता है। अतः गर्भ धारण करने वाली देवी की पूजा रात्रि में होती है।
श्रीः वै दशमम् अहः (ऐतरेय ब्राह्मण, ५/२२)
मितमेव देवकर्म्म यद्दशममहः (कौषीतकि ब्राह्मण, २७/१)
अथ यद्दशरात्रं उपयन्ति। विश्वानेव देवान् देवतां यजन्ते (शतपथ ब्राह्मण, १२/१/३/१७)
मनुष्य का गर्भ में निर्माण चान्द्र मण्डल (चन्द्र कक्षा का गोल) में भृगु (सूर्य आकर्षण द्वारा ब्रह्माण्ड का सोम) तथा अंगिरा (सूर्य से प्रकाश विकिरण-अंगारा) के मिलन से होता है।
भृगूणाम् अङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम्॥ (वाज. यजु, १/१८)
इत्येतद् वै तेजिष्ठं तेजो यद् भृगु-अङ्गिरसाम् (शतपथ ब्राह्मण, १/२/१/१३)
अथ नयन समुत्थं ज्योतिरत्रेरिवद्यौः सुरसरिदिव तेजो वह्निनिष्ठ्यूतमैशम्।
नरपतिकुलभूत्यै गर्भमाधत्त राज्ञी गुरुभिरभिनिविष्टं लोकपालानुभावैः॥ (रघुवंश २/७५)  
(नयन = सूर्य रूप चक्षु, समुत्थ ज्योति = अंगिरा, सुरसरि या आकाशगंगा का तेज = सोम)
अतः मनुष्य का जन्म चन्द्र की १० परिक्रमा (२७३ दिन में होता है। प्रेत शरीर चान्द्र लोक (चन्द्र माण्डला का बाह्य भाग) का है। उसका जन्म पृथ्वी के १० अक्ष भ्रमण (दिन) में होता है। १० दिन में प्रेत शरीर के निर्माण को दशगात्र कहते हैं। उसके बाद ११वें दिन श्राद्ध होता है। किन्तु अशौच १३ दिन रहता है। १ वर्ष में चन्द्र की १३ परिक्रमा (१२ तिथि चक्र सूर्य तुलना में) के प्रतीक १३ दिन हैं। महाभारत में बहुत बड़ा नर संहार होने के कारण ३० दिन का अशौच पालन हुआ था। 
४. एकोद्दिष्ट के भेद-
(१) विष्णु के ३ पद और परम पद-यह मुझे मुंगेर के एक विद्वान् महापात्र ने १९९९ ई. में बड़े भाई के श्राद्ध के समय बताया था। पण्डित ठीक से मन्त्र नहीं पढ़ पा रहे थे, तो उन्होंने कहा कि अशुद्ध उच्चारण द्वारा वेद का अपमान नहीं करें और पण्डित के बदले स्वयं पाठ किया। उसकी दक्षिणा भी पण्डित को ही दी। उसके बाद चर्चा में उन्होंने २ वैदिक मन्त्रों का अर्थ बताया। गुरु दक्षिणा रूप में उन्होंने महापात्र का अर्थ पूछा।
श्राद्ध में २ वैदिक मन्त्र श्राद्ध के भेद बताते हैं।
इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूळ्हमस्य पांसुरे॥१७॥
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥२०॥
(ऋक्, १/२२/१७, २०)
ब्रह्म का चेतन या क्रिया रूप विष्णु है। उस परमात्मा की प्रतिमा मनुष्य आत्मा है। दोनों की गति एक प्रकार की है। विष्णु का प्रत्यक्ष रूप सूर्य है, जो प्रथम सविता या पिता है। उसका पिता ब्रह्माण्ड है, और उसका भी अन्तिम जनक परम-पिता या ब्रह्म है। इसे गायत्री मन्त्र में तत्-सविता कहा गया है। दृश्य सविता सूर्य है।
सूर्य के ३ पद इस पांसु (धूलि समूह, यह सौर मण्डल) में हैं। ताप क्षेत्र पृथ्वी तक अर्थात् सूर्य से १०० सूर्य व्यास दूर है। यहां सूर्य का रुद्र तेज शान्त होता है, अतः १०० को शत (शान्त) कहते हैं। १०० वर्ष बाद मनुष्य भी शान्त हो जाता है। 
तद्यदेतँ शतशीर्षाणँ रुद्रमेतेनाशमयंस्तस्माच्छतशीर्ष रुद्र शमनीयँ शतशीर्ष रुद्र शमनीयँ ह वै तच्छत रुद्रियमित्याचक्षते परोऽक्षम्। (शतपथ ब्राह्मण, ९/१/१/७)
शतयोजने ह वा एष (आदित्यः) इतस्तपति। (कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद्, ८/३)
सहस्र योजन (सूर्य व्यास) तक या शनि कक्षा तक तेज क्षेत्र है। यह शिवतर या अधिक शान्त है। सूर्य अक्ष (आंख, धुरी) होने से इसे सहस्राक्ष भी कहा गया है। यहां तक के ग्रहों का प्रभाव पड़ता है। आधुनिक गणित में भी पृथ्वी की कक्षा गति पर शनि तक के ग्रहों द्वारा विचलन की ही गणना होती है। इन ग्रहों के संयुक्त चक्र को सूर्य रथ का चक्र कहा गया है। इसका मान ४३,२०,००० वर्ष को ज्योतिष का युग कहा है। 
युक्ताह्यस्य (इन्द्रस्य) हरयः शतादशेति। (ऋक्, ६/४७/१८)
सहस्रं हैत आदित्यस्य रश्मयः (हरयः = रश्मयः)। (जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण, १/४४/५)
हे सूर्य सहस्रांशो तेजो राशि जगत्पते (स्तोत्र)
उसके बाद सौर मण्डल की सीमा तक सूर्य का तृतीय पद है। वहां तक सूर्य का प्रकाश ब्रह्माण्ड से अधिक है। 
त्रिंशद् धाम वि राजति वाक् पतङ्गाय धीयते। प्रति वस्तो रहद्युभिः॥ (ऋक्, १०/१८९/३)
नमः शिवाय च शिवतराय च (वाज.सं. १६/४१, तैत्तिरीय सं., ४/५/८/१, मैत्रायणी सं. १२६/५)
यो वः शिवतमो रसः(ऋक्, १०/९/२, अथर्व, १०/५/१७, वाज. सं. ११/५१) 
सूर्य प्रकाश की अन्तिम सीमा परम पद है, जहां तक सूर्य विन्दु रूप में दीखता है। इसे चक्षु (सूर्य) का आतत (विस्तार) कहा है। सूर्य सिद्धान्त में ब्रह्माण्डकी परिभाषा है कि वहां तक सूर्य किरणों का प्रसार या व्याप्ति है। 
आकाशकक्षा सा ज्ञेया करव्याप्तिस्तथा रवेः॥८१॥
ख व्योम ख-त्रय ख-सागर षट्क नाग व्योमाष्ट शून्य यम-रूप नगाष्ट चन्द्राः।
ब्रह्माण्ड सम्पुटपरिभ्रमणं समन्तादभ्यन्तरा दिनकरस्य कर प्रसाराः॥ (सूर्य सिद्धान्त, १२/८१, ९०)
यहां शिव का रूप महोदेव (ऋक्, ) या सदाशिव है।
महोदेवो मर्त्यां आविवेश॥ (ऋक्, ४/५८/३)
सदाशिवाय विद्महे, सहस्राक्षाय धीमहि तन्नो साम्बः प्रचोदयात्। (वनदुर्गा उपनिषद्, १४१)
(२) मासिक श्राद्ध-पृथ्वी से मनुष्य की आत्मा निकलने पर वह प्रेत हुआ। प्रेत = प्र + इतः, अर्थात् इह लोक (पृथ्वी) से प्रयाण हुआ।
पृथ्वी से चन्द्र मण्डल की गति एक वर्ष में पूर्ण होती है, प्रति मास वह थोड़ा थोड़ा आगे बढ़ता है। इसके लिए मृत्यु तिथि पर हर मास मासिक श्राद्ध होता है। 
चान्द्र मण्डल के बाह्य भाग में पितर रहते हैं। 
विधूर्ध्वभागे पितरो वसन्ति (सिद्धान्त शिरोमणि, गोलाध्याय, त्रि, १३)
पितृलोकः सोमः (कौषीतकि ब्राह्मण, १६/५)
मासि पितृभ्यः क्रियते (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/४/९/१)
मासा वै पितरो बर्हिषदः (तैत्तिरीय ब्राह्मण, १/६/८/३, ३/३/६/४)
ऋक् के सूक्त (१०/१५) में पितरों का विशद् वर्णन है।
उदीरतां अवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः॥१॥
नीचे या भूमि के (अवर) पितर हैं, वह दूर हट जायें (उदीरताम्)। मध्यम या वायु के पितर थोड़ा और ऊपर जायें (अन्तरिक्ष गति में चन्द्र तक पहुंचे)।
पितरों को पिण्ड देते समय यह मन्त्र पढ़ते है। जिस पितर के लिए पिण्ड है, वह शान्ति से ग्रहण करे, बाकी हट जायें। भूमि पूजन के बाद भी ऐसा ही मन्त्र पढ़ा जाता है-
अपसर्पन्तु ते भूताः ये भूताः भूतले स्थिताः।
वैदिक मन्त्र भोजपुरी में गाली रूप में प्रचलित है, अर्थात् जीवित् व्यक्ति को प्रेत कह रहे हैं।
उदीरताम् = उधिया जा। उत्परासः = ऊफर पर।
(३) वार्षिक श्राद्ध-चान्द्र मण्डल में महान् आत्मा पृथ्वी के आकर्षण से बन्ध कर सूर्य की वार्षिक परिक्रमा कर रहा है। इसके लिए वार्षिक श्राद्ध होता है।
चान्द्र मण्डल में सोम युक्त महान् आत्मा है। उसका एक अंश सूर्य किरणों के दबाव से धीरे धीरे सौर मण्डल से बाहर निकलता है। रास्ते में मंगल (सेनापति रूप) के २ उपग्रह २ कुत्ते हैं। अवान्तर ग्रहों को देव सेना कहा गया है। उसके बाद वे शनि अर्थात् यम लोक तक पहुंचते हैं। शनि के वलय भाग को ३ भागों में बांटा गया है-शनि गैसीय पिण्ड है, उसकी सीमा पर प्रथम जल जैसा प्रवाह उदन्वती है, मध्य में अन्न (पीलु) के कणों का प्रवाह पीलुमती, आकाश (द्यौ) के निकट प्रद्यौ (paradise) है।
सूर्यं चक्षुषा गच्छ वातमात्मना दिवं च गच्छ पृथिवीं च धर्मभिः॥७॥
यास्ते शिवास्तन्वो जातवेदस्ताभिर्वहैनं सुकृतामु लोकम्॥८॥
अति द्रव श्वानौ सारमेयौ चतुरक्षौ शबलौ साधुना पथा॥११॥
या ते श्वानौ यम रक्षितारौ चतुरक्षौ पथिषदि नृचक्षसा॥१२॥
उत् त्वां वहन्तु मरुत उदवाहा उदप्रुतः॥२२॥
ये निखाता ये परोप्ता ये दग्धा ये चोद्धिताः। 
सर्वान् तानग्न आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे॥३४॥
(४ प्रकार की अन्त्येष्टि-खात या गड्ढे में दबाना, परोप्ता (ऊपर रखे गये-पारसी विधि), दग्ध (दाह संस्कार), उद्धित (समुद्र में मृत्यु होने पर जल में फेंकने के अतिरिक्त अन्य उपाय नहीं है)
उदन्वती द्यौरवमापीलुमतीति मध्यमा। 
तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितर आसते॥४८॥
ये नः पितुः पितरो ये पितामहा य आविविशुरुर्वन्तरिक्षम्।
य आक्षियन्ति पृथिवीमुत द्यां तेभ्यः पितृभ्यो नमसा विधेम॥४९॥ अथर्व वेद (१८/२)
(४) गया श्राद्ध-आत्मा परमात्मा या विष्णु का रूप है, अतः इसका वाहन भी गरुड़ रूप है जिसकी गति के लिए गरुड़ पुराण का पाठ है। सूर्य किरण का दबाव गौ पुच्छ है। यहां गौ का अर्थ किरण है।
गय प्राण शनि तक जाने पर उसका गया श्राद्ध होता है जो सूर्य की उत्तर गति की सीमा कर्क रेखा की मध्यम स्थिति पर है। अभी कर्क रेखा थोड़ा दक्षिण हट गयी है। गय प्राण इसके बाहर के लोक में जाने परया सौर मण्डल के बाहर जाने पर उसका ब्रह्म कपाल (ब्रह्माण्ड) में जाने का श्राद्ध होता है। यह बद्रीनाथ में होता है जो सौर मण्डल के ३० धाम ( पृथ्वी सतह पर ३० अक्षांश) की प्रतिमा है।
स यदाह गयो असीति सोमं या एतदाहैष ह वै चन्द्रमाभूत्वा सर्वान् लोकान् गच्छति तद् यद् गच्छति तस्माद् गयः तद् गयस्य गयत्वम् (गोपथ ब्राह्मण, पूर्व, ५/१४)
प्राणा वै गयाः (शतपथ ब्राह्मण, १४/८/१५/७)
गयस्फानः प्रतरणः सुवीर इति गवां नः स्फावयिता प्रतारयितैधीत्याह (ऐतरेय ब्राह्मण, १/१३)
गयस्फानः प्रतरणः सुवीरो अवीरहा प्र चरा सोम दुर्यान्॥ (ऋक्, १/९१/१९)
५. महापात्र-पात्र का अर्थ बर्तन है। सबसे बहुमूल्य वस्तु मनुष्य मस्तिष्क है। उसका पात्र अर्थात् सिर महापात्र है। अतः किसी विभाग के मुख्य को भी उसका सिर या महापात्र कहते हैं। कथा सरित्सागर में एक कथा है कि महावतों में विवाद होने पर वे हाथी-महापात्र के पास निर्णय के लिए गये। भुवनेश्वर में लिंगराज मन्दिर के निकट हाथी महापात्र मार्ग है।
पात्रता का अर्थ योग्यता है, अर्थात् शरीर रूपी पात्र में कितनी शक्ति या बुद्धि आ सकती है। 
दान के लिए पात्र वह है, जो उसका उचित उपयोग कर सके। मनुष्य की मरणोत्तर गति के लिए दान का सबसे योग्य पात्र खोजते हैं-वह महापात्र है।
मृतक का सिर दक्षिण दिशा की ओर ही क्यों रखना चाहिए एवं कपाल क्रिया का सच
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मृत देह को दक्षिणोत्तर क्यों रखते हैं ?👉
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जीव की प्रेतवत् अवस्था, पंचप्राणों एवं उपप्राणों के स्थूल देह संबंधी कार्य की समाप्ति दर्शाती है । जिस समय जीव निष्प्राण हो जाता है, उस समय जीव के शरीर में तरंगों का वहन लगभग थम सा जाता है व उसका रूपांतर ‘कलेवर’ में होता है । ‘कलेवर’ अर्थात स्थूल देह की किसी भी तरंग को संक्रमित करने की असमर्थता दर्शाने वाला अंश । ‘कलेवर’ अवस्था में देह से निष्कासन योग्य सूक्ष्मवायुओं का वहन बढ जाता है । मृत देह को दक्षिणोत्तर रखने से कलेवर की ओर दक्षिणोत्तर में भ्रमण करने वाली यम तरंगें आकर्षित होती हैं और मृत देह के चारों ओर इन तरंगों का कोष तैयार हो जाता है । इससे मृत देह की निष्कासन योग्य सूक्ष्म वायुओं का अल्प कालावधि में विघटन होता है । निष्कासन योग्य सूक्ष्म वायुओं का कुछ भाग मृत देह की नासिका व गुदा (मलद्वार) से वातावरण में उत्सर्जित होता है । इस प्रक्रिया के कारण, निष्कासन योग्य रज-तमात्मक दूषित वायुओं से मृत देह मुक्त हो जाता है, जिससे वातावरण में संचार करने वाली अनिष्ट शक्तियों के लिए देह को वश में करना बहुत कठिन हो जाता है । इसीलिए मृतदेह को दक्षिणोत्तर रखा जाता है ।

व्यक्ति की मृत्यु होने के उपरांत उस की देह घर में रखते समय उसके पैर दक्षिण दिशा की ओर क्यों करते हैं ?
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👉 दक्षिण यम दिशा है । व्यक्ति का प्राणोत्क्रमण होते समय उसके प्राण यम दिशा की ओर खींचे जाते हैं । देह से प्राण बाहर निकलने के उपरांत अन्य निष्कासन-योग्य वायु का देह से उत्सर्जन प्रारंभ होता है । इस उत्सर्जन की तरंगों की गति तथा उनका आकर्षण/खींचाव भी अधिक मात्रा में दक्षिण दिशा की ओर होता है ।

👉 व्यक्ति की कटि के निचले भाग से (कमर के नीचे का भाग) अधिक मात्रा में वासनात्मक तरंगों का उत्सर्जन होता रहता है, वह अधिक उचित पद्धति से हो, इसके लिए यम तरंगो के वास्तव्य वाली दक्षिण दिशा की ओर ही उस व्यक्ति के पैर रखने का शास्त्र है । ऐसा करने से यम तरंगों की सहायता प्राप्त होकर व्यक्ति की देह से उसके पैर की दिशा से अधोगति से अधिकाधिक निष्कासन-योग्य तरंगे खिंचकर इस वायु का योग्य प्रकार से अधिकतम मात्रा में उत्सर्जन होता है जिससे चिता पर रखने से पूर्व देह अधिकतम मात्रा में रिक्त हो जाती है । यह दिशा अधिकाधिक स्तर पर देह से बाह्य दिशा में विसर्जित होने वाली निष्कासन-योग्य वायु के प्रक्षेपण के लिए पूरक होती है ।

👉 यम (दक्षिण) दिशा में यम देवता का अस्तित्व होता है । इसलिए उन के सान्निध्य में देह से प्रक्षेपित होने वाली निष्कासन योग्य वायु के उत्सर्जन के उपरांत विलिनीकरणात्मक प्रक्रिया अधिकाधिक प्रमाण में दोष विरहित करने का प्रयास किया जाता है, अन्यथा निष्कासन-योग्य वायु के उत्सर्जन के लिए संबंधित दिशा पूरक न रखने पर, ये तरंगें घर में अधिक समय तक घनीभूत होने की संभावना होती है; इसलिए यमदिशा की ओर इस निष्कासन-योग्य तरंगों का वहन होने के लिए मृत व्यक्ति के पैर घर में दक्षिण दिशा की ओर रखने की पद्धति है ।’
मृत देह घर में रखते समय मृतक के पैर दक्षिण दिशा में रखने का शास्त्र ज्ञात न होने के कारण वर्तमान में कुछ स्थानों पर घर में मृतदेह रखते समय मृतक के पैर उत्तर की ओर रखने का अयोग्य कृत्य किया जाता है ।
मृतदेह को श्मशान में ले जाने के उपरांत मृतदेह चिता पर रखते समय मृतक के पैर उत्तर दिशा में रखना आवश्यक होता है ।

अंतिम संस्कार के समय कपाल क्रिया का सच
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हम सभी ने शमशान में अंत्येष्टि के समय देखा है कि मृतक व्यक्ति की चिता जलने के कुछ समय उपरांत सिर पर लकड़ी का डंडा मारा जाता है।

शव को मुखाग्नि देने के करीब आधे घंटे बाद जब शव की चमड़ी और मांस का ज्यादातर भाग जल चुका होता है, तब एक बांस में लोटा बांधकर शव के सिर वाले हिस्से में और घी डाला जाता है।

जिससे की सिर का कोई हिस्सा जलने से न बच जाए। इसे कपाल क्रिया कहते हैं। गरुड़ पुराण की मान्यता अनुसार अगर सिर या दिमाग का कोई हिस्सा जलने से रह जाए तो इंसान को अगले जन्म में पिछले जन्म की बातें याद रह जाती हैं।

इसीलिए अच्छी तरह से जलाया जाता है। अगर पिछले जन्म में इंसान की मृत्यु किसी दुखद कारण की वजह से हुई है तो नए जन्म में उसको याद रखने से मनुष्य फिर दुःखी हो जाएगा और लगातार उसके दिमाग में पूर्व जन्म की बातें और अपने करीबियों का दुःख घूमता रहेगा।

इस बात में मतभेद यह है कि कपाल क्रिया करने से इस जन्म की यादाश्त भूल कर आत्मा अगले जन्म को स्वीकार कर लेती है। दूसरा मतभेद यह है कि कपाल क्रिया करने से सहस्रार चक्र खुल जाता है, और आत्मा ज्ञान मार्ग से मोक्ष को प्राप्त होति है।

पहला मत को पूर्णतया सत्य नही कहा जा सकता है, यादाशत आत्मा के साथ रहती ही है, चाहे भले ही अगले जन्म में वह उसे भूल जाए, परंतु पिछले सभी जन्मों की याद आत्मा या अवचेत्तन मन में हमेशा रहती है। इसलिए कपाल क्रिया का इससे कोई संबंध नहीं।

जहाँ तक दुसरे मत का सवाल है, बहुत हद तक वह सत्य है। सहस्रार चक्र से आत्मा के गमन से ज्ञान मार्ग से आत्मा को मोक्ष मिल सकता है। लेकिन तभी जब आत्मा सहस्रार चक्र से निकले। यहाँ तो आत्मा पहले ही शरीर छोड़ चुकी है, सिर्फ शव पड़ा है आपके सामने। फिर क्यों किया जाए कपाल क्रिया?

बौद्ध धर्म में ख़ास तौर से तिब्बत के कुछ लामा मंत्रो से मृत्यु शय्या पर पड़े कुछ लोगो की आत्मा सहस्रार चक्र से निकालने का दावा करते है। यह एक बहुत बड़ा व्यवसाय भी बन गया है जिसके लिए लाखों रूपए भी लिए जाते है। सनातन धर्म में भी समाधि द्वारा मृत्यु से पूर्व आसन लगा कर आत्मा को सहस्रार चक्र से निकाला जाता है, लेकिन यह एक योगी ही कर सकता है, आम आदमी नहीं।

फिर कपाल क्रिया क्यों? और क्या यह जरूरी है?

जी, यह जरूरी है। यह कर्म कांड का हिस्सा तो नहीं है, लेकिन इसे बाद में कर्म कांड का हिस्सा बना दिया गया। इसका कारण थे दुष्ट तांत्रिक। बहुत से दुष्ट तांत्रिक शमशान से कपाल इखट्टे कर लेते है। इन्ही कपाल द्वारा मृत इंसान की आत्मा को प्रेत बना कर अपने काम निकाले जाते है। इसलिए ही अघोरियों ने इस दुष:क्रिया को रोकने के लिए यह प्रथा चलायी की सभी की कपाल क्रिया कर दी जाय। जब कपाल ही नहीं रहेगा तो उससे कोई दुष:क्रिया नहीं होगी। यह कारण किसी को बताया नहीं जाता, अन्यथा कोई इसे मानेगा कोई नहीं। परंतु मानने या न मानने से तांत्रिकों को तो कोई फर्क नहीं पड़ता न। समय समय पर ऐसे मामले आते ही है जहाँ कोई अच्छी आत्मा को भी प्रेत बना कर गलत कार्य करवाये जाते है। इसलिए यह क्रिया जरूरी है।
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