Monday, January 16, 2023
बृहस्पति एवं शुक्र का दाम्पत्य जीवन पर प्रभाव 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰बृहस्पति और शुक्र दो ग्रह हैं जो पुरूष और स्त्री का प्रतिनिधित्व करते हैं.मुख्य रूप ये दो ग्रह वैवाहिक जीवन में सुख दु:ख, संयोग और वियोग का फल देते हैं. बृहस्पति और शुक्र दोनों ही शुभ ग्रह हैंसप्तम भाव जीवन साथी का घर होता है इस घर में इन दोनों ग्रहों की स्थिति एवं प्रभाव के अनुसार विवाह एवं दाम्पत्य सुख का सुखद अथवा दुखद फल मिलता है.पुरूष की कुण्डली में शुक्र ग्रह पत्नी एवं वैवाहिक सुख का कारक होता है और स्त्री की कुण्डली में बृहस्पति.ये दोनों ग्रह स्त्री एवं पुरूष की कुण्डली में जहां स्थित होते हैं और जिन स्थानों को देखते हैं उनके अनुसार जीवनसाथी मिलता है और वैवाहिक सुख प्राप्त होता है.ज्योतिषशास्त्र का नियम है कि बृहस्पति जिस भाव में होता हैं उस भाव के फल को दूषित करता है और जिस भाव पर इनकी दृष्टि होती है उस भाव से सम्बन्धित शुभ फल प्रदान करते हैं.जिस स्त्री अथवा पुरूष की कुण्डली में गुरू सप्तम भाव में विराजमान होता हैं उनका विवाह या तो विलम्ब से होता है अथवा दाम्पत्य जीवन के सुख में कमी आती है.पति पत्नी में अनबन और क्लेश के कारण गृहस्थी में उथल पुथल मची रहती है. दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने में बृहस्पति और शुक्र का सप्तम भाव और सप्तमेश से सम्बन्ध महत्वपूर्ण होता है। जिस पुरूष की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह शुक बृहस्पति से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर गुणों वाली अच्छी जीवनसंगिनी मिलती है.इसी प्रकार जिस स्त्री की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेशऔर विवाह कारक ग्रह बृहस्पति शुक्र से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर और अच्छे संस्कारों वाला पति मिलता है.शुक्र भी बृहस्पति के समान सप्तम भाव में सफल वैवाहिक जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है.सप्तम भाव का शुक्र व्यक्ति को अधिक कामुक बनाता हैजिससे विवाहेत्तर सम्बन्ध की संभावना प्रबल रहती है.विवाहेत्तर सम्बन्ध के कारण वैवाहिक जीवन में क्लेश के कारण गृहस्थ जीवन का सुख नष्ट होता है.बृहस्पति और शुक्र जब सप्तम भाव कोदेखते हैं अथवा सप्तमेश पर दृष्टि डालते हैं ) तो इस स्थिति में वैवाहिक जीवन सफल और सुखद होता है.लग्न में बृहस्पति अगर पापकर्तरी योग से पीड़ित होता है तो सप्तम भाव पर इसकी दृष्टि का शुभ प्रभाव नहीं होता है ऐसे में सप्तमेश कमज़ोर हो या शुक्र के साथ हो तो दाम्पत्य जीवन सुखद और सफल रहने की संभावना कम रहती है।
Saturday, January 14, 2023
हिंदू धर्म में मकर संक्रांति 2023 का विशेष महत्व है। पौष माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। हालांकि मकर संक्रांति को देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों जैसे- लोहड़ी, उत्तरायण, खिचड़ी, टिहरी, पोंगल आदि नामों से भी जाना जाता है। हर साल जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो उसे सूर्य की मकर संक्रांति कहा जाता है। इस दिन से गुरु और सूर्य के प्रभाव में तेजी आने लगती है। मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन देव भी धरती पर अवतरित होते हैं और आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। इस दिन से खरमास का समापन होता है और शुभ और मांगलिक कार्यों जैसे कि शादी, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश आदि के लिए मुहूर्त देखे जाने लगते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन से सूर्य देव अपने रथ से खर (गधे) को निकालकर सातों घोड़े में सवार हो जाते हैं और उनकी मदद से चारों दिशाओं में भ्रमण करने लगते हैं और सूर्य की चमक तेज हो जाती है। मकर संक्रांति का त्योहार सूर्य को समर्पित होता है। इस दिन स्नान, दान और तिल खाने की परंपरा है। आइए जानते हैं एस्ट्रोसेज के इस विशेष ब्लॉग में मकर संक्रांति 2023 की पूजा विधि, महत्व, किस राशि के जातकों की चमकेगी किस्मत और इससे जुड़ी कई अन्य महत्वपूर्ण बातें।मकर संक्रांति 2023: तिथि व मुहूर्तसाल 2023 में मकर संक्रांति और लोहड़ी की तारीख को लेकर लोग असमंजस में हैं। तो आइए जानते हैं कि सटीक तारीख कौन सी है:मकर संक्रांति तिथि: 15 जनवरी 2023, रविवारपुण्य काल मुहूर्त: सुबह 07 बजकर 15 मिनट से 12 बजकर 30 मिनट तक।अवधि: 05 घंटे, 14 मिनटमहा पुण्य काल: सुबह 07 बजकर 15 मिनट से सुबह 09 बजकर 15 मिनट तक।अवधि: 02 घंटेमकर संक्रांति 2023 का महत्वमकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने खुद उनके घर जाते हैं। बता दें कि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं। उनके भाव में सूर्य के प्रवेश मात्र से शनि का प्रभाव खत्म हो जाता है। सूर्य के प्रकाश के सामने कोई भी नकारात्मकता नहीं टिकती है। मान्यता है कि मकर संक्रांति पर सूर्य की आराधना और इससे संबंधित दान करने से शनि दोष से छुटकारा मिल जाता है। इसके साथ ही इस दिन खिचड़ी का भोग अवश्य लगाना चाहिए। इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और सभी ग्रह दोषों से छुटकारा मिलता है। ज्योतिष शास्त्र में उड़द की दाल को शनिदेव से जोड़ा गया है। ऐसे में इस दिन उड़द दाल की खिचड़ी खाने और दान करने से जातकों पर सूर्य देव और शनि देव की विशेष कृपा बनी रहती है। बता दें कि साथ ही चावल को चंद्रमा, नमक को शुक्र, हल्दी को बृहस्पति, हरी सब्जियों को बुध के लिए शुभ माना जाता है। वहीं मंगल का संबंध गर्मी से है। इसलिए मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने से कुंडली में सभी ग्रहों की स्थिति में सुधार होता है।कैसे प्रसन्न होंगे भगवान सूर्य नारायण? मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से पहले स्नान करके साफ कपड़े धारण कर लें।अब उगते हुए सूर्य भगवान की तरफ मुंह करके कुश का आसन लगाएं। फिर उस आसन पर खड़े होकर तांबे के पात्र में जल लें। जल में मिश्री डाल लें। इससे सूर्य नारायण प्रसन्न होते हैं।इसके अलावा तांबे के लोटे में रोली, चंदन, लाल पुष्प, चावल, गुड़ आदि मिलाकर भी सूर्यदेव को जल देना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से सूर्य देवता की विशेष कृपा प्राप्त होती है।जब सूर्य की पहली किरण दिखनी शुरू हो जाए, तो आप अपने दोनों हाथों से तांबे के लोटे को पकड़कर सूर्य देव को जल चढ़ाएं। ध्यान रहे कि जल चढ़ाते समय पानी आपके पैर पर न गिरे।जल देते समय इन मंत्रों का जाप करें-ऊँ ऐही सूर्यदेव सहस्त्रांशो तेजो राशि जगत्पते।अनुकम्पय मां भक्त्या गृहणार्ध्य दिवाकर:।।ऊँ सूर्याय नम:, ऊँ आदित्याय नम:, ऊँ नमो भास्कराय नम:। अर्घ्य समर्पयामि।सूर्य को जल देने के बाद अपने स्थान पर ही 3 बार परिक्रमा करें।अब आसन उठाकर उस स्थान को प्रणाम करें।इन चीज का करें दान, शनिदेव और सूर्यदेव की बरसेगी कृपामकर संक्रांति के दिन तिल के दान को बेहद शुभ माना जाता है, इसलिए इसे तिल संक्रांति भी कहा जाता है। इस दिन काले तिल के दान से जीवन की सभी समस्याओं का निवारण होता है।इस दिन खिचड़ी के दान से भी पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन चावल और काली उड़द की दाल से बनी खिचड़ी दान करनी चाहिए। काले उड़द से शनिदेव प्रसन्न होते हैं और सभी दोषों से छुटकारा मिलता है।मकर संक्रांति के दिन गुड़ के दान का भी विशेष महत्व है। गुड़ से बनी चीजें खाने और दान करने से विशेष लाभ की प्राप्ति होती है। इसके दान से शनि, गुरु और सूर्य तीनों की कृपा प्राप्त होती है।रोगों से छुटकारा पाने के लिए इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को गर्म कपड़े और कंबल का दान जरूर करें। इस दिन देसी घी का दान करना बेहद लाभकारी माना जाता है। इससे आपके मान-सम्मान में बढ़ोतरी होती है। देश के विभिन्न राज्यों में कैसे मनाते हैं मकर संक्रांति मकर संक्रांति के त्योहार को नई ऋतु और नई फसल के आगमन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार सहित तमिलनाडु में नई फसल की कटाई की जाती है। अलग- अलग राज्यों में मकर संक्रांति के पर्व को भिन्न-भिन्न रूपों में मनाते हैं। लोहड़ी: मकर संक्रांति के एक दिन पहले उत्तर भारत में लोहड़ी का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। लोहड़ी के दिन दोस्तों और रिश्तेदारों को बधाइयां और मिठाई भेजी जाती हैं। इस त्योहार को मनाने के लिए खुली जगह पर अग्नि जलाई जाती है और लोक नृत्य करते हुए गाना-बजाना किया जाता है। फिर पवित्र अग्नि में मूंगफली, गजक, तिल आदि डालकर परिक्रमा की जाती है।पोंगल: पोंगल दक्षिण भारत के लोगों का प्रमुख पर्व है। यह मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से किसानों का होता है। इसे तीन दिनों तक मनाया जाता है। इसमें सूर्य देव और इंद्र देव की पूजा की जाती है। पोंगल मनाते हुए सभी किसान अपनी अच्छी फसल के लिए ईश्वर का धन्यवाद करते हैं। उत्तरायण: उत्तरायण पर्व को विशेष रूप से गुजरात में मनाया जाता है। मकर संक्रांति के अवसर पर गुजरात में पतंग उड़ाने की परंपरा है। इस पर्व को लोग पतंग महोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। कई लोग उत्तरायण के दिन व्रत भी रखते हैं और घरों में तिल व मूंगफली दाने की चिक्की (पट्टी) बना कर रिश्तेदारों में बांटते हैं।बिहू: माघ माह की संक्रांति के पहले दिन से बिहू का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से फसल की कटाई का पर्व है, जो असम में प्रसिद्ध है। बिहू के अवसर पर घरों में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बिहू के दिन अलाव जलाकर तिल और नारियल से बने व्यंजनों से अग्नि देवता को भोग लगाया जाता हैइन राशियों पर होगी धनवर्षामिथुन राशिमकर संक्रांति के दिन यानी सूर्य का मकर में गोचर, मिथुन राशि के लोगों के लिए बेहद शुभ साबित हो सकता है। जो लोग शोध के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं, उनको सफलता मिल सकती है। वहीं स्वास्थ्य के लिहाज से भी यह समय फलदायी साबित हो सकता है। कोई पुरानी शारीरिक समस्या से छुटकारा मिल सकता है। निवेश में अच्छा रिटर्न मिलने की भी संभावना है।तुला राशि यह समय आर्थिक दृष्टि से आपके लिए फलदायी साबित हो सकता है। आपको भौतिक सुखों की प्राप्ति के योग बन रहे हैं। वहीं जो लोग रियल एस्टेट, प्रापर्टी डीलर का काम करते हैं, उनके लिए यह समय शानदार साबित होगा। इस दौरान आप वाहन या कोई और लग्जरी आइटम खरीद सकते हैं।मीन राशि आप लोगों के लिए सूर्य का गोचर अनुकूल साबित होगा। धन लाभ के योग बन रहे हैं। वहीं इस समय आपको भाग्य का साथ मिलता दिख रहा है। आपके रुके हुए काम पूरे हो सकते हैं। इस समय आपको व्यापार में रुका हुआ कोई पुराना पेमेंट मिल सकता है। अगर आप कहीं निवेश करना चाहते है तो यह अनुकूल समय है। इस समय आप बचत करने में भी कामयाब हो सकते हैं।कर्क राशिआप लोगों के लिए सूर्य देव का गोचर लाभप्रद साबित हो सकता है। इस राशि के जो लोग इंपोर्ट-एक्सपोर्ट से संबंधित काम करते हैं, वे इस दौरान अच्छा खासा मुनाफा कमा सकते हैं। वहीं जो लोग शादी की योजना बना रहे हैं उनके लिए भी विवाह के योग बनते नजर आ रहे हैं।
Saturday, December 24, 2022
जन्म-कुंडली में उच्च सफलता के योग -
जन्म-कुंडली में दशम स्थान
जन्म-कुंडली में दशम स्थानको (दसवां स्थान) को तथा छठे भाव को जॉब आदि के लिए जाना जाता है। सरकारी नौकरी के योग को देखने के लिए इसी घर का आकलन किया जाता है। दशम स्थान में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति की दृष्टि पड़ रही होती है साथ ही उनका सम्बन्ध छठे भाव से हो तो सरकारी नौकरी का प्रबल योग बन जाता है। कभी-कभी यह भी देखने में आता है कि जातक की कुंडली में दशम में तो यह ग्रह होते हैं लेकिन फिर भी जातक को संघर्ष करना पड़ रहा होता है तो ऐसे में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति पर किसी पाप ग्रह (अशुभ ग्रह) की दृष्टि पड़ रही होती है तब जातक को सरकारी नौकरी प्राप्ति में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। अतः यह जरूरी है कि आपके यह ग्रह पाप ग्रहों से बचे हुए रहें।
2. जन्म कुंडली में जातक का लग्न
जन्म कुंडली में यदि जातक का लग्न मेष, मिथुन, सिंह, वृश्चिक, वृष या तुला है तो ऐसे में शनि ग्रह और गुरु (वृहस्पति) का एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होना, सरकारी नौकरी के लिए अच्छा योग उत्पन्न करते हैं।
3. जन्म कुंडली में यदि केंद्र में अगर चन्द्रमा, ब्रहस्पति एक साथ होते हैं तो उस स्थिति में भी सरकारी नौकरी के लिए अच्छे योग बन जाते हैं। साथ ही साथ इसी तरह चन्द्रमा और मंगल भी अगर केन्द्रस्थ हैं तो सरकारी नौकरी की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
4. कुंडली में दसवें घर के बलवान होने से तथा इस घर पर एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों का प्रभाव होने से जातक को अपने करियर क्षेत्र में बड़ी सफलताएं मिलतीं हैं तथा इस घर पर एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने से कुंडली धारक को आम तौर पर अपने करियर क्षेत्र में अधिक सफलता नहीं मिल पाती है।
5. ज्योतिष शास्त्र में सूर्य तथा चंद्र को राजा या प्रशासन से सम्बंध रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है। सूर्य या चंद्र का लग्न, धन, चतुर्थ तथा कर्म से सम्बंध या इनके मालिक के साथ सम्बंध सरकारी नौकरी की स्थिति दर्शाता है। सूर्य का प्रभाव चंद्र की अपेक्षा अधिक होता है।
6. लग्न पर बैठे किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाला माना जाता है। लग्न पर यदि सूर्य या चंद्र स्थित हो तो व्यक्ति शाषण से जुडता है और अत्यधिक नाम कमाने वाला होता है।
7. चंद्र का दशम भाव पर दृष्टी या दशमेश के साथ युति सरकारी क्षेत्र में सफलता दर्शाता है। यधपि चंद्र चंचल तथा अस्थिर ग्रह है जिस कारण जातक को नौकरी मिलने में थोडी परेशानी आती है। ऐसे जातक नौकरी मिलने के बाद स्थान परिवर्तन या बदलाव के दौर से बार बार गुजरते है।
8. सूर्य धन स्थान पर स्थित हो तथा दशमेश को देखे तो व्यक्ति को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलने के योग बनते है। ऐसे जातक खुफिया ऐजेंसी या गुप चुप तरीके से कार्य करने वाले होते है।
9. सूर्य तथा चंद्र की स्थिति दशमांश कुंडली के लग्न या दशम स्थान पर होने से व्यक्ति राज कार्यो में व्यस्त रहता है ऐसे जातको को बडा औहदा प्राप्त होता है।
10. यदि ग्रह अत्यधिक बली हो तब भी वें अपने क्षेत्र से सम्बन्धित सरकारी नौकरी दे सकते है। मंगल सैनिक, या उच्च अधिकारी, बुध बैंक या इंश्योरेंस, गुरु- शिक्षा सम्बंधी, शुक्र फाइनेंश सम्बंधी तो शनि अनेक विभागो में जोडने वाला प्रभाव रखता है।
11. सूर्य चंद्र का चतुर्थ प्रभाव जातक को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करता है। इस स्थान पर बैठे ग्रह सप्तम दृष्टि से कर्म स्थान को देखते है।
12. सूर्य यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को सरकारी कार्यो से अवश्य लाभ मिलता है। दशम स्थान कार्य का स्थान हैं। इस स्थान पर सूर्य का स्थित होना व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रो में अवश्य लेकर जाता है। सूर्य दशम स्थान का कारक होता है जिस कारण इस भाव के फल मिलने के प्रबल संकेत मिलते है।
13. यदि किसी जातक की कुंडली में दशम भाव में मकर राशि में मंगल हो या मंगल अपनी राशि में बलवान होकर प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम या दशम में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।
14. यदि मंगल स्वराशि का हो या मित्र राशि का हो तथा दशम में स्थित हो या मंगल और दशमेश की युति हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।
15. चंद्र केंद्र या त्रिकोण में बली हो तो सरकारी नौकरी का योग बनाता है ।
16. यदि सूर्य बलवान होकर दशम में स्थित हो या सूर्य की दृष्टि दशम पर हो तो जातक सरकारी नौकरी में जाता है ।
17. यदि किसी जातक की कुंडली में लग्न में गुरु या चौथे भाव में गुरु हो या दशमेश ग्यारहवे भाव में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।
18. यदि जातक की कुंडली में दशम भाव पर सूर्य, मंगल या गुरु की दृष्टि पड़े तो यह सरकारी नौकरी का योग बनता है ।
19. यदि १० भाव में मंगल हो, या १० भाव पर मंगल की दृष्टी हो,
20. यदि मंगल ८ वे भाव के अतिरिक्त कही पर भी उच्च राशी मकर (१०) का होतो।
21. मंगल केंद्र १, ४, ७, १०, या त्रिकोण ५, ९ में हो तो.
22. यदि लग्न से १० वे भाव में सूर्य (मेष) , या गुरू (४) उच्च राशी का हो तो। अथवा स्व राशी या मित्र राशी के हो।
23. लग्नेश (१) भाव के स्वामी की लग्न पर दृष्टी हो।
24. लग्नेश (१) +दशमेश (१०) की युति हो।
25. दशमेश (१०) केंद्र १, ४, ७, १० या त्रिकोण ५, ९ वे भाव में हो तो। उपरोक्त योग होने पर जातक को सरकारी नौकरी मिलती है। जितने ज्यादा योग होगे , उतना बड़ा पद प्राप्त होगा।
26. भाव:कुंडली के पहले, दसवें तथा ग्यारहवें भाव और उनके स्वामी से सरकारी नौकरी के बारे मैं जान सकते हैं।
27.सूर्य. चंद्रमा व बृहस्पति सरकारी नौकरी मै उच्च पदाधिकारी बनाता है।
28. भाव :द्वितीय, षष्ठ एवं दशम् भाव को अर्थ-त्रिकोण सूर्य की प्रधानता होने पर सरकारी नौकरी प्राप्त करता है।
29. नौकरी के कारक ग्रहों का संबंध सूर्य व चन्द्र से हो तो जातक सरकारी नौकरी पाता है।
30. दसवें भावमें शुभ ग्रह होना चाहिए।
31. दसवें भाव में सूर्य तथा मंगल एक साथ होना चाहिए।
32. पहले, नवें तथा दसवें घर में शुभ ग्रहों को होना चाहिए।
33. पंच महापुरूष योग: जीवन में सफलता एवं उसके कार्य क्षेत्र के निर्धारण में महत्वपूर्ण समझे जाते हैं।पंचमहापुरूष योग कुंडली में मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि अपनी स्वराशि अथवा उच्च राशि का होकर केंद्र में स्थित होने पर महापुरुष योग बनता
34. पाराशरी सिद्धांत के अनुसार, दसवें भाव के स्वामी की नवें भाव के स्वामी के साथ दृष्टि अथवा क्षेत्र और राशि स्थानांतर संबंध उसके लिए विशिष्ट राजयोग का निर्माण करते हैं।
कुंडली से जाने नौकरी प्राप्ति का समय नियम:
1. लग्न के स्वामी की दशा और अंतर्दशा में
2. नवमेश की दशा या अंतर्दशा में
3. षष्ठेश की दशा या, अंतर्दशा में
4. प्रथम,दूसरा , षष्ठम, नवम और दशम भावों में स्थित ग्रहों की दशा या अंतर्दशा में
5. दशमेश की दशा या अंतर्दशा में
6. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में
7. नौकरी मिलने के समय जिस ग्रह की दशा और अंतर्दशा चल रही है उसका संबंध किसी तरह दशम भाव या दशमेश से ।
8. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में भी नौकरी मिल सकती है।
9. छठा भाव :छठा भाव नौकरी का एवं सेवा का है। छठे भाव का कारक भाव शनि है।
10. दशम भाव या दशमेश का संबंध छठे भाव से हो तो जातक नौकरी करता है।
11. राहु और केतु की दशा, या अंतर्दशा में :
जीवन की कोई भी शुभ या अशुभ घटना राहु और केतु की दशा या अंतर्दशा में हो सकती है।
12. गोचर: गुरु गोचर में दशम या दशमेश से केंद्र या त्रिकोण में ।
13. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि और गुरु एक-दूसरे से केंद्र, या त्रिकोण में हों तो नौकरी मिल सकती है
14. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि या गुरु का या दोनों का दशम भाव और दशमेश दोनों से या किसी एक से संबंध होता है।
15. कुंडली का पहला, दूसरा, चौथा, सातवा, नौवा, दसवा, ग्यारहवा घर तथा इन घरों के स्वामी अपनी दशा और अंतर्दशा में जातक को कामयाबी प्रदान करते है।
।। आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो ।।
Tuesday, December 13, 2022
क्या आप जानते है #कलाई पर कलावा क्यों बांधा जाता है..!!अवश्य पढ़े..!!!
जब भी हम किसी मंदिर में जाते है या किसी भी शुभ कार्य में शामिल होते है तो तिलक किया जाता है और हाथों पर रक्षा सूत्र बांधते हैं फिर पूजा शुरू की जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं, ये रक्षा सूत्र क्यों बाधी जाती है। इसे रक्षा कवच के रूप में भी शरीर पर बांधा जाता है।
पुराणिक कथा के अनुसार बताया जाता है कि इंद्र जब वृत्रासुर से युद्ध करने जा रहे थे तब इंद्राणी शची ने इंद्र की दाहिनी भुजा पर रक्षा-कवच के रूप में कलावा बांध दिया था और इंद्र इस युद्ध में विजयी हुए।
उसके बाद से ये रक्षा सूत्र बांधा जाता है। शास्त्रों का ऐसा मत है कि कलावा बांधने से त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति विष्णु की अनुकंपा से रक्षा बल मिलता है और शिव दुर्गुणों का विनाश करते हैं।
कलावा बांधते वक्त इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है-
येन बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः ।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे माचल माचल ।।
कहा जाता है कि हाथ में कलावा बांधने से मनुष्य बुरी दृष्टि से बचा रहता है क्योंकि भगवान उसकी रक्षा करते हैं और, इसीलिए हाथों में मौली धागा बांधने से मनुष्य के स्वास्थ्य में बरकत होती है।कलावा बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है। यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही है।कलावा को हाथ की कलाई, गले और कमर में बांधा जाता है। इसके अलावा मन्नत के लिए किसी देवी-देवता के स्थान पर भी बांधा जाता है और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो इसे खोल दिया जाता है। इसे घर में लाई गई नई वस्तु को भी बांधा जाता और इसे पशुओं को भी बांधा जाता है।
कलावा बांधने के नियम : शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है।
कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए।
कलावा कहीं पर भी बांधें, एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि इस सूत्र को केवल 3 बार ही लपेटना चाहिए व इसके बांधने में वैदिक विधि का प्रयोग करना चाहिए।
पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है।
हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें।
किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं।
किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं।
किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे।
Monday, October 24, 2022
आपको और आपके पूरे परिवार को दीपावली के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।
दीपावली के पावन पर्व पर महालक्ष्मीजी की विशेषकृपा प्राप्त करने के लिए अष्टलक्ष्मी पूजन, आराधना, मंत्र-जाप अवश्य करें।
अष्टलक्ष्मी -
अष्टलक्ष्मी की आराधना करने से मानव जीवन सफल हो जाता है। अष्ट लक्ष्मी आराधना का उद्देश जीवन में धन के अभाव को मिटा देना है। अष्टलक्ष्मी की पूजा से इंसान को धन की प्राप्ति होती है। अगर आप काफी समय से आर्थिक तंगी में है तो अपने काम के साथ साथ मां लक्ष्मी का इस तरह पूजन अवश्य करें । शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी को चंचला कहा जाता है अर्थात जो कभी एक स्थान पर रूकती नहीं। अतः लक्ष्मी अर्थात धन को स्थायी बनाने के लिए कुछ पूजन, आराधना, मंत्र-जाप आदि का विधान शास्त्रों में दिया गया है।
महालक्ष्मी के आठ स्वरुप है। लक्ष्मी जी के ये आठ स्वरुप जीवन की आधारशिला है। इन आठों स्वरूपों में लक्ष्मी जी जीवन के आठ अलग-अलग वर्गों से जुड़ी हुई हैं। इन आठ लक्ष्मी की पूजन करने से मानव जीवन सफल हो जाता है। अष्ट लक्ष्मी और उनके मूल बीज मंत्र इस प्रकार है।
अष्टलक्ष्मी मंत्र -
1. श्री आदि लक्ष्मी - ये जीवन के प्रारंभ और आयु को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ श्रीं।।
2. श्री धान्य लक्ष्मी - ये जीवन में धन और धान्य को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ श्रीं क्लीं।।
3. श्री धैर्य लक्ष्मी - ये जीवन में आत्मबल और धैर्य को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं।।
4. श्री गज लक्ष्मी - ये जीवन में स्वास्थ और बल को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं।।
5. श्री संतान लक्ष्मी - ये जीवन में परिवार और संतान को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं।।
6. श्री विजय लक्ष्मी यां वीर लक्ष्मी - ये जीवन में जीत और वर्चस्व को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ क्लीं ॐ।।
7. श्री विद्या लक्ष्मी - ये जीवन में बुद्धि और ज्ञान को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ ऐं ॐ।।
8. श्री ऐश्वर्य लक्ष्मी - ये जीवन में प्रणय और भोग को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ श्रीं श्रीं।।
अष्ट लक्ष्मी आराधना का उद्देश जीवन में धन के अभाव को मिटा देना है। इस साधना से भक्त कर्जे के चक्र्व्ह्यु से बहार आ जाता है। आयु में वृद्धि होती है। बुद्धि कुशाग्र होती है। परिवार में खुशाहाली आती है। समाज में सम्मान प्राप्त होता है। प्रणय और भोग का सुख मिलता है। व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा होता है और जीवन में वैभव आता है।
अष्ट लक्ष्मी पूजन विधि :-
दीपावली की शाम 06:53pm से 08:16pm / रात 11:40am से 12:31am ( ऊपर दिए गए समय में से किसी भी एक समय में अपनी सुविधा अनुसार पूजन कर सकते है ) के बीच गुलाबी कपड़े पहने और गुलाबी आसान का प्रयोग करें। गुलाबी कपड़े पर श्रीयंत्र और अष्ट लक्ष्मी का चित्र स्थापित करें। किसी भी थाली में गाय के घी के 8 दीपक जलाएं। गुलाब की अगरबत्ती जलाएं। लाल फूलो की माला चढ़ाएं। मावे की बर्फी का भोग लगाएं। अष्टगंध से श्रीयंत्र और अष्ट लक्ष्मी के चित्र पर तिलक करें और 11 कमलगट्टे हाथ में लेकर नीचे दिए गए सभी मंत्रो की एक-एक माला ( 108 बार ) जाप करें।
मंत्र. :-
ॐ श्रीं नमः।।
ॐ श्रीं क्लीं नमः।।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं नमः।।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं नमः।।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नमः।।
ॐ क्लीं ॐ।।
ॐ ऐं ॐ।।
ॐ श्रीं श्रीं नमः।।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अष्टलक्ष्मीयै ह्रीं सिद्धये मम गृहे आगच्छागच्छ नमः स्वाहा।।
जाप पूरा होने के बाद आठों दीपक घर की आठ दिशाओं में लगा दें तथा कमलगट्टे घर की तिजोरी में स्थापित करें। इस उपाय से जीवन के आठों वर्गों में सफलता प्राप्त होगी।
।। आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो ।।
*🔥 दीपावली पूजा की सबसे सरल विधि, लक्ष्मी पूजा में रखें 10 बातों का ध्यान 🔥*
: दीपावली के अवसर पर जानिए दिवाली पूजा की सबसे सरल विधि और यह भी जानिए कि पूजन के समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
दिवाली की सबसे सरल पूजा विधि ( Diwali puja vidhi ) :
1. ईशान कोण या उत्तर दीशा में साफ सफाई करके स्वास्तिक बनाएं। उसके उपर चावल की ढेरी रखें। अब उसके उपर लकड़ी का पाट बिछाएं। पाट के उपर लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर रखें। तस्वीर में गणेश और कुबेर की तस्वीर भी हो। माता के दाएं और बाएं सफेद हाथी के चित्र भी होना चाहिए।
2. पूजन के समय पंचदेव की स्थापना जरूर करें। सूर्यदेव, श्रीगणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु को पंचदेव कहा गया है। इसके बाद धूप-दीप चलाएं। सभी मूर्ति और तस्वीरों को जल छिड़ककर पवित्र करें।
3. अब खुद कुश के आसन पर बैठकर माता लक्ष्मी की षोडशोपचार पूजा करें। अर्थात 16 क्रियाओं से पूजा करें। पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नेवैद्य, आचमन, ताम्बुल, स्तवपाठ, तर्पण और नमस्कार। पूजन के अंत में सांगता सिद्धि के लिए दक्षिणा भी चढ़ाना चाहिए।
4. माता लक्ष्मी सहित सभी के मस्तक पर हलदी कुंकू, चंदन और चावल लगाएं। फिर उन्हें हार और फूल चढ़ाएं। पूजन में अनामिका अंगुली (छोटी अंगुली के पास वाली यानी रिंग फिंगर) से गंध (चंदन, कुमकुम, अबीर, गुलाल, हल्दी आदि) लगाना चाहिए। इसी तरह उपरोक्त षोडशोपचार की सभी सामग्री से पूजा करें। पूजा करते वक्त उनके मंत्र का जाप करें।
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।
ॐ महालक्ष्म्यै नमो नम: धनप्रदायै नमो नम: विश्वजनन्यै नमो नम:।
5. पूजा करने के बाद प्रसाद या नैवेद्य (भोग) चढ़ाएं। ध्यान रखें कि नमक, मिर्च और तेल का प्रयोग नैवेद्य में नहीं किया जाता है। प्रत्येक पकवान पर तुलसी का एक पत्ता रखा जाता है। इस दिन लक्ष्मीजी को मखाना, सिंघाड़ा, बताशे, ईख, हलुआ, खीर, अनार, पान, सफेद और पीले रंग के मिष्ठान्न, केसर-भात आदि अर्पित किए जाते हैं। पूजन के दौरान 16 प्रकार की गुजिया, पपड़ियां, अनर्सा, लड्डू भी चढ़ाएं जाते हैं। आह्वान में पुलहरा चढ़ाया जाता है। इसके बाद चावल, बादाम, पिस्ता, छुआरा, हल्दी, सुपारी, गेंहूं, नारियल अर्पित करते हैं। केवड़े के फूल और आम्रबेल का भोग अर्पित करते हैं।
Lakshmi Puja Vidhi
6. पूजा करने के बाद अंत में खड़े होकर उनकी आरती करके नैवेद्य चढ़ाकर पूजा का समापन किया जाता है। पूजा के बाद कपूर आरती जरूर करें। कर्पूर गौरम करुणा का श्लोक बोलें। आरती को सबसे पहले उसे अपने आराध्य के चरणों की तरफ चार बार, इसके बाद नाभि की तरफ दो बार और अंत में एक बार मुख की तरफ घुमाएं। ऐसा कुल सात बार करें। आरती करने के बाद उस पर से जल फेर दें और प्रसाद स्वरूप सभी लोगों पर छिड़कें।
8. मुख्य पूजा के बाद अब मुख्य द्वार या आंगन में दीये जलाएं। एक दीया यम के नाम का भी जलाएं। रात्रि में घर के सभी कोने में भी दीए जलाएं।
9. पूजा और आरती के बाद ही किसी से मिलने जाएं, मिठाई बांटे या पटाखें फोड़े।
10. घर में या मंदिर में जब भी कोई विशेष पूजा करें तो अपने इष्टदेव के साथ ही स्वस्तिक, कलश, नवग्रह देवता, पंच लोकपाल, षोडश मातृका, सप्त मातृका का पूजन भी किया जाता। लेकिन विस्तृत पूजा तो पंडित जी ही करते है अत: आप ऑनलाइन भी किसी पंडितजी की मदद से विशेष पूजा कर सकते हैं। विशेष पूजन पंडित जीकी मदद से ही करवाने चाहिए, ताकि पूजा विधिवत हो सके।
पूजा में रखें 10 बातों का ध्यान
1. दिवाली के पूजा रात्रि के विशेष मुहूर्त में की जाती है। मान्यता अनुसार चौघड़िया का महायोग और शुभ कारक लग्न देखकर रात्रि में लक्ष्मी पूजा का प्रचलन प्राचीनकाल से ही चला आ रहा है। लक्ष्मी कारक योग में पूजा करने से कर्ज से मुक्ति मिलती है तो दूसरी ओर अच्छी और शुद्ध भावना से लक्ष्मी की पूजा से धन और समृद्धि बढ़ती है।
2. इस दिन प्रात: उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होकर पूजा की तैयारी कर लें। पूजा के समय घर के सभी सदस्य एकत्रित होकर ही पूजा करें। पूजा जमीन पर ऊनी आसन पर बैठकर ही करनी चाहिए।
3. पूजा के दौरान किसी भी प्रकार शोर न करें और ना ही किसी अन्य प्रकार की गतिविधियों पर ध्यान दें। ईश्वर के लिए जलाए जाने वाले दीपक के नीचे चावल अवश्य रखने चाहिए। पूजा के दौरान कभी भी दीपक से दीपक नहीं जलाना चाहिए।
4. तांबे के पात्र में चंदन नहीं रखना चाहिए और न ही पतला चंदन देवी-देवताओं को लगाएं।
5. पूजा के पूर्व घर आंगन को अच्छे से सजाएं। द्वार देहरी पर रंगोली और मांडने बनाएं। द्वार पर वंदनवार लगाएं, नियम से उचित संख्या में दीए लगाएं और मां लक्ष्मी के पदचिह्न मुख्य द्वार पर ऐसे लगाएं कि कदम बाहर से अंदर की ओर जाते हुए प्रतीत हों।
6. घर के ईशान कोण में ही पूजा करें। पूजा के समय हमारा मुंह ईशान, पूर्व या उत्तर में होना चाहिए। लक्ष्मी पूजा के समय सात मुख वाला घी का दीपक जलाना चाहिए। इससे माता लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है।
7. इस दिन किसी भी प्रकार का व्यसन करना या जुआ खेलना वर्जित है। मान्यता अनुसार इस दिन किसी के घर नहीं जाते। दिवाली मिलन का कार्य पड़वा के दिन किया जाता है।
8. आरती के बाद हमेशा दोनों हाथ से उसे ग्रहण करें।
9. पूजा-पाठ बगैर आसन के नहीं करना चाहिए।
10. पूजा के बाद अपने आसन के नीचे दो बूंद जल डालें और उसे माथे पर लगा तभी उठना चाहिए, अन्यथा आपकी पूजा का फल देवराज इंद्र को चला जाता है।
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