Saturday, May 27, 2023
Saturday, February 18, 2023
॥ श्रीहरि: ॥
*भगवान् अवतार कब लेते हैं ?*
वर्तमानके भीषण समयमें अनेक प्रकारके अत्याचारोंको फैलते देखकर धार्मिक जगत् में एक प्रकारकी हलचल-सी हो रही है। इस प्रकार पापोंका प्रसार देखकर सहज ही सहृदय मनुष्यके हृदयमें एक प्रश्न उठ जाता है।
प्रश्न—भगवान् अवतार कब लेते हैं? वर्तमानमें इतने अत्याचारोंके होते हुए भी भगवान् प्रकट क्यों नहीं होते? क्या गीतामें की हुई प्रतिज्ञा ठीक नहीं है?
उत्तर—गीतामें भगवान् ने जो प्रतिज्ञा की है वह निश्चय ही ठीक है। अभी अवतार लेनेका समय नहीं आया। नहीं तो भगवान् अवश्य ही अवतार ले लेते। भगवान् स्वयं कहते हैं—
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
(गीता ४। ७-८)
‘हे भारत! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूपको रचता हूँ अर्थात् साकाररूपसे लोगोंके सम्मुख प्रकट होता हूँ। साधु-पुरुषोंका उद्धार करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी अच्छी तरहसे स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ।’
जब-जब पूर्वकालमें भगवान् ने अवतार लिया है उस समयकी परिस्थितिका आप जरा-सा विचार करें तो पता लग सकता है कि उस समय कितना पापपूर्ण और भीषण समय था। सत्ययुगमें हिरण्यकशिपुके राज्यमें ऐसी राजाज्ञा थी कि जो धर्माचरण और हरिकी भक्ति करे उसे फाँसी दे दो, हरिका नाम भी कोई न लेने पावे। इस प्रकारकी राजाज्ञा राजाके स्वपुत्र प्रह्लादने न मानी तो उसे भी घोर दण्ड दिया गया। एक दिन हिरण्यकशिपुने प्रह्लादको गोदमें बैठाकर पूछा—बेटा! तूने क्या पढ़ा है, जरा मुझे सुना। प्रह्लादने कहा—पिताजी! मैंने जो पढ़ा है वह सुनिये—
श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥
(श्रीमद्भा० ७।५।२३)
‘भगवान् विष्णुके नाम और गुणोंका श्रवण एवं कीर्तन करना, भगवान् के गुण, प्रभाव, लीला और स्वरूपका स्मरण करना, भगवान् के चरणोंकी सेवा करना, भगवान् के विग्रहका पूजन करना और उनको नमस्कार करना, दासभावसे आज्ञाका पालन करना, सखा-भावसे प्रेम करना और सर्वस्वसहित अपने-आपको समर्पण करना।’ ऐसी बात सुनकर हिरण्यकशिपु चौंक पड़ा और उसने पूछा—यह बात तुझे किसने सिखायी? मेरे राज्यमें मेरे परम शत्रु विष्णुकी भक्तिका उपदेश देकर मेरे हाथसे कौन मृत्युमुखमें जाना चाहता है? प्रह्लाद बोला—
शास्ता विष्णुरशेषस्य जगतो यो हृदि स्थित:।
तमृते परमात्मानं तात क: केन शास्यते॥
(विष्णुपुराण १।१७।२०)
‘हे पिताजी! हृदयमें स्थित भगवान् विष्णु ही तो सम्पूर्ण जगत् के उपदेशक हैं। हे तात! उन परमात्माको छोड़कर और कौन किसको कुछ सिखा सकता है।’
न केवलं मद्धृदयं स विष्णु-
राक्रम्य लोकानखिलानवस्थित:।
स मां त्वदादींश्च पितस्समस्तान्
समस्तचेष्टासु युनक्ति सर्वग:॥
(विष्णुपुराण १।१७।२६)
‘पिताजी! वे विष्णुभगवान् केवल मेरे ही हृदयमें नहीं बल्कि सम्पूर्ण लोकोंमें स्थित हैं। वे सर्वगामी तो मुझको, आप सबको और समस्त प्राणियोंको अपनी-अपनी चेष्टाओंमें प्रवृत्त करते हैं।’
ऐसी बातें सुनकर तो राक्षसराजका क्रोध अत्यन्त भड़क गया और वह भक्त प्रह्लादको भयानक त्रास देने लगा। हरिनाम लेनेवाले प्रह्लादको विष पिलाया गया, पर्वतसे गिराया गया, सर्पोंसे डसाया गया, आगमें जलाया गया इत्यादि अनेक प्रकारसे राक्षसोंने जबरदस्ती जोर-जुल्म ढहाये, किन्तु उसका कुछ भी अनिष्ट न कर सके—
जाको राखै साइयाँ मारि सकै नहिं कोय।
बार न बाँका करि सकै जो जग बैरी होय॥
कहा करै बैरी प्रबल जो सहाय रघुबीर।
दस हजार गजबल घटॺो घटॺो न दस गज चीर॥
प्रबल शत्रु सामने हो तो भी सारे संसारका वार खाली चला जाता है, उसका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता। भक्तपर अत्यन्त अत्याचार होनेपर अन्तमें खम्भेमेंसे प्रह्लादके प्यारे परम प्रभुको प्रकट होना ही पड़ा।
प्रेम बदौं पहलादहिको जिन पाहनतें परमेसुर काढ़ो।
यद्यपि उस समय लोग तो धर्मका पालन करना चाहते थे परन्तु धर्मकार्योंमें अनेक प्रकारसे बलात् बाधाएँ डाली जाती थीं। वर्तमान समयमें लोग स्वत: ही धर्मका त्याग कर रहे हैं। यदि कोई धर्मपालन करे तो उसमें जबरन् बाधा नहीं दी जाती है।
त्रेतामें देखिये—सुबाहु और मारीच यज्ञोंको ध्वंस कर देते थे। मुनियोंको खा जाते थे। इतना ही नहीं, अनेक राक्षस घोर अत्याचार करने लगे थे। आजकल जहाँ-तहाँ पशुओंकी हड्डियोंके ढेर देखे जाते हैं। परन्तु रामायणको देखनेसे मालूम होता है कि उस समय तो फलमूलाहारी तपस्वी ऋषि-मुनियोंके मांस-मज्जाको राक्षसोंने भक्षण करके उनकी हड्डियोंका ढेर लगा दिया था।
अस्थि समूह देखि रघुराया।
पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया॥
जानतहूँ पूछिअ कस स्वामी।
सबदरसी तुम्ह अंतरजामी॥
निसिचर निकर सकल मुनि खाए।
सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह॥
(रामचरितमानस, अरण्यकाण्ड)
तब उस समय मनुष्यके रूपमें श्रीरामचन्द्रका अवतार हुआ। वैसा घोर समय अब नहीं है। जब-जब धर्मकी हानि और पापकी वृद्धि होती है, तब-तब भगवान् प्रकट होते हैं। (सत्य, न्याय आदि सब धर्मके ही नाम हैं।) धर्म परमेश्वरका स्वरूप है। भगवान् स्वयं कहते हैं—
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥
(गीता १४।२७)
‘हे अर्जुन! उस अविनाशी परब्रह्मका और अमृतका तथा नित्यधर्मका और अखण्ड एकरस आनन्दका मैं ही आश्रय हूँ अर्थात् उपर्युक्त ब्रह्म, अमृत, अव्यय और शाश्वतधर्म तथा ऐकान्तिक सुख, यह सब मेरे ही नाम-रूप हैं, इसलिये इनका मैं परम आश्रय हूँ।’
लोककी स्थिति धर्मकी भित्तिपर ही ठहरी हुई है—
धर्मेण धार्यते पृथ्वी धर्मेण तपते रवि:।
धर्मेण वाति वायुश्च सर्वं धर्मे प्रतिष्ठितम्॥
‘धर्मसे ही पृथ्वी ठहरी हुई है, धर्मसे ही सूर्य तप रहा है, धर्मसे ही वायु चल रहा है—सारा संसार धर्मसे ही प्रतिष्ठित है अर्थात् सबका आधार धर्म ही है।’
वेद भी अनादि है—इसका यह अर्थ नहीं कि वेदकी पुस्तकें अनादि हैं; परन्तु उसकी शिक्षा यानी उपदेश अनादि है। जैसे ‘सत्यं वद’ ‘धर्मं चर’— ‘सत्य बोलो’, ‘धर्माचरण करो’ इत्यादि यह शिक्षा अनादि, सर्वव्यापक और सर्वमान्य है।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान इत्यादि श्रुति-स्मृति प्रतिपादित विधिवाक्य धर्म हैं। धर्मका त्याग करके अनीति करनेवाला अन्तमें नष्ट हो ही जाता है। कंस, रावणादि अनीतिके कारण अन्तमें नष्ट हो गये।
वर्तमान काल अवतार लेने लायक है या नहीं, इसका निर्णय तो प्रभु ही कर सकते हैं। यह बुद्धिसे अतीत विषय है तथापि मनुष्य अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार कुछ अनुमान लगा ही लिया करते हैं सो मेरी साधारण बुद्धिके अनुसार तो यह समझमें आता है कि वर्तमान कालमें पापोंकी वृद्धि और धर्मका क्षय स्वाभाविक होते हुए भी ऐसा घोर समय अभी नहीं आया है कि जिसके कारण भगवान् को अवतार लेना पड़े। इस समय कलियुगके कारण पापाचार बढ़ रहा है तो भी मनुष्य प्रयत्न करनेसे भगवान् को उनकी कृपासे प्राप्त कर सकता है।
भगवान् के दो स्वरूप हैं—निर्गुण और सगुण। उनका वह निर्गुण स्वरूप बुद्धि और इन्द्रियोंसे अतीत है। सगुण स्वरूप बुद्धि और नेत्रोंका भी विषय है, उसे हम देख सकते हैं। सगुणके भी दो भेद हैं—साकार और निराकार। जो सच्चिदानन्दस्वरूपसे सर्वत्र व्यापक है वह सगुण निराकार स्वरूप है। जिस प्रकार सर्वत्र फैले हुए बिजलीके तारमें बिजलीका प्रवाह सदा सर्वव्यापक रहता है वैसे ही भगवान् न दीखनेपर भी सदासर्वत्र विराजमान हैं। इसे सूक्ष्मदर्शी पुरुष अपनी तीक्ष्ण निर्मल बुद्धि द्वारा अनुभव करते हैं—
दृश्यते त्वग्रॺया बुद्धॺा सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभि:।
(कठ० १।३।१२)
‘यह आत्मा सूक्ष्मदर्शी पुरुषोंद्वारा अपनी तीव्र और सूक्ष्म बुद्धिसे ही देखा जाता है।’
परंतु सगुण साकारको तो हम अपने नेत्रोंके सामने प्रकट भी देख सकते हैं।
निर्गुणकी उपासनासे गुणातीत ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। यों तो गुणातीतका वर्णन नित्य, ज्ञान, अनन्त आदि शब्दोंसे किया गया है पर वास्तवमें उसका स्वरूप वाणीद्वारा नहीं बताया जा सकता, वह तो अचिन्त्य और अनिर्वचनीय है। अन्तमें वेद भी ‘नेति-नेति’ कहकर ही बतलाता है। वह अनुमान प्रमाणसे भी नहीं जाना जा सकता, केवल अनुभवरूप ही है। क्योंकि समस्त प्रमाण उस ब्रह्मके सकाशसे ही सिद्ध होते हैं। श्रुति कहती है—
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥
(केन० १।४-५)
इत्यादि।
‘जिसे वाणी प्रकाशित नहीं कर सकती, किंतु जिसके सकाशसे वाणी प्रकाशित होती है, उसे ही तू ब्रह्म जान; यह नाम-रूपात्मक दृश्य जिसकी अविवेकी लोग उपासना करते हैं वह ब्रह्म नहीं है। जिसे मन मनन नहीं कर सकता, किंतु जिसके द्वारा मनको मनन किया हुआ बतलाते हैं, उसे ही तू ब्रह्म जान; यह नाम-रूपात्मक दृश्य जिसकी अविवेकी लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।’
अतएव वह ब्रह्म स्वत:सिद्ध है। ब्रह्म ही जब शुद्ध सत्त्वविशिष्ट होता है, तभी वह बुद्धिद्वारा समझनेमें आ सकता है और साकाररूपसे प्रकट होनेपर नेत्रोंद्वारा भी देखा जा सकता है। भगवान् अपना साकाररूपसे प्रकट होना इस प्रकार बतलाते हैं—
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥
(गीता ४।६)
‘हे अर्जुन! मेरा जन्म प्राकृत मनुष्योंके सदृश नहीं है। मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी, सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ।’
ऐसा कहनेपर भी जो सगुण भगवान् के तत्त्वको नहीं जानते अर्थात् भगवान् कृष्णको ईश्वर नहीं मानते उनके लिये भगवान् कहते हैं—
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥
(गीता ९।११)
‘मेरे परम भावको न जाननेवाले मूढ़लोग मनुष्यका शरीर धारण करनेवाले मुझ सम्पूर्ण भूतोंके महान् ईश्वरको तुच्छ समझते हैं, अर्थात् अपनी योगमायासे संसारके उद्धारके लिये मनुष्यरूपमें विचरते हुए मुझ परमेश्वरको साधारण मनुष्य मानते हैं।’
इसलिये भगवान् के साकारतत्त्वको भी जानना चाहिये। जो भगवान् के साकारतत्त्वको जानता है उसके लिये भगवान् कहते हैं—
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
(गीता ४।९)
‘हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य अर्थात् निर्मल और अलौकिक हैं—इस प्रकार जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता है, वह शरीरको त्यागकर फिर जन्म ग्रहण नहीं करता; किंतु मुझे ही प्राप्त होता है।’
प्रश्न—यहाँ तत्त्वसे जानना क्या है?
उत्तर—भगवान् का जन्म असाधारण है, स्वतन्त्र है, वे मायाके स्वामी बनकर आते हैं—
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥
(गीता ४।६)
‘अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ।’
प्रभुका शरीर अनामय है अर्थात् सारे रोग और विकारोंसे रहित दिव्य है। हमारा जन्म सुख-दु:ख भोगनेके लिये हुआ करता है; परन्तु प्रभु साधुओंकी रक्षा, दुष्टोंका नाश और धर्मकी स्थापना करनेके लिये प्रकट होते हैं।
वे अपनी दिव्य विभूतियोंके सहित योगमायासे अवतरित होते हैं। भक्तिके द्वारा देखे और जाने जाते हैं। अब भी भक्तिद्वारा भगवान् प्रकट हो सकते हैं। भगवान् ने कहा भी है—
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप॥
(गीता ११।५४)
‘परंतु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्तिके द्वारा इस प्रकार चतुर्भुजरूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखनेके लिये, तत्त्वसे जाननेके लिये तथा प्रवेश करनेके लिये अर्थात् एकीभावसे प्राप्त होनेके लिये भी शक्य हूँ।’
भक्तिके द्वारा सब कुछ हो सकता है। साकार भगवान् नेत्रोंसे देखे जाते हैं, सगुण निराकार बुद्धिद्वारा समझे जाते हैं और निर्गुण निराकार अनुभवसे प्राप्त किये जाते हैं। ज्ञानरूप नेत्रोंवाले ज्ञानीजन ही भगवान् को तत्त्वसे जान सकते हैं। कृष्णावतारके समय उनका साक्षात् दर्शन बहुतोंने किया था परंतु उन्हें तत्त्वसे जाननेवाले थोड़े ही थे। भगवान् जन्मते-मरते हुए-से प्रतीत होते हैं पर वास्तवमें वह उनका अवतरण और तिरोभाव है, जन्मना-मरना नहीं है। जैसे अग्नि सर्वत्र व्याप्त है पर चेष्टा करनेसे चाहे जहाँ प्रज्वलित हो जाती है और अन्तमें विलीन हो जाती है, परंतु न दीखनेपर भी वहाँ वस्तुत: अग्निका अभाव नहीं होता। उसी प्रकार भगवान् भी सर्वत्र व्याप्त होते हुए प्रकट और अन्तर्धान हो जाते हैं। भगवान् की शारीरिक धातु चिन्मय और दिव्य है, प्राकृतिक नहीं है। देखनेमें नरवपु धारणकर नरलीला करते हुए प्राकृतिककी-ज्यों दीख पड़ते हैं।
सर्वशक्तिमान् पूर्णब्रह्म, परमेश्वर वास्तवमें जन्म और मृत्युसे सर्वथा अतीत हैं। उनका जन्म जीवोंकी भाँति नहीं है; वे अपने भक्तोंपर अनुग्रह करके अपनी दिव्य लीलाओंके द्वारा उनके मनको अपनी ओर आकर्षित करनेके लिये दर्शन, स्पर्श और भाषणादिके द्वारा उनको सुख पहुँचानेके लिये, संसारमें अपनी दिव्य कीर्ति फैलाकर उसके श्रवण, कीर्तन और स्मरणद्वारा लोगोंके पापोंका नाश करनेके लिये तथा जगत् में पापाचारियोंका विनाश करके धर्मकी स्थापना करनेके लिये जन्म-धारणकी केवल लीलामात्र करते हैं। उनका वह जन्म निर्दोष और अलौकिक है, जगत् का कल्याण करनेके लिये ही भगवान् इस प्रकार मनुष्यादिके रूपमें लोगोंके सामने प्रकट होते हैं; उनका वह विग्रह प्राकृत उपादानोंसे बना हुआ नहीं होता—वह दिव्य, चिन्मय, प्रकाशमान, शुद्ध और अलौकिक होता है; इनके जन्ममें गुण और कर्म-संस्कार हेतु नहीं होते; वे मायाके वशमें होकर जन्म धारण नहीं करते; किंतु अपनी प्रकृतिके अधिष्ठाता होकर योगमायासे मनुष्यादिके रूपमें केवल लोगोंपर दया करके ही प्रकट होते हैं—इस बातको भलीभाँति समझ लेना अर्थात् इसमें किंचिन्मात्र भी असम्भावना और विपरीत भावना न रखकर पूर्ण विश्वास करना और साकाररूपमें प्रकट भगवान् को साधारण मनुष्य न समझकर सर्वशक्तिमान्, सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी, साक्षात् सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्म परमात्मा समझना भगवान् के जन्मको तत्त्वसे दिव्य समझना है। इस अध्यायके छठे श्लोकमें यही बात समझायी गयी है। सातवें अध्यायके २४ वें और २५ वें श्लोकोंमें और नवें अध्यायके ११ वें तथा १२ वें श्लोकोंमें इस तत्त्वको न समझकर भगवान् को साधारण मनुष्य समझनेवालोंकी निन्दा की गयी है एवं दसवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें इस तत्त्वको समझनेवालेकी प्रशंसा की गयी है।
जो पुरुष इस प्रकार भगवान् के जन्मकी दिव्यताको तत्त्वसे समझ लेता है, उसके लिये भगवान् का एक क्षणका वियोग भी असह्य हो जाता है। भगवान् में परम श्रद्धा और अनन्यप्रेम होनेके कारण उसके द्वारा भगवान् का अनन्यचिन्तन होता रहता है।
प्रश्न-इनके कर्मोंमें क्या दिव्यता है?
उत्तर-भगवान् के कर्म अहंकार और स्वार्थके बिना केवल लोकहितके लिये ही होते हैं। भगवान् स्वयं कहते हैं—
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥
(गीता ३।२२)
‘हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकोंमें न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करनेयोग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्ममें ही बरतता हूँ।’
किन्तु—
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥
(गीता ४।१४)
‘कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है; इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते—इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता।’
भगवान् के सारे कर्म लीलामय होते हैं। उनके कर्मोंसे लोगोंको नीति, धर्म और प्रेमका उपदेश मिलता रहता है, भगवान् सृष्टि-रचना और अवतार-लीलादि जितने भी कर्म करते हैं, उनमें उनका किंचिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं है; केवल लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही वे मनुष्यादि अवतारोंमें नाना प्रकारके कर्म करते हैं (३।२२-२३)। भगवान् अपनी प्रकृतिद्वारा समस्त कर्म करते हुए भी उन कर्मोंके प्रति कर्तृत्वभाव न रहनेके कारण वास्तवमें न तो कुछ करते हैं और न उनके बन्धनमें पड़ते हैं; भगवान् की उन कर्मोंके फलमें किंचिन्मात्र भी स्पृहा नहीं होती (४। १३-१४)। भगवान् के द्वारा जो कुछ भी चेष्टा होती है, लोकहितार्थ ही होती है (४। ८)। उनके प्रत्येक कर्ममें लोगोंका हित भरा रहता है। वे अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके स्वामी होते हुए भी सर्वसाधारणके साथ अभिमानरहित दया और प्रेमपूर्ण समताका व्यवहार करते हैं (९। २९); जो कोई मनुष्य जिस प्रकार उनको भजता है, वे स्वयं उसे उसी प्रकार भजते हैं (४। ११); अपने अनन्य भक्तोंका योगक्षेम भगवान् स्वयं चलाते हैं (९। २२), उनको दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं (१०। १०-११) और भक्तिरूपी नौकापर बैठे हुए भक्तोंका संसार-समुद्रसे शीघ्र ही उद्धार करनेके लिये स्वयं उनके कर्णधार बन जाते हैं (१२। ७)। इस प्रकार भगवान् के समस्त कर्म आसक्ति, अहंकार और कामनादि दोषोंसे सर्वथा रहित निर्मल और शुद्ध तथा केवल लोगोंका कल्याण करने एवं नीति, धर्म, शुद्ध प्रेम और न्याय आदिका जगत् में प्रचार करनेके लिये ही होते हैं; इन सब कर्मोंको करते हुए भी भगवान् का वास्तवमें उन कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, वे उनसे सर्वथा अतीत और अकर्ता हैं—इस बातको भलीभाँति समझ लेना, इसमें किंचिन्मात्र भी असम्भावना या विपरीत भावना न रहकर पूर्ण विश्वास हो जाना ही भगवान् के कर्मोंको तत्त्वसे दिव्य समझना है। इस प्रकार जान लेनेपर उस जाननेवालेके कर्म भी शुद्ध और अलौकिक हो जाते हैं—अर्थात् फिर वह भी सबके साथ दया, समता, धर्म, नीति, विनय और निष्काम प्रेमभावका बर्ताव करता है। जिनका भगवान् में प्रेम और श्रद्धा है वे भगवान् की प्रत्येक लीलामय क्रियाओंसे शिक्षा ग्रहण किया करते हैं और प्रेममें मुग्ध हुआ करते हैं। उनको आदर्श मानकर उनका अनुकरण करनेकी चेष्टा किया करते हैं, इस प्रकार भगवान् के लीलामय कर्मोंसे शिक्षा ग्रहण करके जो उनका अनुकरण करते हैं वे भी कर्मोंसे लिपायमान न होकर परमेश्वरको प्राप्त हो जाते हैं और उनके कर्म भी दिव्य हो जाते हैं।
यस्य सर्वे समारम्भा: कामसंकल्पवर्जिता:।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:॥
(गीता ४।१९)
‘जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्पके होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्निके द्वारा भस्म हो गये हैं, उस महापुरुषको ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं।’
फलकामना, आसक्ति और कर्तापनके अभिमानसे रहित होकर केवल लोकहितार्थ ही जो कर्मोंका करना है यही वास्तवमें भगवान् के कर्मोंको दिव्य समझना है। जिनके कर्म ऐसे नहीं होते, जो भगवान् का अनुकरण नहीं करते, उन्होंने भगवान् के कर्मोंकी दिव्यताको वास्तवमें नहीं समझा; क्योंकि जो भगवान् के कर्मोंकी दिव्यताका तत्त्व समझ लेते हैं उनके भी कर्म फिर दिव्य हो जाते हैं।
पहले भी मोक्षकी इच्छावाले साधकोंने ऐसा समझकर ही कर्मोंका आचरण किया था, उसी प्रकार आसक्ति, फलेच्छा और अभिमान छोड़कर कर्म करनेके लिये भगवान् अर्जुनको आज्ञा देते हुए कर्मोंका तत्त्व इस प्रकार समझाते हैं—
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता:।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण:।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति:॥
कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य:।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत्॥
(गीता ४। १६—१८)
‘कर्म क्या है? और अकर्म क्या है?—इस प्रकार इसका निर्णय करनेमें बुद्धिमान् पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिये वह कर्मतत्त्व मैं तुझे भलीभाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभसे अर्थात् कर्मबन्धनसे मुक्त हो जायगा। कर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये और अकर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये तथा विकर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्मकी गति गहन है। जो मनुष्य कर्ममें अकर्म देखता है और जो अकर्ममें कर्म देखता है, वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् है और वह योगी समस्त कर्मोंको करनेवाला है।’
प्रश्न-कर्ममें अकर्म देखना क्या है? तथा इस प्रकार देखनेवाला मनुष्योंमें बुद्धिमान्, योगी और समस्त कर्म करनेवाला कैसे है?
उत्तर-लोकप्रसिद्धिमें मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरके व्यापारमात्रका नाम कर्म है; उनमेंसे जो शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म हैं उनको कर्म कहते हैं और शास्त्रनिषिद्ध पापकर्मोंको विकर्म कहते हैं। शास्त्रनिषिद्ध पापकर्म सर्वथा त्याज्य हैं, इसलिये उनकी चर्चा यहाँ नहीं की गयी। अत: यहाँ, जो शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म हैं, उनमें अकर्म देखना क्या है—इस बातपर विचार करना है। यज्ञ, दान, तप तथा वर्णाश्रमके अनुसार जीविका और शरीर-निर्वाह-सम्बन्धी जितने भी शास्त्रविहित कर्म हैं—उन सबमें आसक्ति, फलेच्छा, ममता और अहंकारका त्याग कर देनेसे वे इस लोक या परलोकमें सुख-दु:खादि फल भुगतानेके और पुनर्जन्मके हेतु नहीं बनते बल्कि मनुष्यके पूर्वकृत समस्त शुभाशुभ कर्मोंका नाश करके उसे संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाले होते हैं—इस रहस्यको समझ लेना ही कर्ममें अकर्म देखना है। इस प्रकार कर्ममें अकर्म देखनेवाला मनुष्य आसक्ति, फलेच्छा और ममताके त्यागपूर्वक ही कर्तव्यकर्मोंका यथायोग्य आचरण करता है। अत: वह कर्म करता हुआ भी उनसे लिप्त नहीं होता, इसलिये वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् है; उसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है, इसलिये वह योगी है; और उसे कोई भी कर्तव्य शेष नहीं रहता—वह कृतकृत्य हो जाता है, इसलिये वह समस्त कर्मोंको करनेवाला है।
प्रश्न-अकर्ममें कर्म देखना क्या है? तथा इस प्रकार देखनेवाला मनुष्योंमें बुद्धिमान्, योगी और समस्त कर्म करनेवाला कैसे है?
उत्तर-लोकप्रसिद्धिमें मन, वाणी और शरीरके व्यापारको त्याग देनेका ही नाम अकर्म है; यह त्यागरूप अकर्म भी आसक्ति, फलेच्छा, ममता और अहंकारपूर्वक किया जानेपर पुनर्जन्मका हेतु बन जाता है। इतना ही नहीं, कर्तव्य-कर्मोंकी अवहेलनासे या दम्भाचारके लिये किया जानेपर तो यह विकर्म (पाप) के रूपमें बदल जाता है—इस रहस्यको समझ लेना ही अकर्ममें कर्म देखना है। इस रहस्यको समझनेवाला मनुष्य किसी भी वर्णाश्रमोचित कर्मका त्याग न तो शारीरिक कष्टके भयसे करता है, न राग-द्वेष अथवा मोहवश और न मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा या अन्य किसी फलकी प्राप्तिके लिये ही करता है। इसलिये वह न तो कभी अपने कर्तव्यसे गिरता है और न किसी प्रकारके त्यागमें ममता, आसक्ति, फलेच्छा या अहंकारका सम्बन्ध जोड़कर पुनर्जन्मका ही भागी बनता है, इसीलिये वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् है। उसका परम पुरुष परमेश्वरसे संयोग हो जाता है, इसलिये वह योगी है और उसके लिये कोई भी कर्तव्य शेष नहीं रहता, इसलिये वह समस्त कर्म करनेवाला है।
प्रश्न-कर्मसे क्रियमाण, विकर्मसे विविध प्रकारके संचित कर्म और अकर्मसे प्रारब्ध कर्म लेकर कर्ममें अकर्म देखनेका यदि यह अर्थ किया जाय कि क्रियमाण कर्म करते समय यह देखे कि भविष्यमें यही कर्म प्रारब्ध कर्म (अकर्म) बनकर फलभोगके रूपमें उपस्थित होंगे और अकर्ममें कर्म देखनेका यह अर्थ किया जाय कि प्रारब्धरूप फलभोगके समय उन दु:खादि भोगोंको अपने पूर्वकृत क्रियमाण कर्मोंका ही फल समझे और इस प्रकार समझकर पापकर्मोंका त्याग करके शास्त्रविहित कर्मोंको करता रहे, तो क्या आपत्ति है? क्योंकि संचित, क्रियमाण और प्रारब्ध कर्मोंके ये ही तीन भेद प्रसिद्ध हैं?
उत्तर—ठीक है, ऐसा मानना बहुत लाभप्रद है और बड़ी बुद्धिमानी है; किंतु ऐसा अर्थ मान लेनेसे ‘कवयोऽप्यत्र मोहिता:’, ‘गहना कर्मणो गति:’, ‘यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्’, ‘स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत्’, ‘तमाहु: पण्डितं बुधा:’, ‘नैव किंचित्करोति स:’ आदि वचनोंकी संगति नहीं बैठती। अतएव यह अर्थ लाभप्रद होनेपर भी प्रकरण विरुद्ध है।
प्रश्न—कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवाला साधक भी मुक्त हो जाता है या सिद्ध पुरुष ही इस प्रकार देख सकता है?
उत्तर—मुक्त पुरुषके जो स्वाभाविक लक्षण होते हैं, वे ही साधकके लिये साध्य होते हैं। अतएव मुक्त पुरुष तो स्वभावसे ही इस तत्त्वको जानता है और साधक उनके उपदेशद्वारा जानकर उस प्रकार साधन करनेसे मुक्त हो जाता है। इसीलिये भगवान् ने कहा है कि ‘मैं तुझे कर्म-तत्त्व बतलाऊँगा, जिसे जानकर तू कर्मबन्धनसे छूट जायगा।’
उपर्युक्त प्रकारसे कर्मयोगके तत्त्वको जाननेवाला ही मनुष्योंमें बुद्धिमान् है, योगी है और सम्पूर्ण कर्मोंका करनेवाला है इसलिये वह इस कर्मरहस्यको समझकर संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है।
इस प्रकारसे कर्मोंका तत्त्व समझकर फल, कामना, आसक्ति और अहंकारको छोड़कर समस्त कर्मोंका करना ही भगवान् के कर्मोंकी दिव्यताको समझना है।
ऊपर बतलाये हुए भगवान् के जन्म और कर्मोंकी दिव्यताके तत्त्वको जाननेवाला पुरुष सारे कर्म और दु:खोंसे छूटकर परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
Saturday, February 4, 2023
विवाह में सात फेरे ही क्यों लेते हैं?
||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मित्रो!
आखिर हिन्दू विवाह के समय अग्नि के समक्ष सात फेरे ही क्यों लेते हैं? दूसरा यह कि क्या फेरे लेना जरूरी है?
पाणिग्रहण का अर्थ : - पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से 'विवाह' के नाम से जाना जाता है। वर द्वारा नियम और वचन स्वीकारोक्ति के बाद कन्या अपना हाथ वर के हाथ में सौंपे और वर अपना हाथ कन्या के हाथ में सौंप दे। इस प्रकार दोनों एक-दूसरे का पाणिग्रहण करते हैं। कालांतर में इस रस्म को 'कन्यादान' कहा जाने लगा, जो कि अनुचित है।
नीचे लिखे मंत्र के साथ कन्या अपना हाथ वर की ओर बढ़ाए, वर उसे अंगूठा सहित (समग्र रूप से) पकड़ ले। भावना करें कि दिव्य वातावरण में परस्पर मित्रता के भाव सहित एक-दूसरे के उत्तरदायित्व को स्वीकार कर रहे हैं।
ॐ यदैषि मनसा दूरं, दिशोऽ नुपवमानो वा।
हिरण्यपणोर् वै कर्ण, स त्वा मन्मनसां करोतु असौ।। -पार.गृ.सू. 1.4.15
विवाह का अर्थ : - विवाह को शादी या मैरिज कहना गलत है। विवाह का कोई समानार्थी शब्द नहीं है। विवाह= वि+वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है- विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना।
विवाह एक संस्कार : - अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है जिसे कि विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है, लेकिन हिन्दू धर्म में विवाह बहुत ही भली-भांति सोच- समझकर किए जाने वाला संस्कार है। इस संस्कार में वर और वधू सहित सभी पक्षों की सहमति लिए जाने की प्रथा है। हिन्दू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संबंध से अधिक आत्मिक संबंध होता है और इस संबंध को अत्यंत पवित्र माना गया है।
सात फेरे या सप्तपदी : - हिन्दू धर्म में 16 संस्कारों को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। विवाह में जब तक 7 फेरे नहीं हो जाते, तब तक विवाह संस्कार पूर्ण नहीं माना जाता। न एक फेरा कम, न एक ज्यादा। इसी प्रक्रिया में दोनों 7 फेरे लेते हैं जिसे 'सप्तपदी' भी कहा जाता है। ये सातों फेरे या पद 7 वचन के साथ लिए जाते हैं। हर फेरे का एक वचन होता है जिसे पति-पत्नी जीवनभर साथ निभाने का वादा करते हैं। ये 7 फेरे ही हिन्दू विवाह की स्थिरता का मुख्य स्तंभ होते हैं। अग्नि के 7 फेरे लेकर और ध्रुव तारे को साक्षी मानकर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं।
सात अंक का महत्व...
ध्यान देने योग्य बात है कि भारतीय संस्कृति में 7 की संख्या मानव जीवन के लिए बहुत विशिष्ट मानी गई है। संगीत के 7 सुर, इंद्रधनुष के 7 रंग, 7 ग्रह, 7 तल, 7 समुद्र, 7 ऋषि, सप्त लोक, 7 चक्र, सूर्य के 7 घोड़े, सप्त रश्मि, सप्त धातु, सप्त पुरी, 7 तारे, सप्त द्वीप, 7 दिन, मंदिर या मूर्ति की 7 परिक्रमा, आदि का उल्लेख किया जाता रहा है।
उसी तरह जीवन की 7 क्रियाएं अर्थात- शौच, दंत धावन, स्नान, ध्यान, भोजन, वार्ता और शयन। 7 तरह के अभिवादन अर्थात- माता, पिता, गुरु, ईश्वर, सूर्य, अग्नि और अतिथि। सुबह सवेरे 7 पदार्थों के दर्शन- गोरोचन, चंदन, स्वर्ण, शंख, मृदंग, दर्पण और मणि। 7 आंतरिक अशुद्धियां- ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, घृणा और कुविचार। उक्त अशुद्धियों को हटाने से मिलते हैं ये 7 विशिष्ट लाभ- जीवन में सुख, शांति, भय का नाश, विष से रक्षा, ज्ञान, बल और विवेक की वृद्धि।
स्नान के 7 प्रकार- मंत्र स्नान, मौन स्नान, अग्नि स्नान, वायव्य स्नान, दिव्य स्नान, मसग स्नान और मानसिक स्नान। शरीर में 7 धातुएं हैं- रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मजा और शुक्र। 7 गुण- विश्वास, आशा, दान, निग्रह, धैर्य, न्याय, त्याग। 7 पाप- अभिमान, लोभ, क्रोध, वासना, ईर्ष्या, आलस्य, अति भोजन और 7 उपहार- आत्मा के विवेक, प्रज्ञा, भक्ति, ज्ञान, शक्ति, ईश्वर का भय।
यही सभी ध्यान रखते हुए अग्नि के 7 फेरे लेने का प्रचलन भी है जिसे 'सप्तपदी' कहा गया है। वैदिक और पौराणिक मान्यता में भी 7 अंक को पूर्ण माना गया है। कहते हैं कि पहले 4 फेरों का प्रचलन था। मान्यता अनुसार ये जीवन के 4 पड़ाव- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक था।
हमारे शरीर में ऊर्जा के 7 केंद्र हैं जिन्हें 'चक्र' कहा जाता है। ये 7 चक्र हैं- मूलाधार (शरीर के प्रारंभिक बिंदु पर), स्वाधिष्ठान (गुदास्थान से कुछ ऊपर), मणिपुर (नाभि केंद्र), अनाहत (हृदय), विशुद्ध (कंठ), आज्ञा (ललाट, दोनों नेत्रों के मध्य में) और सहस्रार (शीर्ष भाग में जहां शिखा केंद्र) है।
उक्त 7 चक्रों से जुड़े हैं हमारे 7 शरीर। ये 7 शरीर हैं- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर, मानस शरीर, आत्मिक शरीर, दिव्य शरीर और ब्रह्म शरीर।
विवाह की सप्तपदी में उन शक्ति केंद्रों और अस्तित्व की परतों या शरीर के गहनतम रूपों तक तादात्म्य बिठाने करने का विधान रचा जाता है। विवाह करने वाले दोनों ही वर और वधू को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से एक-दूसरे के प्रति समर्पण और विश्वास का भाव निर्मित किया जाता है।
मनोवैज्ञानिक तौर से दोनों को ईश्वर की शपथ के साथ जीवनपर्यंत तक दोनों से साथ निभाने का वचन लिया जाता है इसलिए विवाह की सप्तपदी में 7 वचनों का भी महत्व है।
सप्तपदी में पहला पग भोजन व्यवस्था के लिए, दूसरा शक्ति संचय, आहार तथा संयम के लिए, तीसरा धन की प्रबंध व्यवस्था हेतु, चौथा आत्मिक सुख के लिए, पांचवां पशुधन संपदा हेतु, छठा सभी ऋतुओं में उचित रहन-सहन के लिए तथा अंतिम 7वें पग में कन्या अपने पति का अनुगमन करते हुए सदैव साथ चलने का वचन लेती है तथा सहर्ष जीवनपर्यंत पति के प्रत्येक कार्य में सहयोग देने की प्रतिज्ञा करती है।
'मैत्री सप्तपदीन मुच्यते' अर्थात एकसाथ सिर्फ 7 कदम चलने मात्र से ही दो अनजान व्यक्तियों में भी मैत्री भाव उत्पन्न हो जाता है अतः जीवनभर का संग निभाने के लिए प्रारंभिक 7 पदों की गरिमा एवं प्रधानता को स्वीकार किया गया है। 7वें पग में वर, कन्या से कहता है कि 'हम दोनों 7 पद चलने के पश्चात परस्पर सखा बन गए हैं।'
मन, वचन और कर्म के प्रत्येक तल पर पति-पत्नी के रूप में हमारा हर कदम एकसाथ उठे इसलिए आज अग्निदेव के समक्ष हम साथ-साथ 7 कदम रखते हैं। हम अपने गृहस्थ धर्म का जीवनपर्यंत पालन करते हुए एक-दूसरे के प्रति सदैव एकनिष्ठ रहें और पति-पत्नी के रूप में जीवनपर्यंत हमारा यह बंधन अटूट बना रहे तथा हमारा प्यार 7 समुद्रों की भांति विशाल और गहरा हो।
Wednesday, January 18, 2023
Swastik Symbol in Hinduism
Significances of Swastik symbol, which is made before starting anything auspicious, a holy symbol for Hindus, Jains, Buddhists and Europe. Some of the most ancient Swastikas where found in ancient India and it adopted across sub-continent over centuries.
Swastika (स्वस्तिक) = Su (सु) + Asti (अस्ति) + Ka(क)
Su(सु) means Shubh(शुभ) i.e auspicious or welfare
Asti(अस्ति) means be/happen or exist. It stand for power or existence
Ka(क) stands for doer or performer i.e Karta(कर्ता)
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो ब्रिहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
(नक्षत्र शास्त्र के अनुसार चार नक्षत्र चित्रा, पुषा, रेवती, बृहस्पति की स्थिति की वजह से स्वास्तिक के आकार का निर्माण हुआ है। प्राकृतिक स्वास्तिक निरूपण के साथ साथ ये श्रुति (स्वस्तिक मंत्र ) मानव के लिए स्वस्ति के अधिष्ठाता इन्द्रादि चारो नाक्षत्रिक देवताओ से प्रार्थना कर रही है कि वे चारो देवता मानव के स्व स्वस्तिक को सुशांत बनाये रखे)
Swasti in the above means the one who takes care of our wellbeing and when we add a ‘K’ to Swasti - ‘Swastik’, becomes a symbol that signifies wellbeing, goodness.
The symbol of Swastik is considered as a swaroop of Ganesha as it is the first thing that we make before starting anything good and new. Brahman is explained as the combination of static and dynamic forces, which is also called as Shiva and Sakthi, Prakasha & Vimarsha, Purush and Prakriti.
Brahman is the formless absolute Consciousness who is the root cause of everything. Hinduism has 18 Vidhya Sthanams: 4 vedas, [Rik Yujur, Sama, Atharvana] 6 Angas, [niruktam, chandas, shiksha, vyakaranam, kalpam, jyotisham] 4 Upa angas [Mimamsa, nyaya, purana& itihasa, dharma shastram] and 4 upa vedas [ Gandarva, Ayur Veda, Dhanur Veda & Arta Shastram].
When Brahman takes form, It do works through 3 Gunas or characters called Satva, Rajo and Tamo Gunas. By the combination of these 3 Gunas with 5 fold matter Prithvi (earth), Agni (fire), Jal (water), Vyau (air) and Akaash (ether/space) contribute the entire creation. Swastika also represents five fold matter with its axis fixed on Akaash (ether/space). The reference to this symbol can be found in Vedas and Upanishads.
Swasti means Be Auspicious or Be Welfare, good fortune, represents the Sun or Surya, the source of all life on earth, the direct representer of Brahman, represents Kala or the flow of time, the cyclical motion of time to be exactly representing constructive progress and the cyclic representation of the chaturyugas (Satya, Treta, Dvapara, Kali) and thereby time, also interpreted as representing the four Seasons (Spring, Summer, Autumn and Winter), the four directions (North, East, South and West) believed that it attracts all the good and positive vibrations from across the four directions.
They can be interpreted as the four Vedas with central axis represents Brahman itself from which Vedas originates (Rig, Yajur, Sama, Atharva), the core Hindu scriptures, the Vedic path and Counterclockwise Swastika represents the Tantric path either of which should be chosen by a person for righteous living and Four Paths of Yoga (Jnana Yoga, Bhakti Yoga, Karma Yoga and Raja Yoga).
Swastika also represents Life, the flow of life, the cyclical flow of life, represents the dynamic motion or vibration of matter. It represents Spanda or Vibration which is nothing but Aum mantra. And Representative of Purusharths or Goals of life; Kama (fulfilment of desires), Artha (wealth), Dharmma (righteousness) , Moksha (liberation from cycle of life) rotating on the central axis, Life (right action, worldly prosperity, worldly enjoyment, and spiritual liberation).
Swastika also represents 4 stages of life a man should follow. Brahmacharya (celibacy/education period), Grihastashrama(family/married life), Vaanaprastha ( retiring from responsibilities) and Sanyaas (becoming a hermit) rotating on the axis Life. Four Social classes (Priests, Warriors, Merchants and Workers).
Swastik represents solid matter, material prosperity, and security. According to Akhand Sutra, the symbol of Earth (Prithvi-Bhuta) and Swastik is Muladhara Chakra, the lowest center of consciousness in the pelvis. Swastik represents Kundalini sleeping in Muladhara Chakra. Kundalini sleeps in Muladhara Chakra. As a result, it represents the Static Form of Earth. Swastika also means for eternal.
Swastik represents the involution of consciousness. When Kundalini rises to higher centers of consciousness called Chakras, the static form of four corners of Muladhara Chakra becomes dynamic. The awakened Kundalini is represented by 22/21, the one-third of 22/7. The sleeping Kundalini is represented by Pi or 22/7 (Three plus coils of Kundalini). This process is called revolution and leads to spiritual evolution through ten stages of evolution. The ten stages of revolution and evolution (maturation) follow Divyank, the Divine Constant. Where Divyank:
((22/21) square power of 10.34419) = 1.618034.
22/21: It represents Dynamic Swastik.
10: It represents the ten stages of the revolution of innate human consciousness.
0.34419: It represents the last stage of maturation or evolution.
The swastika drawn as a Yantra represents the auspicious orientation of Prana Shakti/energy. Prana the basic life force has spin and interacts with the human body via the Ida and Pingala Nadis, which is the reason why Pranayama focuses on controlling the flow of Prana, through proper breathing. So Swastika represents prana which is the root cause of life itself.
It also represents the four characteristics of the soul: infinite knowledge, infinite perception, infinite happiness, and infinite energy. It also represents the four columns of the Jain sangha: sadhus, sadhvis, sravakas and shravikas - monks, nuns and female and male laymen. It represents the perpetual nature of the universe in the material world, where a creature is destined to one of those states based on their karma.
In contrast to this circle of rebirth and delusion is the concept of a straight path, constituted by correct faith, understanding and conduct, and visually symbolized by the three dots above the running cross of swastika, which leads the individual out of the transient imperfect world to a permanent perfect state of enlightenment and perfection. This perfect state of liberation is symbolized by the crescent and dot at the top of the swastika.
Right Swastika is a symbol of Nar & Left Swastika is a symbol of Nari. The horizontal lines of Swastika is a symbol of Creation of Universe or Jyotirlinga & verticallines is a symbol of Expansion of Universe. The center point of Swastika is believed to be Nabhi Kamal (नाभि कमल) i.e Navel Lotus of Vishnu from where the Universe is originated.
Swastika is believed to be a symbol of Shri Vishnu (as a Sudarshana Chakra of Vishnu)
Surya (In Rigvedic Richa), Creation Cycle, Entire Brahmanda (Universe); The bijakshara and swarup of mantra of Ganpati appears like Swastika symbol.
Swastika is primarily associated with four colours. Red, gold, green and Black/Deep Blue. In fact Swastika represents everything. Scientifically, it is believed that if the symbol is made correctly it helps in attracting an immense amount of positive energy. It protects one from all sorts of evil eye.
The right-facing symbol (clockwise) (卐) is called swastika, symbolizing surya ("sun"), prosperity and good luck, while the left-facing symbol (counter-clockwise) (卍) is called sauwastika, symbolising night or tantric aspects of Kali.
Red clockwise Swastika represents the flow of Prana which represents flourishing of life. Red is also the colour of pure Satva Guna or absolute purity. So this Swastika represents the Maya or Adi Parasakthi , the mother of the universe. This symbol shows nourishment and motherly protection from all odds
Black/Deep Blue coloured Clockwise Swastika is used to represent Defensive Power. It directly represents the protective power of God. In other words it represents Dakshin Kalika the fierce form of mother Goddess or the auspicious Kali. It also shows Vedic aspect of defensive power otherwise called the protection derived from Adharva-Veda and Tantra.
Always remember to keep the lines and angles in a Swastik clean and clear without any designs for better benefits or else it also can land you into troubles. The use of Swastika at impure places should be avoided. It is advised that whenever you wear a Swastik pendant it should always be inside a circle.
"Omm-Swastik-Trishul" consists of three mythological words ‘Om’, ‘Swastik’, and ‘Trishul’. The combination of all these three symbols not only protects you from negativity and evil but also purifies the whole environment of living so that you could live a happy and peaceful life full of financial abundance. This auspicious symbol should always be worshipped so that the blessing would keep coming to us.
Monday, January 16, 2023
बृहस्पति एवं शुक्र का दाम्पत्य जीवन पर प्रभाव 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰बृहस्पति और शुक्र दो ग्रह हैं जो पुरूष और स्त्री का प्रतिनिधित्व करते हैं.मुख्य रूप ये दो ग्रह वैवाहिक जीवन में सुख दु:ख, संयोग और वियोग का फल देते हैं. बृहस्पति और शुक्र दोनों ही शुभ ग्रह हैंसप्तम भाव जीवन साथी का घर होता है इस घर में इन दोनों ग्रहों की स्थिति एवं प्रभाव के अनुसार विवाह एवं दाम्पत्य सुख का सुखद अथवा दुखद फल मिलता है.पुरूष की कुण्डली में शुक्र ग्रह पत्नी एवं वैवाहिक सुख का कारक होता है और स्त्री की कुण्डली में बृहस्पति.ये दोनों ग्रह स्त्री एवं पुरूष की कुण्डली में जहां स्थित होते हैं और जिन स्थानों को देखते हैं उनके अनुसार जीवनसाथी मिलता है और वैवाहिक सुख प्राप्त होता है.ज्योतिषशास्त्र का नियम है कि बृहस्पति जिस भाव में होता हैं उस भाव के फल को दूषित करता है और जिस भाव पर इनकी दृष्टि होती है उस भाव से सम्बन्धित शुभ फल प्रदान करते हैं.जिस स्त्री अथवा पुरूष की कुण्डली में गुरू सप्तम भाव में विराजमान होता हैं उनका विवाह या तो विलम्ब से होता है अथवा दाम्पत्य जीवन के सुख में कमी आती है.पति पत्नी में अनबन और क्लेश के कारण गृहस्थी में उथल पुथल मची रहती है. दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने में बृहस्पति और शुक्र का सप्तम भाव और सप्तमेश से सम्बन्ध महत्वपूर्ण होता है। जिस पुरूष की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश और विवाह कारक ग्रह शुक बृहस्पति से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर गुणों वाली अच्छी जीवनसंगिनी मिलती है.इसी प्रकार जिस स्त्री की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेशऔर विवाह कारक ग्रह बृहस्पति शुक्र से युत या दृष्ट होता है उसे सुन्दर और अच्छे संस्कारों वाला पति मिलता है.शुक्र भी बृहस्पति के समान सप्तम भाव में सफल वैवाहिक जीवन के लिए शुभ नहीं माना जाता है.सप्तम भाव का शुक्र व्यक्ति को अधिक कामुक बनाता हैजिससे विवाहेत्तर सम्बन्ध की संभावना प्रबल रहती है.विवाहेत्तर सम्बन्ध के कारण वैवाहिक जीवन में क्लेश के कारण गृहस्थ जीवन का सुख नष्ट होता है.बृहस्पति और शुक्र जब सप्तम भाव कोदेखते हैं अथवा सप्तमेश पर दृष्टि डालते हैं ) तो इस स्थिति में वैवाहिक जीवन सफल और सुखद होता है.लग्न में बृहस्पति अगर पापकर्तरी योग से पीड़ित होता है तो सप्तम भाव पर इसकी दृष्टि का शुभ प्रभाव नहीं होता है ऐसे में सप्तमेश कमज़ोर हो या शुक्र के साथ हो तो दाम्पत्य जीवन सुखद और सफल रहने की संभावना कम रहती है।
Saturday, January 14, 2023
हिंदू धर्म में मकर संक्रांति 2023 का विशेष महत्व है। पौष माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। हालांकि मकर संक्रांति को देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों जैसे- लोहड़ी, उत्तरायण, खिचड़ी, टिहरी, पोंगल आदि नामों से भी जाना जाता है। हर साल जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो उसे सूर्य की मकर संक्रांति कहा जाता है। इस दिन से गुरु और सूर्य के प्रभाव में तेजी आने लगती है। मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन देव भी धरती पर अवतरित होते हैं और आत्मा को मोक्ष प्राप्त होता है। इस दिन से खरमास का समापन होता है और शुभ और मांगलिक कार्यों जैसे कि शादी, सगाई, मुंडन, गृह प्रवेश आदि के लिए मुहूर्त देखे जाने लगते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन से सूर्य देव अपने रथ से खर (गधे) को निकालकर सातों घोड़े में सवार हो जाते हैं और उनकी मदद से चारों दिशाओं में भ्रमण करने लगते हैं और सूर्य की चमक तेज हो जाती है। मकर संक्रांति का त्योहार सूर्य को समर्पित होता है। इस दिन स्नान, दान और तिल खाने की परंपरा है। आइए जानते हैं एस्ट्रोसेज के इस विशेष ब्लॉग में मकर संक्रांति 2023 की पूजा विधि, महत्व, किस राशि के जातकों की चमकेगी किस्मत और इससे जुड़ी कई अन्य महत्वपूर्ण बातें।मकर संक्रांति 2023: तिथि व मुहूर्तसाल 2023 में मकर संक्रांति और लोहड़ी की तारीख को लेकर लोग असमंजस में हैं। तो आइए जानते हैं कि सटीक तारीख कौन सी है:मकर संक्रांति तिथि: 15 जनवरी 2023, रविवारपुण्य काल मुहूर्त: सुबह 07 बजकर 15 मिनट से 12 बजकर 30 मिनट तक।अवधि: 05 घंटे, 14 मिनटमहा पुण्य काल: सुबह 07 बजकर 15 मिनट से सुबह 09 बजकर 15 मिनट तक।अवधि: 02 घंटेमकर संक्रांति 2023 का महत्वमकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने खुद उनके घर जाते हैं। बता दें कि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं। उनके भाव में सूर्य के प्रवेश मात्र से शनि का प्रभाव खत्म हो जाता है। सूर्य के प्रकाश के सामने कोई भी नकारात्मकता नहीं टिकती है। मान्यता है कि मकर संक्रांति पर सूर्य की आराधना और इससे संबंधित दान करने से शनि दोष से छुटकारा मिल जाता है। इसके साथ ही इस दिन खिचड़ी का भोग अवश्य लगाना चाहिए। इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और सभी ग्रह दोषों से छुटकारा मिलता है। ज्योतिष शास्त्र में उड़द की दाल को शनिदेव से जोड़ा गया है। ऐसे में इस दिन उड़द दाल की खिचड़ी खाने और दान करने से जातकों पर सूर्य देव और शनि देव की विशेष कृपा बनी रहती है। बता दें कि साथ ही चावल को चंद्रमा, नमक को शुक्र, हल्दी को बृहस्पति, हरी सब्जियों को बुध के लिए शुभ माना जाता है। वहीं मंगल का संबंध गर्मी से है। इसलिए मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने से कुंडली में सभी ग्रहों की स्थिति में सुधार होता है।कैसे प्रसन्न होंगे भगवान सूर्य नारायण? मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से पहले स्नान करके साफ कपड़े धारण कर लें।अब उगते हुए सूर्य भगवान की तरफ मुंह करके कुश का आसन लगाएं। फिर उस आसन पर खड़े होकर तांबे के पात्र में जल लें। जल में मिश्री डाल लें। इससे सूर्य नारायण प्रसन्न होते हैं।इसके अलावा तांबे के लोटे में रोली, चंदन, लाल पुष्प, चावल, गुड़ आदि मिलाकर भी सूर्यदेव को जल देना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से सूर्य देवता की विशेष कृपा प्राप्त होती है।जब सूर्य की पहली किरण दिखनी शुरू हो जाए, तो आप अपने दोनों हाथों से तांबे के लोटे को पकड़कर सूर्य देव को जल चढ़ाएं। ध्यान रहे कि जल चढ़ाते समय पानी आपके पैर पर न गिरे।जल देते समय इन मंत्रों का जाप करें-ऊँ ऐही सूर्यदेव सहस्त्रांशो तेजो राशि जगत्पते।अनुकम्पय मां भक्त्या गृहणार्ध्य दिवाकर:।।ऊँ सूर्याय नम:, ऊँ आदित्याय नम:, ऊँ नमो भास्कराय नम:। अर्घ्य समर्पयामि।सूर्य को जल देने के बाद अपने स्थान पर ही 3 बार परिक्रमा करें।अब आसन उठाकर उस स्थान को प्रणाम करें।इन चीज का करें दान, शनिदेव और सूर्यदेव की बरसेगी कृपामकर संक्रांति के दिन तिल के दान को बेहद शुभ माना जाता है, इसलिए इसे तिल संक्रांति भी कहा जाता है। इस दिन काले तिल के दान से जीवन की सभी समस्याओं का निवारण होता है।इस दिन खिचड़ी के दान से भी पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन चावल और काली उड़द की दाल से बनी खिचड़ी दान करनी चाहिए। काले उड़द से शनिदेव प्रसन्न होते हैं और सभी दोषों से छुटकारा मिलता है।मकर संक्रांति के दिन गुड़ के दान का भी विशेष महत्व है। गुड़ से बनी चीजें खाने और दान करने से विशेष लाभ की प्राप्ति होती है। इसके दान से शनि, गुरु और सूर्य तीनों की कृपा प्राप्त होती है।रोगों से छुटकारा पाने के लिए इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को गर्म कपड़े और कंबल का दान जरूर करें। इस दिन देसी घी का दान करना बेहद लाभकारी माना जाता है। इससे आपके मान-सम्मान में बढ़ोतरी होती है। देश के विभिन्न राज्यों में कैसे मनाते हैं मकर संक्रांति मकर संक्रांति के त्योहार को नई ऋतु और नई फसल के आगमन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार सहित तमिलनाडु में नई फसल की कटाई की जाती है। अलग- अलग राज्यों में मकर संक्रांति के पर्व को भिन्न-भिन्न रूपों में मनाते हैं। लोहड़ी: मकर संक्रांति के एक दिन पहले उत्तर भारत में लोहड़ी का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। लोहड़ी के दिन दोस्तों और रिश्तेदारों को बधाइयां और मिठाई भेजी जाती हैं। इस त्योहार को मनाने के लिए खुली जगह पर अग्नि जलाई जाती है और लोक नृत्य करते हुए गाना-बजाना किया जाता है। फिर पवित्र अग्नि में मूंगफली, गजक, तिल आदि डालकर परिक्रमा की जाती है।पोंगल: पोंगल दक्षिण भारत के लोगों का प्रमुख पर्व है। यह मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से किसानों का होता है। इसे तीन दिनों तक मनाया जाता है। इसमें सूर्य देव और इंद्र देव की पूजा की जाती है। पोंगल मनाते हुए सभी किसान अपनी अच्छी फसल के लिए ईश्वर का धन्यवाद करते हैं। उत्तरायण: उत्तरायण पर्व को विशेष रूप से गुजरात में मनाया जाता है। मकर संक्रांति के अवसर पर गुजरात में पतंग उड़ाने की परंपरा है। इस पर्व को लोग पतंग महोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। कई लोग उत्तरायण के दिन व्रत भी रखते हैं और घरों में तिल व मूंगफली दाने की चिक्की (पट्टी) बना कर रिश्तेदारों में बांटते हैं।बिहू: माघ माह की संक्रांति के पहले दिन से बिहू का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से फसल की कटाई का पर्व है, जो असम में प्रसिद्ध है। बिहू के अवसर पर घरों में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं। बिहू के दिन अलाव जलाकर तिल और नारियल से बने व्यंजनों से अग्नि देवता को भोग लगाया जाता हैइन राशियों पर होगी धनवर्षामिथुन राशिमकर संक्रांति के दिन यानी सूर्य का मकर में गोचर, मिथुन राशि के लोगों के लिए बेहद शुभ साबित हो सकता है। जो लोग शोध के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं, उनको सफलता मिल सकती है। वहीं स्वास्थ्य के लिहाज से भी यह समय फलदायी साबित हो सकता है। कोई पुरानी शारीरिक समस्या से छुटकारा मिल सकता है। निवेश में अच्छा रिटर्न मिलने की भी संभावना है।तुला राशि यह समय आर्थिक दृष्टि से आपके लिए फलदायी साबित हो सकता है। आपको भौतिक सुखों की प्राप्ति के योग बन रहे हैं। वहीं जो लोग रियल एस्टेट, प्रापर्टी डीलर का काम करते हैं, उनके लिए यह समय शानदार साबित होगा। इस दौरान आप वाहन या कोई और लग्जरी आइटम खरीद सकते हैं।मीन राशि आप लोगों के लिए सूर्य का गोचर अनुकूल साबित होगा। धन लाभ के योग बन रहे हैं। वहीं इस समय आपको भाग्य का साथ मिलता दिख रहा है। आपके रुके हुए काम पूरे हो सकते हैं। इस समय आपको व्यापार में रुका हुआ कोई पुराना पेमेंट मिल सकता है। अगर आप कहीं निवेश करना चाहते है तो यह अनुकूल समय है। इस समय आप बचत करने में भी कामयाब हो सकते हैं।कर्क राशिआप लोगों के लिए सूर्य देव का गोचर लाभप्रद साबित हो सकता है। इस राशि के जो लोग इंपोर्ट-एक्सपोर्ट से संबंधित काम करते हैं, वे इस दौरान अच्छा खासा मुनाफा कमा सकते हैं। वहीं जो लोग शादी की योजना बना रहे हैं उनके लिए भी विवाह के योग बनते नजर आ रहे हैं।
Subscribe to:
Posts (Atom)