Monday, July 22, 2024
सभी सनातन प्यारे बंधुओं को सादर प्रणाम 🙏🏻वेदों के शिव 🌺 वेदों में महामृत्युंजय मन्त्र -देवता : रुद्र ॥ ऋषि : वशिष्ठ ॥छंद : विराड् ब्राह्मी अनुष्टुप् ॥ स्वर : धैवत: ॥ मन्त्र : -ॐ त्रम्वकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥त्रम्वकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम् ।उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुत: ॥ - ( यजुर्वेद ३.६० , ऋग्वेद ७.५९.१२ { ऋग्वेद में इस मन्त्र का छन्द : अनुष्टुप् ॥ स्वर : गांधार } ऋग्वेद मैं यह मन्त्र निम्न प्रदत्त है : - त्रम्वकं यजामहे सुगधिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥अर्थ : - हम तीनों दृष्टियों ( आध्यात्मिक , आधिदैविक , आधिभौतिक ) से युक्त परमेश्वर रुद्र देव की उपासना करते है । ये रुद्रदेव जीवन मैं सुगन्धि एवं पुष्टि तथा संरक्षक सत्ता का प्रत्यक्ष बोध कराने वाले हैं । जिस प्रकार पका हुआ फल स्वयं ही डण्ठल से अलग होकर अमृत वन जाता है , उसी प्रकार हम भी मृत्यु के भय सै मुक्त हो ; किन्तु अमृतत्व से दूर न हो , साथ ही भववन्धन से मुक्त हो जाये परन्तु ; अविनाशी सुख सै नहीं ।।हिन्दू समाज में मान्यता है कि वेद में उसी शिव का वर्णन है जिसके नाम पर अनेक पौराणिक कथाओं का सृजन हुआ है। उन्हीं शिव की पूजा-उपासना वैदिक काल से आज तक चली आती है। किन्तु वेद के मर्मज्ञ इस विचार से सहमत नहीं हैं।उनके अनुसार वेद तथा उपनिषदों का शिव निराकार ब्रह्म है।पुराणों में वर्णित शिव जी परम योगी और परम ईश्वरभक्त थे। वे एक निराकार ईश्वर "ओ३म्" की उपासना करते थे। कैलाशपति शिव वीतरागी महान राजा थे। उनकी राजधानी कैलाश थी और तिब्बत का पठार और हिमालय के वे शासक थे। हरिद्वार से उनकी सीमा आरम्भ होती थी। वे राजा होकर भी अत्यंत वैरागी थे। उनकी पत्नी का नाम पार्वती था जो राजा दक्ष की कन्या थी। उनकी पत्नी ने भी गौरीकुंड, उत्तराखंड में रहकर तपस्या की थी। उनके पुत्रों का नाम गणपति और कार्तिकेय था। उनके राज्य में सब कोई सुखी था। उनका राज्य इतना लोकप्रिय हुआ कि उन्हें कालांतर में साक्षात् ईश्वर के नाम शिव से उनकी तुलना की जाने लगी।वेदों के शिव--हम प्रतिदिन अपनी सन्ध्या उपासना के अन्तर्गत नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च(यजु० १६/४१)के द्वारा परम पिता का स्मरण करते हैं।अर्थ- जो मनुष्य सुख को प्राप्त कराने हारे परमेश्वर और सुखप्राप्ति के हेतु विद्वान् का भी सत्कार कल्याण करने और सब प्राणियों को सुख पहुंचाने वाले का भी सत्कार मङ्गलकारी और अत्यन्त मङ्गलस्वरूप पुरुष का भी सत्कार करते हैं,वे कल्याण को प्राप्त होते हैं।इस मन्त्र में शंभव, मयोभव, शंकर, मयस्कर, शिव, शिवतर शब्द आये हैं जो एक ही परमात्मा के विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुए हैं।वेदों में ईश्वर को उनके गुणों और कर्मों के अनुसार बताया है--त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।-यजु० ३/६०विविध ज्ञान भण्डार, विद्यात्रयी के आगार, सुरक्षित आत्मबल के वर्धक परमात्मा का यजन करें। जिस प्रकार पक जाने पर खरबूजा अपने डण्ठल से स्वतः ही अलग हो जाता है वैसे ही हम इस मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो जायें, मोक्ष से न छूटें।या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी।तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि।।-यजु० १६/२हे मेघ वा सत्य उपदेश से सुख पहुंचाने वाले दुष्टों को भय और श्रेष्ठों के लिए सुखकारी शिक्षक विद्वन्! जो आप की घोर उपद्रव से रहित सत्य धर्मों को प्रकाशित करने हारी कल्याणकारिणी देह वा विस्तृत उपदेश रूप नीति है उस अत्यन्त सुख प्राप्त करने वाली देह वा विस्तृत उपदेश की नीति से हम लोगों को आप सब ओर से शीघ्र शिक्षा कीजिये।अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमो दैव्यो भिषक्।अहीँश्च सर्वाञ्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्योऽधराची: परा सुव।।-यजु० १६/५हे रुद्र रोगनाशक वैद्य! जो मुख्य विद्वानों में प्रसिद्ध सबसे उत्तम कक्षा के वैद्यकशास्त्र को पढ़ाने तथा निदान आदि को जान के रोगों को निवृत्त करनेवाले आप सब सर्प के तुल्य प्राणान्त करनेहारे रोगों को निश्चय से ओषधियों से हटाते हुए अधिक उपदेश करें सो आप जो सब नीच गति को पहुंचाने वाली रोगकारिणी ओषधि वा व्यभिचारिणी स्त्रियां हैं, उनको दूर कीजिये।या ते रुद्र शिवा तनू: शिवा विश्वाहा भेषजी।शिवा रुतस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे।।यजु० १६/४९हे राजा के वैद्य तू जो तेरी कल्याण करने वाली देह वा विस्तारयुक्त नीति देखने में प्रिय ओषधियों के तुल्य रोगनाशक और रोगी को सुखदायी पीड़ा हरने वाली है उससे जीने के लिए सब दिन हम को सुख कर।उपनिषदों में भी शिव की महिमा निम्न प्रकार से है-स ब्रह्मा स विष्णु: स रुद्रस्स: शिवस्सोऽक्षरस्स: परम: स्वराट्।स इन्द्रस्स: कालाग्निस्स चन्द्रमा:।।-कैवल्यो० १/८वह जगत् का निर्माता, पालनकर्ता, दण्ड देने वाला, कल्याण करने वाला, विनाश को न प्राप्त होने वाला, सर्वोपरि, शासक, ऐश्वर्यवान्, काल का भी काल, शान्ति और प्रकाश देने वाला है।प्रपंचोपशमं शान्तं शिवमद्वैतम् चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः।।७।।-माण्डूक्य०प्रपंच जाग्रतादि अवस्थायें जहां शान्त हो जाती हैं, शान्त आनन्दमय अतुलनीय चौथा तुरीयपाद मानते हैं वह आत्मा है और जानने के योग्य है।यहां शिव का अर्थ शान्त और आनन्दमय के रूप में देखा जा सकता है।सर्वाननशिरोग्रीव: सर्वभूतगुहाशय:।सर्वव्यापी स भगवान् तस्मात्सर्वगत: शिव:।।-श्वेता० ४/१४जो इस संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का कर्ता एक ही है, जो सब प्राणियों के हृदयाकाश में विराजमान है, जो सर्वव्यापक है, वही सुखस्वरूप भगवान् शिव सर्वगत अर्थात् सर्वत्र प्राप्त है।इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है-सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य सृष्टारमनेकरुपम्।विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति।।-श्वेता० ४/१४परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म है, हृदय के मध्य में विराजमान है, अखिल विश्व की रचना अनेक रूपों में करता है। वह अकेला अनन्त विश्व में सब ओर व्याप्त है। उसी कल्याणकारी परमेश्वर को जानने पर स्थाई रूप से मानव परम शान्ति को प्राप्त होता है।नचेशिता नैव च तस्य लिंङ्गम्।।-श्वेता० ६/१उस शिव का कोई नियन्ता नहीं और न उसका कोई लिंग वा निशान है।योगदर्शन में परमात्मा की प्रतीति इस प्रकार की गई है-क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:।। १/१/२४जो अविद्यादि क्लेश, कुशल, अकुशल, इष्ट, अनिष्ट और मिश्र फलदायक कर्मों की वासना से रहित है, वह सब जीवों से विशेष ईश्वर कहाता है।स एष पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात्।। १/१/२६वह ईश्वर प्राचीन गुरुओं का भी गुरु है। उसमें भूत भविष्यत् और वर्तमान काल का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है,क्योंकि वह अजर, अमर नित्य है।महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने भी अपने पुस्तक सत्यार्थप्रकाश में निराकार शिवादि नामों की व्याख्या इस प्रकार की है--(रुदिर् अश्रुविमोचने) इस धातु से 'णिच्' प्रत्यय होने से 'रुद्र' शब्द सिद्ध होता है।'यो रोदयत्यन्यायकारिणो जनान् स रुद्र:' जो दुष्ट कर्म करनेहारों को रुलाता है, इससे परमेश्वर का नाम 'रुद्र' है।यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति, यद्वाचा वदति तत् कर्मणा करोति यत् कर्मणा करोति तदभिसम्पद्यते।।यह यजुर्वेद के ब्राह्मण का वचन है।जीव जिस का मन से ध्यान करता उस को वाणी से बोलता, जिस को वाणी जे बोलता उस को कर्म से करता, जिस को कर्म से करता उसी को प्राप्त होता है। इस से क्या सिद्ध हुआ कि जो जीव जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है। जब दुष्ट कर्म करनेवाले जीव ईश्वर की न्यायरूपी व्यवस्था से दुःखरूप फल पाते, तब रोते हैं और इसी प्रकार ईश्वर उन को रुलाता है, इसलिए परमेश्वर का नाम 'रुद्र' है।(डुकृञ् करणे) 'शम्' पूर्वक इस धातु से 'शङ्कर' शब्द सिद्ध हुआ है। 'य: शङ्कल्याणं सुखं करोति स शङ्कर:' जो कल्याण अर्थात् सुख का करनेहारा है, इससे उस ईश्वर का नाम 'शङ्कर' है।'महत्' शब्द पूर्वक 'देव' शब्द से 'महादेव' शब्द सिद्ध होता है। 'यो महतां देव: स महादेव:' जो महान् देवों का देव अर्थात् विद्वानों का भी विद्वान्, सूर्यादि पदार्थों का प्रकाशक है, इस लिए उस परमात्मा का नाम 'महादेव' है।(शिवु कल्याणे) इस धातु से 'शिव' शब्द सिद्ध होता है। 'बहुलमेतन्निदर्शनम्।' इससे शिवु धातु माना जाता है, जो कल्याणस्वरूप और कल्याण करनेहारा है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम 'शिव' है।निष्कर्ष- उपरोक्त लेख द्वारा योगी शिव और निराकार शिव में अन्तर बतलाया है। ईश्वर के अनगिनत गुण होने के कारण अनगिनत नाम है। शिव भी इसी प्रकार से ईश्वर का एक नाम है। आईये निराकार शिव की स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना करे।ॐ नमः शिवायः 🙏🏻🙏🏻
।। श्रीहरिः ।।
दुर्गतिसे बचो
प्रश्न‒भूत-प्रेतोंको कीलित करनेवाले तान्त्रिक तो उनके कर्मोंका फल भुगतानेमें सहायक ही बनते हैं, तो फिर उनको पाप क्यों लगता है ?
उत्तर‒वे जिनको कीलित कर देते हैं, जमीनमें गाड़ देते हैं, उन भूत-प्रेतोंका तो यह कर्मफल-भोग है, पर उनको कीलित करनेवालोंका यह नया पाप-कर्म है, जिसका दण्ड उनको आगे मिलेगा । जैसे, कोई जानवरको मारता है तो जानवर अपनी मृत्यु आनेसे ही मरता है । उसकी मृत्यु आये बिना उसको कोई मार ही नहीं सकता । परन्तु उसको मारनेवाला नया पाप करता है; क्योंकि वह लोभ, कामना,स्वार्थ आदिको लेकर ही उसको मारता है । जब कामना आदिको लेकर किया हुआ शुभ कर्म भी बन्धनका कारण बन जाता है तो फिर जो कामना आदिको लेकर अशुभ कर्म करता है, वह तो पापसे बँधेगा ही ।
तात्पर्य है कि किसीको दुःख देना, तंग करना, मारना आदि मनुष्यका कर्तव्य नहीं है, प्रत्युत अकर्तव्य है । अकर्तव्यमें मनुष्य कामनाको लेकर ही प्रवृत्त होता है (३ । ३७) । अतः मनुष्यको कामना, स्वार्थ आदिका त्याग करके सबके हितके लिये ही उद्योग करते रहना चाहिये ।
प्रश्न‒जिन भूत-प्रेतोंको बोतलमें बंद कर दिया गया है, कीलित कर दिया गया है, वे कबतक वहाँ जकड़े रहते हैं ?
उत्तर‒मन्त्रोंकी शक्तिकी भी एक सीमा होती है, उम्र होती है । उम्र पूरी होनेपर जब मन्त्रोंकी शक्ति समाप्त हो जाती है अथवा प्रेतयोनिकी अवधि (उम्र) पूरी हो जाती है,तब वे भूत-प्रेत वहाँसे छूट जाते हैं । अगर उनकी उम्र बाकी रहनेपर भी कोई अनजानमें कील निकाल दे, जमीनको खोदते समय बोतल फूट जाय, पेड़के गिरनेसे बोतल फूट जाय तो वे भूत-प्रेत वहाँसे छूट जाते हैं और अपने स्वभावके अनुसार पुनः दूसरोंको दुःख देने लग जाते हैं ।
प्रश्न‒अगर कोई पेड़में गड़ी हुई कीलको निकाल दे,जमीनमें गड़ी हुई बोतलको फोड़ दे तो उसमें बन्द भूत-प्रेत उसको पकड़ेंगे तो नहीं ?
उत्तर‒वहाँसे छूटनेपर भूत-प्रेत उसको पकड़ सकते हैं; अतः हरेक आदमीको ऐसा काम नहीं करना चाहिये । जो भगवान् के परायण हैं, जिनको भगवान् का सहारा है,हनुमान् जी का सहारा है, वे अगर भूत-प्रेतोंको वहाँसे मुक्त कर दें तो भूत-प्रेत उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते, प्रत्युत उनके दर्शनसे उन भूत-प्रेतोंका उद्धार हो जाता है । सन्त-महापुरुषोंने बहुत-से भूत-प्रेतोंका उद्धार किया है ।
हरिहर
१. शब्दार्थ- समान्यतः विष्णु को हरि और शिव को हर कहते हैं। शिव का स्मरण ’हर हर महादेव’ से होता है। प्रायः युद्ध में अन्तिम आक्रमण के समय ’हर हर महादेव’ कहते हैं, जब मरने या मारने की स्थिति होती है। लोक भाषा में जगत् और विश्व का एक ही अर्थ है, पर पुराण की वैज्ञानिक भाषा में विष्णु को जगन्नाथ और शिव को विश्वनाथ कहते हैं। दोनों में कुछ एकत्व है जैसा स्कन्दोपनोषद् में कहा गया है-
शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे। शिवस्य हृदयं विष्णुः, विष्णोश्च हृदयं शिवः॥८॥
यथा शिवमयो विष्णुः, एवं विष्णुमयं शिवः। यथान्तरं न पश्यामि तथा मे स्वस्तिरायुषि॥९॥
भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है-
रुद्रो नारायणश्चैव सत्त्वमेकं द्विधा कृतम्। लोके चरति कौन्तेय व्यक्तिस्थं सर्वकर्मसु॥
(महाभारत, शान्ति पर्व, ३४१/२७)
भगवान् श्री राम ने भी सेतुबन्ध के बाद रामेश्वर शिवलिङ्ग की स्थापना कर्र कहा था-
शिवद्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहु मोहि न भावा॥७॥
शंकर विमुख भगति चह मोरी। सो नर नारकी मूढ़ मति थोरी॥८॥
(रामचरितमानस, लंका काण्ड, २/७-८)
सामान्यतः विष्णु क्रिया रूप और शिव ज्ञान रूप हैं।
हरिहर शब्द का अर्थ विष्णु और शिव का मिलन है। विष्णु के मोहिनी रूप से शिव को सन्तान हुई थी जिसकी केरल में अयप्पा के नाम से पूजा होती है।
२. गायत्री मन्त्र का खण्ड- एकमूर्तिस्त्रयो देवाः, ब्रह्मविष्णु महेश्वराः। त्रयाणामन्तरं नास्ति गुणभेदाः प्रकीर्तिताः॥
(स्कन्द पुराण ५ अवन्ती खण्ड, रेवा खण्ड १४६/११६, पद्म पुराण, २ भूमि खण्ड, ७१/२१)
गायत्री मन्त्र के ३ पाद ब्रह्म के ३ रूप वर्णन करते हैं-
प्रथम पाद स्रष्टा रूप ब्रह्मा- तत् सवितुर्वरेण्यम्।
द्वितीय पाद क्रिया रूप विष्णु-भर्गो देवस्य धीमहि।
तृतीय पाद ज्ञान रूप शिव-धियो यो नः प्रचोदयात्।
३. हरि, हर-(१) अर्थ-कोष में व्याकरण के अनुसार दोनों शब्दों की एक ही व्युत्पत्ति दी गयी है-जो पापों का हरण करे। अन्तर देखने के लिए वैदिक परिभाषा देखनी पड़ेगी। वेद में प्राण या उसके प्रकाश रूप को हरि कहा है।
प्राणो वै हरिः, स हि हरति (कौषीतकि ब्राह्मण, १७/१)
यहां हरण अर्थ में भी हरि का प्रयोग है।
ऊर्जा का एक रूप किरण है; इस अर्थ में हरि का प्रयोग है-
इन्द्रो मायाभिः पुरु-रूप ईयते, युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश (ऋक्, ६/४७/१८)
= इन्द्र बिना रूप का प्रकाश रूप तेज है, वह माया (आवरण) द्वारा अनेक प्रकार के पुरु रूप में चलता है। पुर का अर्थ रचना है, पुरु उसका क्रिया रूप है। हरयः शतादश = सहस्र किरण।
वेद में शिव के लिए प्रायः रुद्र शब्द है। उसके शान्त रूप को शिव कहा है।
घोरो वै रुद्रः (कौषीतकि ब्राह्मण, १६/७)
या ते रुद्र शिवा तनूः अघोरा पापकाशिनी॥ (वाज.यजु, १६/२, ४९, श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/५ आदि)
शिव इति शमयन्ति एव एनं (अग्निम्), एतद् अहिंसायै, तथो हैष (अग्निः) इमान् लोकान् शान्तो न हिनस्ति (शतपथ ब्राह्मण, ६/७/३/१५)-वाज. यजु (१२/१७) में शिव का अर्थ।
सूर्य से किरण या कण निकलना उसका रुदन है।
(२) सौर मण्डल के सन्दर्भ में-
सूर्य पिण्ड = अग्नि (पदार्थ पिण्ड)। किरणों का प्रसार = इन्द्र। उनकी ऊर्जा या प्राण = हरि। तेज का अनुभव = हर, रुद्र।
चन्द्र कक्षा तक का क्षेत्र = १०० सूर्य व्यास तक ताप क्षेत्र = रुद्र।
चन्द्र कक्षा केन्द्र में पृथ्वी से शिव क्षेत्र का आरम्भ। इस अर्थ में शिव के ललाट पर चन्द्र है।
शनि कक्षा तक शिवतर क्षेत्र = १००० सूर्य व्यास तक।
उसके बाहर शिवतम क्षेत्र सौर मण्डल सीमा तक।
सौर मण्डल के बाहर महः लोक में महादेव रूप, महिष सोम।
जनः लोक (ब्रह्माण्ड या गैलेक्सी) में सदाशिव रूप। उसके अप् में शब्द होने से अम्भ होता है, जन्म स्थान होने से अम्ब। ३ पृथिवी (पृथ्वी ग्रह, सौर मण्डळ का आकर्षण क्षेत्र, ब्रह्माण्ड) ३ अम्ब हैं। उसके साथ साम्ब-सदाशिव रूप है।
नमः शिवाय च शिवतराय च (वाजसनेयी सं. १६/४१, तैत्तिरीय सं. ४/५/८/१, मैत्रायणी सं. २/९/७)
यो वः शिवतमो रसः, तस्य भाजयतेह नः। (अघमर्षण मन्त्र, वाजसनेयी सं., ११/५१)
सदाशिवाय विद्महे, सहस्राक्षाय धीमहि तन्नो साम्बः प्रचोदयात्। (वनदुर्गा उपनिषद्, १४१)
आापो वा अम्बयः । (कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद्, १२/२)
अयं वै लोकोऽम्भांसि (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/८/१८/१)
शत योजने ह वा एष (आदित्य) इतस्तपति (कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद्, ८/३)
स एष (आदित्यः) एक शतविधस्तस्य रश्मयः । शतविधा एष एवैक शततमो य एष तपति (शतपथ ब्राह्मण, १०/२/४/३)
युक्ता ह्यस्य (इन्द्रस्य) हरयः शतादशेति । सहस्रं हैत आदित्यस्य रश्मयः (इन्द्रः=आदित्यः) जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण, १/४४/५)
असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमङ्गलः । ये चैनं रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रोऽवैषां हेड ईमहे ॥ (वा.यजु.१६/६)
महत् तत् सोमो महिषः चकार (ऋक्, ९/९७/४१, सामवेद, १/५४२, २/६०५)
ब्रह्माण्ड के बाहर अनन्त आकाश में परमेश्वर रूप जिसके सङ्कल्प से सृष्टि का आरम्भ।
सूर्य अपने आकर्षण से पृथ्वी आदि ग्रहों को कक्षा में बान्ध कर रखता है। यह सुप्त रूप विष्णु है। उसकी किरण ऊर्जा हरि से पृथ्वी पर जीवन चल रहा है, यह जगन्नाथ या जाग्रत रूप है।
(३) पृथ्वी पर-वेद संहिता संकलन के लिए स्वायम्भुव मनु से कृष्ण द्वैपायन तक २८ व्यास हुए हैं। उनको ज्ञान रूप शिव का अवतार कहा गया है (कूर्म पुराण, अध्याय, १/५२, शिव पुराण, अध्याय, ३/४-५)। असुरों को पराजित कर धर्म स्थापना करने वालों को विष्णु का अवतार कहा गया है। (गीता, ४/७)।
(४) मनुष्य शरीर-शरीर का आवरण रूप लिङ्ग है (लिङ्ग शरीर)-
सूक्ष्मशरीराणि सप्तदशावयवानि लिङ्गशरीराणि । अवय वास्तु ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं बुद्धिमनसी कर्मेन्द्रियपञ्चकं चायुपञ्चकं चेति । ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणाख्यानि। (वेदान्त सार, खण्ड १३)।
इसमें ११ इन्द्रियां रुद्र हैं (५ कर्मेन्द्रिय, ५ ज्ञानेन्द्रिय, उभयात्मक मन)। इनमें मन को शिव कहा गया है। इनके रूप १० प्राण और आत्मा हैं।
कतमे रूद्रा इति, दशेमे पुरुषे प्राणा, आत्मा एकादशः, ते यद् यस्मात् मर्त्यात् शरीरात् उत्क्रामन्ति, अथ रोदयन्ति। तद् यद् रोदयन्ति, तस्मात् रुद्रा, इति। (माध्य. शतपथ ब्राह्मण, १/६/३/७, बृहदारण्यक उपनिषद्, ३/९/४)
दश पुरुषे प्राणा, इति ह उवाच। आत्मा एकादशः। ते यत् उत्क्रामन्तः यन्ति अथ रोदयन्ति। तस्मात् रुद्राः, इति। (जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण, २/७७)
४. शिव, विष्णु-विष्णु -वेवेष्टि इति विष्णुः-सर्वत्र व्याप्त है, अतः विष्णु।
शिव-शेरते अस्मिन् सर्वे, इति शिवः-सब कुछ इसी में है।
बाह्य आवरण शिव है, केन्द्र में क्रिया का सञ्चालक विष्णु है। विष्णु क्रिया रूप में यज्ञ है-विष्णुः वै यज्ञः (ऐतरेय ब्राह्मण, १/३३)
बाह्य आवरण लिङ्ग है। लीनं + गमयति = लिंग। ३ प्रकार के लिंग हैं-
मूल स्वरूप लिङ्गत्वान्मूलमन्त्र इति स्मृतः । सूक्ष्मत्वात्कारणत्वाच्च लयनाद् गमनादपि ।
लक्षणात्परमेशस्य लिङ्गमित्यभिधीयते ॥ (योगशिखोपनिषद्, २/९, १०)
(क) स्वयम्भू लिङ्ग-लीनं गमयति यस्मिन् मूल स्वरूपे। जिस मूल स्वरूप में वस्तु लीन होती है तथा उसी से पुनः उत्पन्न होती है, वह स्वयम्भू लिंग है। यह एक ही है।
(ख) बाण लिंग-लीनं गमयति यस्मिन् दिशायाम्-जिस दिशा में गति है वह बाण लिंग है। बाण चिह्न द्वारा गति की दिशा भी दिखाते हैं। ३ आयाम का आकाश है, अतः बाण लिंग ३ हैं।
(ग) इतर लिंग-लीनं गमयति यस्मिन् बाह्य स्वरूपे-जिस बाहरी रूप या आवरण में वस्तु है वह इतर (other) लिंग है। यह अनन्त प्रकार का है, पर १२ मास में सूर्य की १२ प्रकार की ज्योति के अनुसार १२ ज्योतिर्लिंग हैं।
भाषा भी लिङ्ग (Lingua, Language) है, जिससे हमारे आन्तरिक विचार दीखते हैं।
एषः प्रजापतिर्यद् हृदयमेतद् ब्रह्मैतत् सर्वम्। तदेतत् त्र्यक्षरं हृदयमिति हृ इत्येकमक्षरमभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद। द इत्येकमक्षरं ददन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद। यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोकं य एवं वेद॥ (शतपथ ब्राह्मण १४/८४/१, बृहदारण्यक उपनिषद् ५/३/१) = यह हृदय ही प्रजापति है, तथा ब्रह्म और सर्व है । इसमें ३ अक्षर हैं। एक हृ है जिसमें अपना और अन्य का आहरण होता है। एक ’द’ है जो अपना और अन्य का देता है । एक ’यम्’ है जिसे जानने से स्वर्ग लोक को जाता है।
५. ग्रन्थि भेद-मूलाधार और स्वाधिष्ठान में पृथिवी और जल की ब्रह्म ग्रन्थि है। मणिपूर के ऊपर अग्नि और सूर्यमण्डलों में विष्णु ग्रन्थि है। आज्ञाचक्र के नीचे वायु और आकाश में रुद्र ग्रन्थि है।
योगशिखोपनिषद्, अध्याय १-
प्रविशेच्चन्द्र तुण्डे तु सुषुम्नावदनान्तरे। वायुना वह्निना सार्धं ब्रह्मग्रन्थिं भिनत्ति सा॥८६॥
विष्णु ग्रन्थिं ततो भित्त्वा रुद्रग्रन्थौ च तिष्ठति। ततस्तु कुम्भकैर्गाढं पूरयित्वा पुनः पुनः॥८७॥
३ ग्रन्थियों के भेदन में सहायक ३ बन्ध हैं-मूल बन्ध (मूलाधार), उड्डीयान बन्ध (मणिपूर) और जालन्धर बन्ध (विशुद्धि)। योगशिखोपनिषद्, अध्याय १-
प्रथम् मूलबन्धस्तु द्वितीयोड्डीयानाभिधः। जालन्धरस्तृतीयस्तु लक्षणं कथयाम्यहम्॥१०३॥
कुर्यादनन्तरं बस्त्रीं कुण्डलीमाशु बोधयेत्। भिद्यन्ते ग्रन्थयो वंशे तप्तलोह शलाकया॥११३॥
चण्डी पाठ की साधन समर व्याख्या में उसके ३ चरित्रों को ३ ग्रन्थिभेद कहा गया है। विस्तार के लिये वहीं देखें।
मुण्डकोपनिषद् के भी ३ मुण्डक भी ३ ग्रन्थिभेद हैं-
(१/१/८)-तपसा चीयते ब्रह्म ततो ऽन्नमभिजायते। अन्नात् प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम्॥
(२/२/८)-भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
(३/२/९)-स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित् कुले भवति। तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहा-ग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति॥
६. हरिहर क्षेत्र- लोकभाषाओं के सन्धि क्षेत्रों के नाम हरिहर क्षेत्र हैं। उत्तर पूर्व में काशी में शिव-यज्ञ सम्बन्धी शब्द हैं, मिथिला में कृषि (अथर्व वेद के दर्भ सूक्त तथा कृषिसूक्त) तथा शक्ति के शब्द हैं। मगध में विष्णु (विष्णुपद क्षेत्र गया) के शब्द हैं। इन भाषाओं का सन्धि स्थल हरिहर क्षेत्र है। पश्चिम ओड़िशा का नरसिंह क्षेत्र या हरिशंकर तीर्थ ओड़िया, छत्तीसगढ़ी, तेलुगु का समन्वय है। कर्णाटक का हरिहर क्षेत्र ५ भाषाओं का केन्द्र है-केरल में हरिहर पुत्र अयप्पा (बाइबिल का इयापेन Eapen), महाराष्ट्र के गणेश, आन्ध्र का वराह, तमिलनाडु का सुब्रह्मण्य (कार्त्तिकेय), कर्णाटक का शारदा।
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शिव पञ्चाक्षर स्तोत्रम्
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै ‘न’काराय नमः शिवाय ॥१॥
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै ‘म’काराय नमः शिवाय ॥२॥
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै ‘शि’काराय नमः शिवाय ॥३॥
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै ‘व’काराय नमः शिवाय ॥४॥
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै ‘य’काराय नमः शिवाय ॥५॥
पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥६॥
भावार्थ: जिनके कंठ में साँपों का हार है,जिनके तीन नेत्र हैं, भस्म ही जिनका अंगराग(अनुलेपन) है;दिशाएँ ही जिनका वस्त्र है [अर्थात् जो नग्न हैं] , उन शुद्ध अविनाशी महेश्वर ‘न’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है || गंगाजल और चन्दन से जिनकी अर्चना हुई है, मंदार पुष्प तथा अन्यान्य कुसुमों से जिनकी सुन्दर पूजा हुई है, उन नंदी के अधिपति प्रथमगणों के स्वामी महेश्वर ‘म’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है || जो कल्याणस्वरूप हैं, पार्वती के मुखकमल को विकसित(प्रसन्न) करने के लिए जो सूर्यस्वरूप हैं,जो दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले हैं.जिनकी ध्वजा में बैल का चिन्ह है, उन शोभाशाली नीलकंठ ‘शि’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है || वसिष्ठ,अगस्त्य,और गौतम आदि श्रेष्ठ मुनियों ने तथा इन्द्रादि देवताओं ने जिनके मस्तक की पूजा की है, चन्द्रमा,सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं, उन ‘व’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है || जिन्होंने यक्षरूप धारण किया है, जो जटाधारी हैं, जिनके हाथ में पिनाक है. जो दिव्य सनातनपुरुष हैं,उन दिगंबर देव ‘य’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है || जो शिव के समीप इस शिवपञ्चाक्षर- स्तोत्र का पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है और वहाँ शिवजी के साथ आनंदित होता है ||
Monday, June 17, 2024
निर्जला एकादशी कथा महात्म्य -साल की सभी चौबीस एकादशियों में से निर्जला एकादशी सबसे अधिक महत्वपूर्ण एकादशी है। बिना पानी के व्रत को निर्जला व्रत कहते हैं और निर्जला एकादशी का उपवास किसी भी प्रकार के भोजन और पानी के बिना किया जाता है। उपवास के कठोर नियमों के कारण सभी एकादशी व्रतों में निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन होता है। निर्जला एकादशी व्रत को करते समय श्रद्धालु लोग भोजन ही नहीं बल्कि पानी भी ग्रहण नहीं करते हैं।जो श्रद्धालु साल की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं है उन्हें केवल निर्जला एकादशी उपवास करना चाहिए क्योंकि निर्जला एकादशी उपवास करने से दूसरी सभी एकादशियों का लाभ मिल जाता हैं।निर्जला एकादशी का व्रत अत्यन्त संयम साध्य है। इस युग में यह व्रत सम्पूर्ण सुख़ भोग और अन्त में मोक्ष कहा गया है।ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाता है। अंग्रेजी माह के अनुसार इस वर्ष 2024 में यह व्रत 18 जून को मंगलवार के दिन रखा जाएगा। निर्जला एकादशी व्रत कथा -युधिष्ठिर ने कहा: जनार्दन! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये।भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन्! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवती नन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं|तब वेदव्यासजी कहने लगे: कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है। द्वादशी के दिन स्नान करके पवित्र हो और फूलों से भगवान केशव की पूजा करे। फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे।यह सुनकर भीमसेन बोले: परम बुद्धिमान पितामह! मेरी उत्तम बात सुनिये। राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव, ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि भीमसेन एकादशी को तुम भी न खाया करो परन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी।भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा: यदि तुम नरक को दूषित समझते हो और तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और तो दोनों पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन नहीं करना।भीमसेन बोले महाबुद्धिमान पितामह! मैं आपके सामने सच कहता हूँ। मुझसे एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं किया जा सकता, तो फिर उपवास करके मैं कैसे रह सकता हूँ। मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है।...इसलिए महामुनि! मैं पूरे वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ। जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये। मैं उसका यथोचित रूप से पालन करुँगा।व्यासजी ने कहा: भीम! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो। केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है।एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है। तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करें। इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे।वर्षभर में जितनी एकादशियाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है।एकादशी व्रत करने वाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते। अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाव वाले, हाथ में सुदर्शन धारण करने वाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आख़िर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं।अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो। स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है। जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है। उसे एक-एक प्रहर में कोटि-कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है।मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है। निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है। इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है।जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे। जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं।कुन्तीनन्दन! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है।...पर्याप्त दक्षिणा और भाँति-भाँति के मिष्ठानों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए। ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं। जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस निर्जला एकादशी का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है।...निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए। जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है। चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है।...पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि मैं भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा। द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे।संसारसागर से तारने वाले हे देव ह्रषीकेश! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये।भीमसेन! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए। उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है।तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है। यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया। तबसे यह लोक में पाण्डव द्वादशी के नाम से विख्यात हुई। निर्जला एकादशी शुभ मुहूर्त :-एकादशी तिथि का प्रारम्भ 17 जून 2024 को सुबह के 04 बजकर 43 मिनट पर पर होगाऔरइसका समापन 18 जून को सुबह 06 बजकर 24 मिनट पर होगा।इसका पारण समय 19 जून को सुबह 05:24 से 07:28 तक रहेगा। निर्जल एकादशी की 10 प्रमुख बातें :- 1. ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी के अलावा भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। भीमसेनी एकादशी और कुछ अंचलों में पांडव एकादशी पड़ा। कुछ ग्रंथों में माघ शुक्ल एकादशी व कार्तिक शुक्ल एकादशी को भी भीमसेनी एकादशी का नाम दिया गया है, परंतु ज्यादातर विद्वान निर्जला एकादशी को ही भीमसेनी एकादशी के रूप में स्वीकार करते हैं। 2. शास्त्रों में उल्लेखों के अनुसार मान्यता है कि पांडव पुत्र भीम के लिए कोई भी व्रत करना कठिन था, क्योंकि उनकी उदराग्नि कुछ ज्यादा प्रज्वलित थी और भूखे रहना उनके लिए संभव न था। मन से वे भी एकादशी व्रत करना चाहते थे। इस संबंध में भीम ने वेद व्यास व भीष्म पितामह से मार्गदर्शन लिया। दोनों ने ही भीम को आश्वस्त किया कि यदि वे वर्ष में सिर्फ निर्जला एकादशी का व्रत ही कर लें तो उन्हें सभी चौबीस एकादशियों (यदि अधिक मास हो तो छब्बीस) का फल मिलेगा। इसके पश्चात भीम ने सदैव निर्जला एकादशी का व्रत किया। 3. पद्मपुराण में निर्जला एकादशी व्रत द्वारा मनोरथ सिद्ध होने की बात कही गई है। 4. निर्जला का अर्थ निराहार और निर्जल रहकर व्रत करना है। इस दिन व्रती को अन्न तो क्या, जलग्रहण करना भी वर्जित है। यानी यह व्रत निर्जला और निराहार ही होता है। शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि संध्योपासना के लिए आचमन में जो जल लिया जाता है, उसे ग्रहण करने की अनुमति है। 5. निर्जला एकादशी व्रत पौराणिक युगीन ऋषि-मुनियों द्वारा पंचतत्व के एक प्रमुख तत्व जल की महत्ता को निर्धारित करता है। पंचत्वों की साधना को योग दर्शन में गंभीरता से बताया गया है। अतः साधक जब पांचों तत्वों को अपने अनुकूल कर लेता है तो उसे न तो शारीरिक कष्ट होते हैं और न ही मानसिक पीड़ा। 6. इस एकादशी के व्रत को विधिपूर्वक करने से सभी एकादशियों के व्रत का फल मिलता है। 7. सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही नहीं अपितु दूसरे दिन द्वादशी प्रारंभ होने के बाद ही व्रत का पारायण किया जाता है। अतः पूरे एक दिन एक रात तक बिना पानी के रहना ही इस व्रत की खासियत है और वह भी इतनी भीषण गर्मी में। 8. निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। निर्जला एकादशी को जल एवं गौ दान करना सौभाग्य की बात मानते थे। इसीलिए आज भी जो लोग गौ दान नहीं कर पाते हैं वे इस समय जलपान जरूर कराते हैं। ज्येष्ठ माह वैसे भी तपता है तो भी जगह प्याऊ लगान और लोगों को पानी पिलाना पुण्य का कार्य है। इस दिन जल में वास करने वाले भगवान श्रीमन्नारायण विष्णु की पूजा के उपरांत दान-पुण्य के कार्य कर समाज सेवा की जाती रही। इसके अलावा लोग ग्रीष्म ऋतु में पैदा होने वाले फल, सब्जियां, पानी की सुराही, हाथ का पंखा आदि का दान करते हैं। 9. इस दिन प्रात:काल उठकर स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें। पूजाघर में धूप दीप जलाएं। इसके बाद भगवान विष्णु का गंगाजल से अभिषेक करें और उन्हें पुष्प एवं तुलसी के पत्ते अर्पित करने के बाद व्रत का संकल्प लें। संकल्प के बाद उनकी और माता लक्ष्मी की आरती करके उन्हें भोग लगाएं। पूजा एवं आरती के बाद जब तक व्रत चलता है तब तक भगवान विष्णु का भजन और ध्यान करें। 10. अपनी सामर्थ के अनुसार अन्न, वस्त्र, जल, जूता, छाता, फल आदि का दान करें। यह नहीं कर सकते हैं तो कम से कम इस दिन जल कलश में जल भरकर उसे सफेद वस्त्र से ढंककर चीनी और दक्षिणा के साथ किसी ब्राह्मण को दान जरूर करें जिससे साल भर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है।।। आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो ।। 🙏 धन्यवाद 🙏
Friday, March 8, 2024
महाशिवरात्रि के परम पावन पर्व पर
आप सभी को हमारी एडमिन टीम की ओर से
बहुत बहुत हार्दिक शुभ कामनाएं !
भगवान् शंकर सभी पर अपनी महती कृपा बनाए रखे !!
रुद्राष्टकम्
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरुपं।।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।।1।।
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।।
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं।।2।।
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा।।3।।
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।।
मृगाधीशचरमाम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।4।।
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।।5।।
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।।
चिदानंद संदोह मोहापहारी। प्रसीद पसीद प्रभो मन्मथारी।।6।।
न यावद् उमानाथ पादारविन्द। भजंतीह लोके परे वा नराणां।।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।7।।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं।।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।।8।।
श्लोक:- रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।।
Monday, March 4, 2024
((( हनुमान चालीसा में छिपे मैनेजमेंट के सूत्र)))
कई लोगों की दिनचर्या हनुमान चालीसा पढ़ने से शुरू होती है।
पर क्या आप जानते हैं कि श्री हनुमान चालीसा में 40 चौपाइयाँ हैं,
ये उस क्रम में लिखी गई हैं जो एक आम आदमी की जिंदगी का क्रम होता है।
माना जाता है तुलसीदास ने चालीसा की रचना मानस से पूर्व किया था।
हनुमान को गुरु बनाकर उन्होंने राम को पाने की शुरुआत की।
अगर आप सिर्फ हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं तो यह आपको भीतरी शक्ति तो दे रही है लेकिन अगर आप इसके अर्थ में छिपे जिंदगी के सूत्र समझ लें तो आपको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकते हैं।
हनुमान चालीसा सनातन परंपरा में लिखी गई पहली चालीसा है शेष सभी चालीसाऐं इसके बाद ही लिखी गई।
हनुमान चालीसा की शुरुआत से अंत तक सफलता के कई सूत्र हैं।
आइए जानते हैं हनुमान चालीसा से आप अपने जीवन में क्या-क्या बदलाव ला सकते हैं….
शुरुआत गुरु से…
हनुमान चालीसा की शुरुआत गुरु से हुई है…
श्रीगुरु चरन सरोज रज,
निज मनु मुकुरु सुधारि।
अर्थ - अपने गुरु के चरणों की धूल से अपने मन के दर्पण को साफ करता हूँ।
गुरु का महत्व चालीसा की पहले दोहे की पहली लाइन में लिखा गया है।
जीवन में गुरु नहीं है तो आपको कोई आगे नहीं बढ़ा सकता।
गुरु ही आपको सही रास्ता दिखा सकते हैं।
इसलिए तुलसीदास ने लिखा है कि गुरु के चरणों की धूल से मन के दर्पण को साफ करता हूँ।
आज के दौर में गुरु हमारा मेंटोर भी हो सकता है, बॉस भी।
माता-पिता को पहला गुरु ही कहा गया है।
समझने वाली बात ये है कि गुरु यानी अपने से बड़ों का सम्मान करना जरूरी है।
अगर तरक्की की राह पर आगे बढ़ना है तो विनम्रता के साथ बड़ों का सम्मान करें।
ड्रेसअप का रखें ख्याल…
चालीसा की चौपाई है
कंचन बरन बिराज सुबेसा,
कानन कुंडल कुंचित केसा।
अर्थ - आपके शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है, सुवेष यानी अच्छे वस्त्र पहने हैं, कानों में कुंडल हैं और बाल संवरे हुए हैं।
आज के दौर में आपकी तरक्की इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप रहते और दिखते कैसे हैं।
फर्स्ट इंप्रेशन अच्छा होना चाहिए।
अगर आप बहुत गुणवान भी हैं लेकिन अच्छे से नहीं रहते हैं तो ये बात आपके करियर को प्रभावित कर सकती है।
इसलिए, रहन-सहन और ड्रेसअप हमेशा अच्छा रखें।
आगे पढ़ें - हनुमान चालीसा में छिपे मैनेजमेंट के सूत्र...
सिर्फ डिग्री काम नहीं आती
बिद्यावान गुनी अति चातुर,
राम काज करिबे को आतुर।
अर्थ - आप विद्यावान हैं, गुणों की खान हैं, चतुर भी हैं।
राम के काम करने के लिए सदैव आतुर रहते हैं।
आज के दौर में एक अच्छी डिग्री होना बहुत जरूरी है।
लेकिन चालीसा कहती है सिर्फ डिग्री होने से आप सफल नहीं होंगे।
विद्या हासिल करने के साथ आपको अपने गुणों को भी बढ़ाना पड़ेगा, बुद्धि में चतुराई भी लानी होगी। हनुमान में तीनों गुण हैं, वे सूर्य के शिष्य हैं, गुणी भी हैं और चतुर भी।
अच्छा लिसनर बनें
प्रभु चरित सुनिबे को रसिया,
राम लखन सीता मन बसिया।
अर्थ -आप राम चरित यानी राम की कथा सुनने में रसिक है, राम, लक्ष्मण और सीता तीनों ही आपके मन में वास करते हैं।
जो आपकी प्रायोरिटी है, जो आपका काम है, उसे लेकर सिर्फ बोलने में नहीं, सुनने में भी आपको रस आना चाहिए।
अच्छा श्रोता होना बहुत जरूरी है।
अगर आपके पास सुनने की कला नहीं है तो आप कभी अच्छे लीडर नहीं बन सकते।
कहाँ, कैसे व्यवहार करना है ये ज्ञान जरूरी है
सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा।
अर्थ - आपने अशोक वाटिका में सीता को अपने छोटे रुप में दर्शन दिए।
और लंका जलाते समय आपने बड़ा स्वरुप धारण किया।
कब, कहाँ, किस परिस्थिति में खुद का व्यवहार कैसा रखना है, ये कला हनुमानजी से सीखी जा सकती है।
सीता से जब अशोक वाटिका में मिले तो उनके सामने छोटे वानर के आकार में मिले, वहीं जब लंका जलाई तो पर्वताकार रुप धर लिया।
अक्सर लोग ये ही तय नहीं कर पाते हैं कि उन्हें कब किसके सामने कैसा दिखना है।
अच्छे सलाहकार बनें
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेश्वर भए सब जग जाना।
अर्थ - विभीषण ने आपकी सलाह मानी, वे लंका के राजा बने ये सारी दुनिया जानती है।
हनुमान सीता की खोज में लंका गए तो वहां विभीषण से मिले।
विभीषण को राम भक्त के रुप में देख कर उन्हें राम से मिलने की सलाह दे दी।
विभीषण ने भी उस सलाह को माना और रावण के मरने के बाद वे राम द्वारा लंका के राजा बनाए गए।
किसको, क्हाँ, क्या सलाह देनी चाहिए, इसकी समझ बहुत आवश्यक है।
सही समय पर सही इंसान को दी गई सलाह सिर्फ उसका ही फायदा नहीं करती, आपको भी कहीं ना कहीं फायदा पहुँचाती है।
आत्मविश्वास की कमी ना हो
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही, जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।
अर्थ - राम नाम की अंगुठी अपने मुख में रखकर आपने समुद्र को लाँघ लिया, इसमें कोई अचरज नहीं है।
अगर आपमें खुद पर और अपने परमात्मा पर पूरा भरोसा है तो आप कोई भी मुश्किल से मुश्किल टॉस्क को आसानी से पूरा कर सकते हैं।
आज के युवाओं में एक कमी ये भी है कि उनका भरोसा बहुत टूट जाता है। आत्मविश्वास की कमी भी बहुत है। प्रतिस्पर्धा के दौर में आत्मविश्वास की कमी होना खतरनाक है।
अपने-आप पर पूरा भरोसा रखे।
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