Saturday, December 24, 2022

जन्म-कुंडली में उच्च सफलता के योग -

जन्म-कुंडली में दशम स्थान
जन्म-कुंडली में दशम स्थानको (दसवां स्थान) को तथा छठे भाव को जॉब आदि के लिए जाना जाता है। सरकारी नौकरी के योग को देखने के लिए इसी घर का आकलन किया जाता है। दशम स्थान में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति की दृष्टि पड़ रही होती है साथ ही उनका सम्बन्ध छठे भाव से हो तो सरकारी नौकरी का प्रबल योग बन जाता है। कभी-कभी यह भी देखने में आता है कि जातक की कुंडली में दशम में तो यह ग्रह होते हैं लेकिन फिर भी जातक को संघर्ष करना पड़ रहा होता है तो ऐसे में अगर सूर्य, मंगल या ब्रहस्पति पर किसी पाप ग्रह (अशुभ ग्रह) की दृष्टि पड़ रही होती है तब जातक को सरकारी नौकरी प्राप्ति में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। अतः यह जरूरी है कि आपके यह ग्रह पाप ग्रहों से बचे हुए रहें।

2. जन्म कुंडली में जातक का लग्न
जन्म कुंडली में यदि जातक का लग्न मेष, मिथुन, सिंह, वृश्चिक, वृष या तुला है तो ऐसे में शनि ग्रह और गुरु (वृहस्पति) का एक-दूसरे से केंद्र या त्रिकोण में होना, सरकारी नौकरी के लिए अच्छा योग उत्पन्न करते हैं।

3. जन्म कुंडली में यदि केंद्र में अगर चन्द्रमा, ब्रहस्पति एक साथ होते हैं तो उस स्थिति में भी सरकारी नौकरी के लिए अच्छे योग बन जाते हैं। साथ ही साथ इसी तरह चन्द्रमा और मंगल भी अगर केन्द्रस्थ हैं तो सरकारी नौकरी की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

4. कुंडली में दसवें घर के बलवान होने से तथा इस घर पर एक या एक से अधिक शुभ ग्रहों का प्रभाव होने से जातक को अपने करियर क्षेत्र में बड़ी सफलताएं मिलतीं हैं तथा इस घर पर एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने से कुंडली धारक को आम तौर पर अपने करियर क्षेत्र में अधिक सफलता नहीं मिल पाती है।

5. ज्योतिष शास्त्र में सूर्य तथा चंद्र को राजा या प्रशासन से सम्बंध रखने वाले ग्रह के रूप में जाना जाता है। सूर्य या चंद्र का लग्न, धन, चतुर्थ तथा कर्म से सम्बंध या इनके मालिक के साथ सम्बंध सरकारी नौकरी की स्थिति दर्शाता है। सूर्य का प्रभाव चंद्र की अपेक्षा अधिक होता है।

6. लग्न पर बैठे किसी ग्रह का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाला माना जाता है। लग्न पर यदि सूर्य या चंद्र स्थित हो तो व्यक्ति शाषण से जुडता है और अत्यधिक नाम कमाने वाला होता है।

7. चंद्र का दशम भाव पर दृष्टी या दशमेश के साथ युति सरकारी क्षेत्र में सफलता दर्शाता है। यधपि चंद्र चंचल तथा अस्थिर ग्रह है जिस कारण जातक को नौकरी मिलने में थोडी परेशानी आती है। ऐसे जातक नौकरी मिलने के बाद स्थान परिवर्तन या बदलाव के दौर से बार बार गुजरते है।

8. सूर्य धन स्थान पर स्थित हो तथा दशमेश को देखे तो व्यक्ति को सरकारी क्षेत्र में नौकरी मिलने के योग बनते है। ऐसे जातक खुफिया ऐजेंसी या गुप चुप तरीके से कार्य करने वाले होते है।

9. सूर्य तथा चंद्र की स्थिति दशमांश कुंडली के लग्न या दशम स्थान पर होने से व्यक्ति राज कार्यो में व्यस्त रहता है ऐसे जातको को बडा औहदा प्राप्त होता है।

10. यदि ग्रह अत्यधिक बली हो तब भी वें अपने क्षेत्र से सम्बन्धित सरकारी नौकरी दे सकते है। मंगल सैनिक, या उच्च अधिकारी, बुध बैंक या इंश्योरेंस, गुरु- शिक्षा सम्बंधी, शुक्र फाइनेंश सम्बंधी तो शनि अनेक विभागो में जोडने वाला प्रभाव रखता है।

11. सूर्य चंद्र का चतुर्थ प्रभाव जातक को सरकारी क्षेत्र में नौकरी प्रदान करता है। इस स्थान पर बैठे ग्रह सप्तम दृष्टि से कर्म स्थान को देखते है।

12. सूर्य यदि दशम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति को सरकारी कार्यो से अवश्य लाभ मिलता है। दशम स्थान कार्य का स्थान हैं। इस स्थान पर सूर्य का स्थित होना व्यक्ति को सरकारी क्षेत्रो में अवश्य लेकर जाता है। सूर्य दशम स्थान का कारक होता है जिस कारण इस भाव के फल मिलने के प्रबल संकेत मिलते है।

13. यदि किसी जातक की कुंडली में दशम भाव में मकर राशि में मंगल हो या मंगल अपनी राशि में बलवान होकर प्रथम, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम या दशम में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।

14. यदि मंगल स्वराशि का हो या मित्र राशि का हो तथा दशम में स्थित हो या मंगल और दशमेश की युति हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।

15. चंद्र केंद्र या त्रिकोण में बली हो तो सरकारी नौकरी का योग बनाता है ।

16. यदि सूर्य बलवान होकर दशम में स्थित हो या सूर्य की दृष्टि दशम पर हो तो जातक सरकारी नौकरी में जाता है ।

17. यदि किसी जातक की कुंडली में लग्न में गुरु या चौथे भाव में गुरु हो या दशमेश ग्यारहवे भाव में स्थित हो तो सरकारी नौकरी का योग बनता है ।

18. यदि जातक की कुंडली में दशम भाव पर सूर्य, मंगल या गुरु की दृष्टि पड़े तो यह सरकारी नौकरी का योग बनता है ।

19. यदि १० भाव में मंगल हो, या १० भाव पर मंगल की दृष्टी हो,

20. यदि मंगल ८ वे भाव के अतिरिक्त कही पर भी उच्च राशी मकर (१०) का होतो।

21. मंगल केंद्र १, ४, ७, १०, या त्रिकोण ५, ९ में हो तो.

22. यदि लग्न से १० वे भाव में सूर्य (मेष) , या गुरू (४) उच्च राशी का हो तो। अथवा स्व राशी या मित्र राशी के हो।

23. लग्नेश (१) भाव के स्वामी की लग्न पर दृष्टी हो।

24. लग्नेश (१) +दशमेश (१०) की युति हो।

25. दशमेश (१०) केंद्र १, ४, ७, १० या त्रिकोण ५, ९ वे भाव में हो तो। उपरोक्त योग होने पर जातक को सरकारी नौकरी मिलती है। जितने ज्यादा योग होगे , उतना बड़ा पद प्राप्त होगा।

26. भाव:कुंडली के पहले, दसवें तथा ग्यारहवें भाव और उनके स्वामी से सरकारी नौकरी के बारे मैं जान सकते हैं।

27.सूर्य. चंद्रमा व बृहस्पति सरकारी नौकरी मै उच्च पदाधिकारी बनाता है।

28. भाव :द्वितीय, षष्ठ एवं दशम्‌ भाव को अर्थ-त्रिकोण सूर्य की प्रधानता होने पर सरकारी नौकरी प्राप्त करता है।

29. नौकरी के कारक ग्रहों का संबंध सूर्य व चन्द्र से हो तो जातक सरकारी नौकरी पाता है।

30. दसवें भावमें शुभ ग्रह होना चाहिए।

31. दसवें भाव में सूर्य तथा मंगल एक साथ होना चाहिए।

32. पहले, नवें तथा दसवें घर में शुभ ग्रहों को होना चाहिए।

33. पंच महापुरूष योग: जीवन में सफलता एवं उसके कार्य क्षेत्र के निर्धारण में महत्वपूर्ण समझे जाते हैं।पंचमहापुरूष योग कुंडली में मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि अपनी स्वराशि अथवा उच्च राशि का होकर केंद्र में स्थित होने पर महापुरुष योग बनता

34. पाराशरी सिद्धांत के अनुसार, दसवें भाव के स्वामी की नवें भाव के स्वामी के साथ दृष्टि अथवा क्षेत्र और राशि स्थानांतर संबंध उसके लिए विशिष्ट राजयोग का निर्माण करते हैं।

कुंडली से जाने नौकरी प्राप्ति का समय नियम:

1. लग्न के स्वामी की दशा और अंतर्दशा में

2. नवमेश की दशा या अंतर्दशा में

3. षष्ठेश की दशा या, अंतर्दशा में

4. प्रथम,दूसरा , षष्ठम, नवम और दशम भावों में स्थित ग्रहों की दशा या अंतर्दशा में

5. दशमेश की दशा या अंतर्दशा में

6. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में

7. नौकरी मिलने के समय जिस ग्रह की दशा और अंतर्दशा चल रही है उसका संबंध किसी तरह दशम भाव या दशमेश से ।

8. द्वितीयेश और एकादशेश की दशा या अंतर्दशा में भी नौकरी मिल सकती है।

9. छठा भाव :छठा भाव नौकरी का एवं सेवा का है। छठे भाव का कारक भाव शनि है।

10. दशम भाव या दशमेश का संबंध छठे भाव से हो तो जातक नौकरी करता है।

11. राहु और केतु की दशा, या अंतर्दशा में :
जीवन की कोई भी शुभ या अशुभ घटना राहु और केतु की दशा या अंतर्दशा में हो सकती है।

12. गोचर: गुरु गोचर में दशम या दशमेश से केंद्र या त्रिकोण में ।
13. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि और गुरु एक-दूसरे से केंद्र, या त्रिकोण में हों तो नौकरी मिल सकती है

14. गोचर : नौकरी मिलने के समय शनि या गुरु का या दोनों का दशम भाव और दशमेश दोनों से या किसी एक से संबंध होता है।

15. कुंडली का पहला, दूसरा, चौथा, सातवा, नौवा, दसवा, ग्यारहवा घर तथा इन घरों के स्वामी अपनी दशा और अंतर्दशा में जातक को कामयाबी प्रदान करते है।

।। आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो ।।

               🙏 धन्यवाद 🙏

Tuesday, December 13, 2022

क्या आप जानते है #कलाई पर कलावा क्यों बांधा जाता है..!!अवश्य पढ़े..!!!

जब भी हम किसी मंदिर में जाते है या किसी भी शुभ कार्य में शामिल होते है तो तिलक किया जाता है और हाथों पर रक्षा सूत्र बांधते हैं फिर पूजा शुरू की जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं, ये रक्षा सूत्र क्यों बाधी जाती है। इसे रक्षा कवच के रूप में भी शरीर पर बांधा जाता है।

पुराणिक कथा के अनुसार बताया जाता है कि इंद्र जब वृत्रासुर से युद्ध करने जा रहे थे तब इंद्राणी शची ने इंद्र की दाहिनी भुजा पर रक्षा-कवच के रूप में कलावा बांध दिया था और इंद्र इस युद्ध में विजयी हुए। 

उसके बाद से ये रक्षा सूत्र बांधा जाता है। शास्त्रों का ऐसा मत है कि कलावा बांधने से त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति विष्णु की अनुकंपा से रक्षा बल मिलता है और शिव दुर्गुणों का विनाश करते हैं।

कलावा बांधते वक्त इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है-

येन बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः ।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे माचल माचल ।।

कहा जाता है कि हाथ में कलावा बांधने से मनुष्य बुरी दृष्टि से बचा रहता है क्योंकि भगवान उसकी रक्षा करते हैं और, इसीलिए हाथों में मौली धागा बांधने से मनुष्य के स्वास्थ्य में बरकत होती है।कलावा बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है। यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही है।कलावा को हाथ की कलाई, गले और कमर में बांधा जाता है। इसके अलावा मन्नत के लिए किसी देवी-देवता के स्थान पर भी बांधा जाता है और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो इसे खोल दिया जाता है। इसे घर में लाई गई नई वस्तु को भी बांधा जाता और इसे पशुओं को भी बांधा जाता है।

कलावा बांधने के नियम : शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है।

कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए।

 कलावा कहीं पर भी बांधें, एक बात का हमेशा ध्यान रहे कि इस सूत्र को केवल 3 बार ही लपेटना चाहिए व इसके बांधने में वैदिक विधि का प्रयोग करना चाहिए।

पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है।
हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें।

किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं।

किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं।

किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे।

इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है।

Monday, October 24, 2022

आपको और आपके पूरे परिवार को दीपावली के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

दीपावली के पावन पर्व पर महालक्ष्मीजी की विशेषकृपा प्राप्त करने के लिए अष्टलक्ष्मी पूजन, आराधना, मंत्र-जाप अवश्य करें।

अष्टलक्ष्मी -

अष्टलक्ष्मी की आराधना करने से मानव जीवन सफल हो जाता है। अष्ट लक्ष्मी आराधना का उद्देश जीवन में धन के अभाव को मिटा देना है। अष्टलक्ष्मी की पूजा से इंसान को धन की प्राप्ति होती है। अगर आप काफी समय से आर्थिक तंगी में है तो अपने काम के साथ साथ मां लक्ष्मी का इस तरह पूजन अवश्य करें । शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मी को चंचला कहा जाता है अर्थात जो कभी एक स्थान पर रूकती नहीं। अतः लक्ष्मी अर्थात धन को स्थायी बनाने के लिए कुछ पूजन, आराधना, मंत्र-जाप आदि का विधान शास्त्रों में दिया गया है।

महालक्ष्मी के आठ स्वरुप है। लक्ष्मी जी के ये आठ स्वरुप जीवन की आधारशिला है। इन आठों स्वरूपों में लक्ष्मी जी जीवन के आठ अलग-अलग वर्गों से जुड़ी हुई हैं। इन आठ लक्ष्मी की पूजन करने से मानव जीवन सफल हो जाता है। अष्ट लक्ष्मी और उनके मूल बीज मंत्र इस प्रकार है।

अष्टलक्ष्मी मंत्र -

1. श्री आदि लक्ष्मी - ये जीवन के प्रारंभ और आयु को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ श्रीं।।

2. श्री धान्य लक्ष्मी - ये जीवन में धन और धान्य को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ श्रीं क्लीं।।

3. श्री धैर्य लक्ष्मी - ये जीवन में आत्मबल और धैर्य को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं।।

4. श्री गज लक्ष्मी - ये जीवन में स्वास्थ और बल को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं।।

5. श्री संतान लक्ष्मी - ये जीवन में परिवार और संतान को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं।।

6. श्री विजय लक्ष्मी यां वीर लक्ष्मी - ये जीवन में जीत और वर्चस्व को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ क्लीं ॐ।।

7. श्री विद्या लक्ष्मी - ये जीवन में बुद्धि और ज्ञान को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ ऐं ॐ।।

8. श्री ऐश्वर्य लक्ष्मी - ये जीवन में प्रणय और भोग को संबोधित करती है तथा इनका मूल मंत्र है - ॐ श्रीं श्रीं।। 

अष्ट लक्ष्मी आराधना का उद्देश जीवन में धन के अभाव को मिटा देना है। इस साधना से भक्त कर्जे के चक्र्व्ह्यु से बहार आ जाता है। आयु में वृद्धि होती है। बुद्धि कुशाग्र होती है। परिवार में खुशाहाली आती है। समाज में सम्मान प्राप्त होता है। प्रणय और भोग का सुख मिलता है। व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा होता है और जीवन में वैभव आता है।

अष्ट लक्ष्मी पूजन विधि :-

दीपावली की शाम 06:53pm से 08:16pm / रात 11:40am  से 12:31am   ( ऊपर दिए गए समय में से किसी भी एक समय में अपनी सुविधा अनुसार पूजन कर सकते है ) के बीच गुलाबी कपड़े पहने और गुलाबी आसान का प्रयोग करें। गुलाबी कपड़े पर श्रीयंत्र और अष्ट लक्ष्मी का चित्र स्थापित करें। किसी भी थाली में गाय के घी के 8 दीपक जलाएं। गुलाब की अगरबत्ती जलाएं। लाल फूलो की माला चढ़ाएं। मावे की बर्फी का भोग लगाएं। अष्टगंध से श्रीयंत्र और अष्ट लक्ष्मी के चित्र पर तिलक करें और 11 कमलगट्टे हाथ में लेकर नीचे दिए गए सभी मंत्रो की एक-एक माला ( 108 बार ) जाप करें।

मंत्र. :-

ॐ श्रीं नमः।।

ॐ श्रीं क्लीं नमः।।

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं नमः।।

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं नमः।।

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नमः।।

ॐ क्लीं ॐ।।

ॐ ऐं ॐ।।

ॐ श्रीं श्रीं नमः।। 

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अष्टलक्ष्मीयै ह्रीं सिद्धये मम गृहे आगच्छागच्छ नमः स्वाहा।।

जाप पूरा होने के बाद आठों दीपक घर की आठ दिशाओं में लगा दें तथा कमलगट्टे घर की तिजोरी में स्थापित करें। इस उपाय से जीवन के आठों वर्गों में सफलता प्राप्त होगी।

।। आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो ।।

               🙏  धन्यवाद  🙏
*🔥 दीपावली  पूजा की सबसे सरल विधि, लक्ष्मी पूजा में रखें 10 बातों का ध्यान 🔥*

: दीपावली के अवसर पर जानिए दिवाली पूजा की सबसे सरल विधि और यह भी जानिए कि पूजन के समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
 
 
दिवाली की सबसे सरल पूजा विधि ( Diwali puja vidhi ) : 
 
1. ईशान कोण या उत्तर दीशा में साफ सफाई करके स्वास्तिक बनाएं। उसके उपर चावल की ढेरी रखें। अब उसके उपर लकड़ी का पाट बिछाएं। पाट के उपर लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर रखें। तस्वीर में गणेश और कुबेर की तस्वीर भी हो। माता के दाएं और बाएं सफेद हाथी के चित्र भी होना चाहिए।

2. पूजन के समय पंचदेव की स्थापना जरूर करें। सूर्यदेव, श्रीगणेश, दुर्गा, शिव और विष्णु को पंचदेव कहा गया है। इसके बाद धूप-दीप चलाएं। सभी मूर्ति और तस्वीरों को जल छिड़ककर पवित्र करें।
 
3. अब खुद कुश के आसन पर बैठकर माता लक्ष्मी की षोडशोपचार पूजा करें। अर्थात 16 क्रियाओं से पूजा करें। पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नेवैद्य, आचमन, ताम्बुल, स्तवपाठ, तर्पण और नमस्कार। पूजन के अंत में सांगता सिद्धि के लिए दक्षिणा भी चढ़ाना चाहिए।

 
4. माता लक्ष्मी सहित सभी के मस्तक पर हलदी कुंकू, चंदन और चावल लगाएं। फिर उन्हें हार और फूल चढ़ाएं। पूजन में अनामिका अंगुली (छोटी अंगुली के पास वाली यानी रिंग फिंगर) से गंध (चंदन, कुमकुम, अबीर, गुलाल, हल्दी आदि) लगाना चाहिए। इसी तरह उपरोक्त षोडशोपचार की सभी सामग्री से पूजा करें। पूजा करते वक्त उनके मंत्र का जाप करें।
 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।
 
ॐ महालक्ष्म्यै नमो नम: धनप्रदायै नमो नम:‍ विश्‍वजनन्यै नमो नम:।
 
5. पूजा करने के बाद प्रसाद या नैवेद्य (भोग) चढ़ाएं। ध्यान रखें कि नमक, मिर्च और तेल का प्रयोग नैवेद्य में नहीं किया जाता है। प्रत्येक पकवान पर तुलसी का एक पत्ता रखा जाता है। इस दिन लक्ष्मीजी को मखाना, सिंघाड़ा, बताशे, ईख, हलुआ, खीर, अनार, पान, सफेद और पीले रंग के मिष्ठान्न, केसर-भात आदि अर्पित किए जाते हैं। पूजन के दौरान 16 प्रकार की गुजिया, पपड़ियां, अनर्सा, लड्डू भी चढ़ाएं जाते हैं। आह्वान में पुलहरा चढ़ाया जाता है। इसके बाद चावल, बादाम, पिस्ता, छुआरा, हल्दी, सुपारी, गेंहूं, नारियल अर्पित करते हैं। केवड़े के फूल और आम्रबेल का भोग अर्पित करते हैं।  

Lakshmi Puja Vidhi
6. पूजा करने के बाद अंत में खड़े होकर उनकी आरती करके नैवेद्य चढ़ाकर पूजा का समापन किया जाता है। पूजा के बाद कपूर आरती जरूर करें। कर्पूर गौरम करुणा का श्लोक बोलें। आरती को सबसे पहले उसे अपने आराध्य के चरणों की तरफ चार बार, इसके बाद नाभि की तरफ दो बार और अंत में एक बार मुख की तरफ घुमाएं। ऐसा कुल सात बार करें। आरती करने के बाद उस पर से जल फेर दें और प्रसाद स्वरूप सभी लोगों पर छिड़कें।

8. मुख्‍य पूजा के बाद अब मुख्य द्वार या आंगन में दीये जलाएं। एक दीया यम के नाम का भी जलाएं। रात्रि में घर के सभी कोने में भी दीए जलाएं।
 
9. पूजा और आरती के बाद ही किसी से मिलने जाएं, मिठाई बांटे या पटाखें फोड़े।
 
10. घर में या मंदिर में जब भी कोई विशेष पूजा करें तो अपने इष्टदेव के साथ ही स्वस्तिक, कलश, नवग्रह देवता, पंच लोकपाल, षोडश मातृका, सप्त मातृका का पूजन भी किया जाता। लेकिन विस्तृत पूजा तो पंडित जी ही करते है अत: आप ऑनलाइन भी किसी पंडितजी की मदद से विशेष पूजा कर सकते हैं। विशेष पूजन पंडित जीकी मदद से ही करवाने चाहिए, ताकि पूजा विधिवत हो सके।
 
पूजा में रखें 10 बातों का ध्यान
 
1. दिवाली के पूजा रात्रि के विशेष मुहूर्त में की जाती है। मान्यता अनुसार चौघड़िया का महायोग और शुभ कारक लग्न देखकर रात्रि में लक्ष्मी पूजा का प्रचलन प्राचीनकाल से ही चला आ रहा है। लक्ष्मी कारक योग में पूजा करने से कर्ज से मुक्ति मिलती है तो दूसरी ओर अच्छी और शुद्ध भावना से लक्ष्मी की पूजा से धन और समृद्धि बढ़ती है।
 
2. इस दिन प्रात: उठकर नित्यकर्म से निवृ‍त्त होकर पूजा की तैयारी कर लें। पूजा के समय घर के सभी सदस्य एकत्रित होकर ही पूजा करें। पूजा जमीन पर ऊनी आसन पर बैठकर ही करनी चाहिए।

3. पूजा के दौरान किसी भी प्रकार शोर न करें और ना ही किसी अन्य प्रकार की गतिविधियों पर ध्यान दें। ईश्वर के लिए जलाए जाने वाले दीपक के नीचे चावल अवश्य रखने चाहिए। पूजा के दौरान कभी भी दीपक से दीपक नहीं जलाना चाहिए।

 
4. तांबे के पात्र में चंदन नहीं रखना चाहिए और न ही पतला चंदन देवी-देवताओं को लगाएं। 
 
5. पूजा के पूर्व घर आंगन को अच्‍छे से सजाएं। द्वार देहरी पर रंगोली और मांडने बनाएं। द्वार पर वंदनवार लगाएं, नियम से उचित संख्या में दीए लगाएं और मां लक्ष्मी के पदचिह्न मुख्य द्वार पर ऐसे लगाएं कि कदम बाहर से अंदर की ओर जाते हुए प्रतीत हों। 
 
6. घर के ईशान कोण में ही पूजा करें। पूजा के समय हमारा मुंह ईशान, पूर्व या उत्तर में होना चाहिए। लक्ष्मी पूजा के समय सात मुख वाला घी का दीपक जलाना चाहिए। इससे माता लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है।  

7. इस दिन किसी भी प्रकार का व्यसन करना या जुआ खेलना वर्जित है। मान्यता अनुसार इस दिन किसी के घर नहीं जाते। दिवाली मिलन का कार्य पड़वा के दिन किया जाता है।
 
8. आरती के बाद हमेशा दोनों हाथ से उसे ग्रहण करें। 
 
9. पूजा-पाठ बगैर आसन के नहीं करना चाहिए। 
 
10. पूजा के बाद अपने आसन के नीचे दो बूंद जल डालें और उसे माथे पर लगा तभी उठना चाहिए, अन्यथा आपकी पूजा का फल देवराज इंद्र को चला जाता है।

Wednesday, September 21, 2022

सर्व पितृ अमावस्या 25 सितंबर 2022 
भूले बिसरे पितरों का इस दिन कर सकते हैं श्राद्ध !

 आश्विन माह की अमावस्या तिथि को सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाती है. यह श्राद्धपक्ष का आखिरी दिन होता है. जिन पितरों की मृत्यु की तिथि याद नहीं रहती है, उनका श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या पर ही किया जाता है !

 इस दिन श्राद्ध के लिए बनाए गए भोजन से पंचबलि अर्थात गाय, कुत्ते, कौए, चीटियों और देवों के लिए भोजन का अंश निकालकर उन्हें देना चाहिए. फिर किसी ब्राह्मण को घर पर निमंत्रित करें और उनसे भोजन करने और आशीर्वाद देने की प्रार्थना करें. इस साल सर्वपितृ अमावस्या 25 सितंबर को मनाई जाएगी.

सर्वपितृ अमावस्या की तिथि !

पंचांग के अनुसार, आश्विन मास की अमावस्या तिथि रविवार, 25 सितंबर को दोपहर 03 बजकर 12 मिनट से प्रारंभ होगी और सोमवार, 26 सितंबर को दोपहर 03 बजकर 24 मिनट पर समाप्त होगी. ऐसे में सर्वपितृ अमावस्या 25 सितंबर को पूरे दिन मनाई जाएगी.

अमावस्या पर ऐसे दें पितरों को विदाई !

जो व्यक्ति पितृपक्ष के 15 दिनों तक तर्पण, श्राद्ध आदि नहीं कर पाते या जिन लोगों को अपने पितरों की मृत्यु तिथि याद न हो, उन सभी पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, दान आदि इसी अमावस्या को किया जाता है. सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों को शांति देने के लिए और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए गीता के सातवें अध्याय का पाठ करना उत्तम माना जाता है !

अमावस्या के श्राद्ध पर भोजन में खीर पूड़ी का होना आवश्यक है. भोजन कराने और श्राद्ध करने का समय दोपहर होना चाहिए. ब्राह्मण को भोजन कराने के पूर्व पंचबली दें और हवन करें. श्रद्धा पूर्वक ब्राह्मण को भोजन कराएं, उनका तिलक करके दक्षिणा देकर विदा करें. बाद में घर के सभी सदस्य एक साथ भोजन करें और पितरों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें !

सर्वपितृ अमावस्या पर करें ये उपाय !

सर्वपितृ अमावस्या के दिन पीपल की सेवा और पूजा करने से हमारे पितृ प्रसन्न रहते हैं. इस दिन स्टील के लोटे में दूध, पानी, काले तिल, शहद और जौ मिला लें. इसके साथ कोई भी सफेद मिठाई, एक नारियल, कुछ सिक्के और एक जनेऊ लेकर पीपल वृक्ष के नीचे जाकर सर्वप्रथम लोटे की समस्त सामग्री पीपल की जड़ में अर्पित कर दें !

 इस दौरान 'ॐ सर्व पितृ देवताभ्यो नमः' मंत्र का जाप भी लगातार करते रहें.

Friday, September 2, 2022

सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि कुंडली में पित्र दोष कैसे देखते हैं ? ज्यादातर लोगों को यह पता ही नहीं है ।  जिस कुंडली में पित्र दोष नहीं है उसे भी पितृदोष पितृदोष बोलकर लोगों के मन में भ्रम उत्पन्न कर देते हैं ।

हमारी जन्म कुंडली का निर्माण हमारे पूर्व जन्म के किए गए कर्म के अनुसार बनती है । आपने जिस घर में जन्म लिया है आपकी कुंडली में बनने वाले पितृदोष का उनसे कुछ भी लेना देना नहीं है । 

इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति अकेला आया है अकेला जाएगा और अपने कर्म का हिसाब किताब उसे अकेले ही भोगना पड़ता है । ना आपके कर्म का फल आपके परिवार भोगेंगे  ना अपने परिवार के कर्म का फल आप भोगेंगे ।

आप जिस घर में जन्म लिए हैं उस घर के पूर्वज या कोई भी बुजुर्ग व्यक्ति की मृत्यु हो गई या उसने कोई गलत कार्य किया उसके वजह से आपकी कुंडली में पित्र दोष कैसे बन जाएगा जबकि आपकी कुंडली तो आपके जन्म लेने के समय बनी थी और वास्तव में माना जाए तो जिसमें माँ  के गर्भ में बीज का रोपण होता है उसी समय असली कुंडली बन जाती है ।
फिर आप जिस घर में जन्म लिए उनके आपके कुंडली में बनने वाले पितृदोष का क्या लेना देना ?

आप अपने पूर्व जन्म में किए गए पाप और दोष को आप जिस घर  में जन्म लिया उसके पूर्वजों पर मढ़ देते हैं कि उनके कारण मुझे पितृदोष हुआ है । जबकि वास्तविकता यह है कि आपकी कुंडली में जो पितृदोष बना है वह आपके पूर्व जन्म में किए गए कर्म के अनुसार बना है ।  इसलिए आपको अपना उपाय स्वयं करना पड़ेगा ।

वास्तविकता यह है कि हम जो भी पिंड दान या श्राद्ध  वगैरा करते हैं इससे आपका कोई भी दोष खत्म होने वाला नहीं है । हम जिस घर में जन्म लिए हैं यदि हमारे माता-पिता दादा की मृत्यु हो जाती है मृत्यु के तुरंत बाद नया शरीर नही मिलता है ।  ( इसका  कारण यहाँ लिखा  तो बहुत लंबा लेख हो जाएगा )
 कुछ  समय तक व्यक्ति को प्रेत योनि में भटकना पड़ता है । उस वक्त  हम उन्हें नहीं देख सकते परंतु वह हमें देखते रहते हैं ।  यदि हम उनके लिए श्राद्ध  या पूजा करते हैं इससे उनके मन को शांति मिलती है । परंतु जैसे हीं उनको नया शरीर मिल जाता है उसके बाद यह सब कुछ समाप्त हो जाता है । आपके और आपके पूजा  या श्राद्ध  करने से कोई फायदा होने वाला नहीं है । और आपके श्राद्ध  करने से आपके पूर्वजों के पाप  दोष समाप्त नहीं हो जाएगा । जिसने जो पाप दोष किया है वह तो उसको भुगतना ही पड़ेगा कोई क्षमा नहीं है ।

अब हम कुंडली में पित्र दोष कैसे देखते हैं इसके बारे में चर्चा करते हैं ।
👉  मात्रा सूर्य के कहीं भी पीड़ित हो जाने से पित्र  दोष नहीं होता है ।
या सिर्फ दशम भाव के पीड़ित हो जाने से पित्र दोष नहीं बनता है ।

💢👉 जन्म कुंडली में दशम भाव पिता , राज्य एवं रोजगार से संबंधित भाव होता है । जब कुंडली में दशम भाव में  या कहीं भी सूर्य – राहु ,शनि या केतु से पीड़ित हो जाए , दशम भाव का स्वामी पीड़ित हो जाए  और दशम भाव भी पीड़ित हो जाये तब पितृ दोष बनता है । 
जब सूर्य,  दशम भाव एवं दशम भाव के स्वामी  पीड़ित  होंगे तभी पितृदोष माना  जाएगा ।

मात्र सूर्य के कहीं भी पीड़ित हो जाने से उसे पितृदोष नहीं कहते हैं उसको सिर्फ ग्रहण योग कह सकते हैं । सूर्य  जिस  भाव के स्वामी हैं इस भाव से संबंधित परेशानी होती है ।

💢👉 जिसकी भी कुंडली में पित्र दोष होता है उसके पिता के सुख में कमी होती है या तो बचपन में पिता की मृत्यु हो जाती है या पिता से संबंध अच्छे नहीं होते हैं । रोजगार में बहुत ज्यादा परेशानी होती है । जीवन में सही प्रकार से उन्नति नहीं हो पाती है ।
आत्म बल बहुत कमजोर होता है ।

💢👉 जिसके अपने पिता से बहुत अच्छा एवं श्रेष्ठ संबंध है उसकी कुंडली में पित्र दोष नहीं होता है ।

 💠♦️ वैसे पितृदोष के बारे में बहुत सारे उपाय बताए गए जो मैं आपको नीचे बताऊंगा परंतु मेरा मानना है कि सबसे मुख्य उपाय है इस जन्म में जो भी आपके पिता है उनकी सेवा कीजिये । यदि  उनसे आप का संबंध अच्छा नहीं है या अगर वह कुछ भी बोलते हैं डांटते हैं तो आप अपने मन में उनके प्रति दुर्भावना मत रखिए । अपने पिता की सेवा कीजिए । पिता से अच्छा व्यवहार कीजिए तभी जाकर पितृदोष समाप्त होगा । आप चाहे कितने भी पूजा पाठ कर लें और अपने पिता के साथ दुर्व्यवहार करें तो कभी और किसी कीमत पर पितृ दोष समाप्त नहीं होगा ।

 💢 समाधान 💢

 ♦️ यदि आपकी कुंडली में सूर्य कारक है तो माणिक्य रत्न धारण करें  या मंत्र जाप करें ।
 दशम भाव का स्वामी कमजोर है तो उसका भी रत्न धारण कर सकते हैं । दशम भाव पर एवं सूर्य पर यदि क्रूर ग्रहों की दृष्टि पड़ रही है तो उनसे संबन्धित दान  तथा  उपाय करें । ( किसी ज्योतिषी की सलाह से )

♦️ श्राद्ध  के समय में  15 दिन तक प्रतिदिन 1 1-  21 माला मंत्र जाप करके अनुष्ठान करें ।

।। ॐ क्रीं क्लीं  ऐं सर्व पितृभ्यो स्वात्म सिद्धये  ॐ फट्  ।।

👉 किसी भी प्रकार के टोना टोटका नौटंकी करने से कोई लाभ नही होगा । उसके लिए मैंने जो नीचे उपाय बता रहा हूं वही करना पड़ेगा और वही करना पड़ेगा और उसी से ठीक होगा । और लंबे समय तक करना पड़ेगा ।

ऐसी स्थिति में राहु शनि या केतु के द्वारा ही ग्रह और भाव पीड़ित होते हैं।
आतः  इनसे संबंधित दान  तथा उपाय करें ।

👉 सूर्य

लाल चंदन की माला से सूर्य मंत्र का जाप कर सकते हैं । 

मंत्र – ।। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः ।।

प्रातः तांबे के लोटे में जल , कुंकुम, अक्षत एवं लाल पुष्प डालकर सूर्य को अर्पित करें ।  पिता के पैर छूकर आशीर्वाद लें एवं पिता की सेवा करें ।

💠 मैं यहां तीनों ग्रहों से संबंधित उपाय बता रहा हूं परंतु जो ग्रह पीड़ित कर रहे हैं सिर्फ उनका ही उपाय करने की ज्यादा आवश्यकता है ।

👉 शनि
दान – काले वस्त्र , उरद , कला तिल , लोहे की सामग्री , जूते , सरसो का तेल , बादाम , काला छाता ।
उपाय – शनिवार को लोहे की कटोरी में सरसों तेल डालकर उसमें अपनी परछाई देखकर दान करें । शनिवार को संध्याकाल में पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं , काला तिल एवं मीठा जल चढ़ाएं तथा 7 बार परिक्रमा करें । मोर पंख पूजा स्थान में रखें । शनिवार को रोटी में हल्का सरसों तेल और नमक लगाकर काले कुत्ते या काली गाय या भैसा या कौए को खिलाएं । शराब का सेवन ना करें । बूढ़े मजदूर को भोजन कराएं ।

👉 राहु – 

दान – नीले काले वस्त्र , ( यव ) जौ , काली उड़द , जटा वाला नारियल , चाय पत्ती , तंबाकू , मूली , कोयला इत्यादि। ( बुधवार या शनिवार को कुष्ठ रोगी या सफाई कर्मी को ) ।

उपाय – कुष्ठ रोगी को भोजन कराएं जिसमें काले उड़द की एक सामग्री अवश्य होनी चाहिए । जौ कच्चे दूध से धोकर नदी में विसर्जित करें या पंछियों को खिलाएं । घर में या छत पर किसी भी प्रकार का बंद बिजली का सामान या कबाड़ ना रखें । पारद शिवलिंग स्थापित करके रुद्राक्ष की माला से महामृत्युंजय मंत्र का स्वयं जाप करें । रुद्राष्टाध्यायी ( पांचवें अध्याय के 16 मंत्र ) का पाठ करते हुए पारद शिवलिंग पर रुद्राभिषेक करें । 

👉 केतु – 

दान – चितकबरा कंबल , भूरा वस्त्र , सतनाजा , नारियल , काला – सफेद तिल , तिल का तेल , बकरा इत्यादि । ( मंगलवार या शनिवार को कुष्ठ रोगी या सफाईकर्मी को )
उपाय – असगंध की जड़ धारण करें । काले एवं सफेद तिल के लड्डू गणेश जी को चढ़ा कर बांटें । कुत्ते को दूध एवं ब्रेड खिलाएं , प्रतिदिन कुत्ते को रोटी खिलाएं । सतनाजे की रोटी कुत्ते को खिलाएं ।

💢💠👉 पित्र पक्ष में श्राद्ध एवं पूजन कैसे करते हैं इससे संबंधित पूजन विधि 28 अगस्त को  पोस्ट किया था ।

🔹🔹🔹🔹🔹