Sunday, February 18, 2024

जानिए सूर्य देव की उत्पत्ति का रहस्य...

सूर्य को अगर विज्ञान की नजर से देखें तो भी वह भगवान से कम नहीं क्योंकि सूर्य के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। सूर्य की पूजा वैदिक काल से हो रही है। वेदों और ऋचाओं में सूर्य देव की स्तुति की गई है, लेकिन मन में हमेशा ये बात उठती है कि सूर्य की उत्पत्ति आखिर हुई कब? क्या हैं उनकी उत्पत्ति का रहस्य। शास्त्रों में वर्णित है कि सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा जी के मुख से 'ऊँ' शब्द का उच्चारण हुआ था और यही सूर्य के प्रारंभिक सूक्ष्म स्वरूप था। इसके बाद भूः भुव तथा स्व शब्द उत्पन्न हुए। ये तीनों शब्द पिंड रूप में 'ऊँ' में विलीन हए तो सूर्य को स्थूल रूप मिला। सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न होने से इसका नाम आदित्य पड़ा। तो आइए जानें कैसे भगवान सूर्य यानी आदित्य का जन्म।
ऐसे बने आदित्य

ब्रह्मा जी के पुत्र मरिचि और मरिचि के पुत्र महर्षि कश्यप का विवाह प्रजापति दक्ष की कन्या दीति और अदिति से हुआ था। दीति से दैत्य पैदा हुए और अदिति ने देवताओं को जन्म हुआ था। तभी से दैत्य और देवताओं के बीच लड़ाई शुरू हो गई थी। इस लड़ाई को देखकर देवमाता अदिति बहुत दुखी रहने लगी और वह सूर्य की उपासना करने लगीं। उनकी आराधाना से सूर्य देव प्रसन्न हुए और उन्हें पुत्र के रूप में जन्म लेने का वरदान दे दिया। कुछ समय पश्चात उनके गर्भ से तेजस्वी बालक यानी भगवान सूर्य ने जन्म लिया। बाद में उन्होंने असुरों का नाश किया। अदिति के गर्भ से जन्मके कारण उनका नाम आदित्य पड़ा था।

जानिए सूर्य की जन्म भूमि, गोत्र और जाति
सूर्य की जन्मस्थली कलिंग देश मानी जाती है। शास्त्रों में वर्णित है कि उनका गोत्र कश्यप और जाति ब्राह्मण है। सूर्य को प्रसन्न करने के लिए कुछ खास चीजें बहुत मायने रखते हैं। जैसे गुड़, गुग्गल की धूप, लाल चन्दन, अर्क की समिधा और कमल के फूल।

उनका सारथी है लंगड़ा
सूर्य के रथ में केवल एक पहिया है और ये संवत्सर कहलाता है। इस रथ को सात अलग-अलग रंग के घोड़े इसे खींच रहे होते हैं। खास बात ये है कि इस रथ का सारथी लंगड़ा, मार्ग निरालम्ब है, घोड़े की लगाम की जगह सांपों की रस्सी है।

श्रीमद्भागवत् पुराण में सूर्य के रथ का एक चक्र(पहिया) संवत्सर हेाता है और इसमें मास रूपी बारह आरे होते हैं, ऋतु रूप में छह नेमिषा है, तीन चौमासे रूप नाभि है। रस रथ की धुरी का एक सिरा मेरूपर्वत की चोटी पर है और दूसरा मानसरोवर पर्वत पर, इस रथ में अरुण नामक सारथी भगवान सूर्य की ओर रहता है।

दो पत्नियां और 10 पुत्र हैं -
भगवान् सूर्य की दो पत्नियां हैं संज्ञा और निक्षुभा। संज्ञा के सुरेणु, राज्ञी, द्यौ, त्वाष्ट्री एवं प्रभा आदि अनेक नाम हैं तथा छाया का ही दूसरा नाम निक्षुभा है। संज्ञा विश्वकर्मा त्वष्टा की पुत्री है। भगवान् सूर्य को संज्ञा से वैवस्वतमनु, यम, यमुना, अश्विनी कुमार द्वय और रैवन्त तथा छाया से शनि, तपती, विष्टि और सावर्णिमनु ये दस संतानें हुई।

ऐसा है स्वरूप -
सूर्य सिंह राशि के स्वामी हैं। इनकी महादशा 6वर्ष की होती है। प्रिय रत्न माणिक्य है। सूर्य की प्रिय वस्तुएं सवत्सा गाय, गुड़, तांबा, सोना एवं लाल वस्त्र आदि हैं। सूर्य की धातु सोना और तांबा है। सूर्य की जप संख्या 7000 है।

सूर्य भगवान का बीज मंत्र
'ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः' है। वहीं, सामान्य मंत्र- 'ऊँ घृणि सूर्याय नमः' है। यदि सूर्य निर्बल हो तो नित्य सूर्य उपासना, सूर्य को अर्ध्य देने से, रविवार का व्रत करने से और सूर्यदेव के नित्य दर्शन करने से सूर्यदेवता प्रसन्न और बली होते हैं।

Saturday, February 17, 2024

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वैदिक ज्योतिष के अनुसार मानसिक तनाव को दूर करने के लिए ये हैं आसान उपाय
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अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्रमा की स्थिति सही नहीं है तो इसका सीधा प्रभाव मानसिक स्थिति पर पड़ता है। कुंडली में चंद्रमा की कमजोर स्थिति मानसिक रोगों को बढ़ावा देती है। साथ ही गृह क्लेश, ऑफिस और घर में परेशानियों का लगातार बढ़ना, माता-पिता के स्वास्थ्य पर विपरित प्रभाव पड़ना आदि कई समस्याएं मानसिक रूप परेशान कर देती हैं। ऐसे में अगर आपके भी मानसिक रूप से परेशान हैं या फिर ऐसी स्थितियों से गुजर रहे हैं तो आपको कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत करनी होगी, जिससे आपको मानसिक परेशानी से मुक्ति मिल सके। आइए जानते हैं ज्योतिष शास्त्र के इन उपायों के बारे में…

मिलती है राहु के अशुभ प्रभाव से मुक्ति

सोने से पहले अपने हाथ-पैर धोकर ही बिस्तर में जाएं। गंदे और गीले पैरों से बिस्तर में बिल्लुक नहीं जाना चाहिए, ऐसा करने से राहु का अशुभ प्रभाव पड़ता है और उससे आपकी परेशानियों में भी वृद्धि होती है। इसलिए आप हाथ-पैर साफ करके और ईश्वर को स्मरण करके ही बिस्तर में जाना चाहिए।

इस मंत्र के जप से मिलेगा फायदा

मानसिक रोगों से मुक्ति के लिए सबसे पहले आपको नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए और अपने कुंटुंब के ईष्ट देवों का ध्यान करना चाहिए। साथ ही हर रोज रूद्राक्ष की माला से सुबह-शाम ‘ओम उमादेवीभ्यां नम:’ मंत्र का जप करना चाहिए। ऐसा करने से भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है और मानसिक परेशानियों से मुक्ति मिलती है।

सफर पर जाना है तो इन बातों को जान लीजिए, रहेंगे फायदे में

इन चीजों को मिलाकर दें अर्घ्य

मानसिक रोगों से मुक्ति के लिए चांदी के लोटा लें और उसमें जल, दूध, चावल, शक्कर और गंगाजल लेकर चंद्रमा को अर्घ्य दें। ये सभी चीजें चंद्रमा से संबंधित हैं। साथ ही पांच दीपक सुबह-शाम घर के मंदिर, आगंन और तुलसी के पौधे के सामने जलाएं। ऐसा करने से मानिसक परेशानियों से मुक्ति मिलती है।

इस उपाय से मानसिक परेशानी होती है दूर

भगवान शिव की पूजा करने से कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है इसलिए जन्मदिन, त्रयोदशी, प्रदोष व्रत व महाशिवरात्रि पर शिवलिंग का रूद्राभिषेक अवश्य कराएं और दो घंटे मौन रहकर भगवान शिव का ध्यान रखें। साथ ही पूर्णिमा के दिन व्रत रखकर चंद्रमा का पूजन करें। ऐसा करने से मानसिक परेशानियों से मुक्ति मिलती है और चंद्रमा शुभ फल देता है।

इससे दिमाग होता है तेज

हर रोज ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करना चाहिए और ईष्ट देवी-देवताओं का ध्यान के साथ भगवान शिव और विष्णुजी का किसी रूप में ध्यान करें। साथ ही सूर्योदय से ढाई घंटे के अंदर अर्थात दिन का पहला आहर करें यानी भोजन कर लें। इससे दिमाग को पूर्ण शक्ति मिलती है और मानसिक रूप से मजबूत होते हैं। अगर इस समय पर नाश्ता करेंगे तो दिमाग भी कमजोर होता है।

इस उपाय से चंद्रमा की स्थिति होती है मजबूत

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत करने के लिए चावल की खीर बनाएं और उसको गरीब व जरूरतमंदों को दान कराएं। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि सोमवार के दिन दूध न पीएं। साथ ही हर रोज आंवला और दो अखरोट जरूर खाएं। इसके बाद सोने से पहले नाक में बादाम के तेल की बूंदें डालें। ऐसा करने से मानसिक रोग दूर होता है और चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है, जिससे हर क्षेत्र में सफलता मिलती है।


जन्म कुंडली के प्रथम भाव से शारीरिक स्वास्थ्य , स्वभाव , जीवन की उन्नति के विषय में जानकारी प्राप्त होती है । जन्म कुंडली में प्रथम भाव में  4 अंक लिखा है । अर्थात आपकी कर्क   लग्न की कुंडली है ।  कर्क  लग्न के स्वामी  चन्द्र   होते हैं अतः  चन्द्रमा   आपके  लग्नेश है ।

कर्क लग्न प्रधान व्यक्ति शारीरिक रूप से सुंदर होते हैं ।  शरीर गौर वर्ण होता है । सुंदर मुस्कुराहट युक्त इनका व्यक्तित्व सहज ही आकर्षक होता है।  घने लंबे काले बाल ,  उन्नत ललाट , तीखी और नुकीली नासिका ,  पतले और सुंदर होंठ ,  रहस्यमई मुस्कान इनके व्यक्तित्व में आकर्षण उत्पन्न करते हैं । लंबी भुजाएं , चौड़ा सीना और आत्मविश्वास  युक्त हृदय से यह सहज ही लोगों के प्रिय पात्र बन जाते हैं ।  कद मझोला एवं शारीरिक गठन कोमल होता है । कर्क लग्न में जन्म लेने वाले व्यक्ति स्वभाव से सहिष्णु और सहनशील होते हैं ।  अपने ऊपर होते हुए अत्याचारों को भी जानबूझकर सहन करते रहते हैं । ऐसे व्यक्ति अत्यंत कोमल , मधुर ,  सहिष्णु ,  विनम्र और भावुक होते हैं । ऐसे व्यक्ति शारीरिक श्रम की अपेक्षा मानसिक श्रम में ज्यादा विश्वास करते हैं । अंतर्मन की हीनता की भावना भी प्रबल होती है ।  जरा सी कोई कार्य जो इनके रुचि के विपरीत हो जाए तो यह हीनता का शिकार हो जाते हैं ।  दुःख पीड़ा को बहुत अधिक घटा बढ़ा कर देखना इनका स्वभाव होता है । शैक्षणिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में यह लोग अधिक सफल होते हैं । भावुकता के कारण कई बार स्वयं की हानि भी कर लेते हैं । ऐसे व्यक्तियों का बाल्यकाल  सुखद कहा जा सकता है ।  यौवन  काल में उन्हें कठोर संघर्ष करना पड़ता है ।  फिर भी यह धीरे-धीरे अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होते रहते हैं एवं अपने मंजिल पा लेते हैं ।  कर्क लग्न प्रधान व्यक्ति कल्पनाशील होते हैं ।  यह सैकड़ों योजनाएं बनाते हैं और मिटाते हैं ।  इस प्रकार के व्यक्ति सफल कवि और कहानीकार बन जाते हैं । योजना बनाने से संबंधित कार्यों में भी यह लोग सफल होते हैं । परिवारिक जीवन इनका सामान्य कहा जा सकता है । बातचीत में ऐसे जातक पटु होते हैं । किस प्रकार से बात करना ,  सामने वाले पक्ष को किस प्रकार प्रभावित करना और उन्हें अपने समूह में बांध देना यह कला इन्हें आती है और इनका यह जीवन में भरपूर उपयोग करते हैं । 
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आपकी जन्मकुंडली में लग्न पर इन ग्रहों का प्रभाव है । अतः  ग्रहों के बल के अनुसार इनसे सम्बंधित मिले जुले स्वभाव एवं प्रभाव  रहेंगे  ।

बुध - ऐसे व्यक्ति में कुमार वाले गुण होते हैं । बालकों जैसा स्वभाव होता है ।  कोमल स्वभाव होता है ।  स्त्रीत्व के गुण होते हैं । किसी भी बात का बहुत देर तक बुरा नहीं मानते हैं । हंसी मजाक करने वाले होते हैं ।  किसी भी क्षेत्र में मैनेज करना जानते हैं परंतु इनमें कुछ ईर्ष्या की भावना होती हैं । ऐसे व्यक्ति की लंबाई सामान्य से कुछ कम होती है । गणित में रुचि होती है । 
 
राहु - राहु प्रधान व्यक्ति में शनि के संबंधित गुण रहते हैं ।  ऐसे व्यक्ति जल्दी हिम्मत नहीं हारते हैं । बहुत संघर्ष करते हैं । जीतने के लिए संघर्ष करते रहते हैं  । ऐसे व्यक्ति बहुत जुगाड़ू होते हैं  । प्रत्येक क्षेत्र में कार्य करने से पीछे नहीं हटते ।  ऐसे व्यक्तियों का कई बार बनता काम अंत में बिगड़ जाता है । 
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♦️सूर्य आपकी कुंडली में धन एवं कुटुम्ब के स्वामी होते हैं । सूर्य बलवान हो तो राज्य में अधिकार प्राप्त होत है । सूर्य  अपनी दशा में धन , एवं कुटुम्ब  का श्रेष्ठ सुख देते हैं । सूर्य आपकी कुंडली में  सामान्य मारकेश होते हैं । 
👉सूर्य स्वराशि में विराजमान है परंतु अंश बल में बिल्कुल कमजोर है तथा उस पर शनि की दृष्टि है ।  जिसके कारण धन एवं कुटुंब के सुख में परेशानी होती है । धन का संग्रह ठीक से नहीं हो पाता है एवं धन से संबंध नुकसान भी होता है । मानसिक परेशानी बनी रहती है । अष्टम भाव में दृष्टि के कारण दैनिक दिनचर्या में कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता है । आयु के  संबंध में सामान कठिनाई होती है ।

♦️चंद्रमा आपकी कुंडली में शारीरिक स्वास्थ्य , आयु , सौंदर्य एवं उन्नति के कारक होते हैं।  चंद्रमा आपकी कुंडली में कारक होते ।
👉चंद्रमा गुरु एवं मंगल के साथ विराजमान है । यह बहुत ही श्रेष्ठ योग है । शारीरिक स्वास्थय ,  सौन्दर्य ,  सम्मान ,  प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है । भाई बहन का सुख प्राप्त होता है । नवम भाव में दृष्टि के कारण भाग्य की विशेष उन्नति होती है ।  आप धर्म का पालन करते हैं ।  उच्च शिक्षा अच्छी प्राप्त होती है । ऐसे व्यक्ति सुंदर ,  ईश्वर भक्त ,  धार्मिक  , धनी  , पुरुषार्थ होते हैं।
(  परंतु चंद्रमा अंश बल एवं पक्ष बल में बहुत कमजोर है तथा उसपर केतु की दृष्टि है ।  जिसके कारण उपरोक्त लाभ में कमी एवं परेशानी होती है । मानसिक परेशानी बानी रहती है ।)

♦️मंगल आपकी कुंडली में विद्या ,  बुद्धि , संतान  , राज्य , रोजगार एवं पिता के स्वामी होते हैं ।  मंगल आपकी कुंडली में राजयोग कारक ग्रह होते हैं ।  मंगल आपकी कुंडली में प्रबल कारक ग्रह होते हैं । 
👉पराक्रम में वृद्धि होती है । भाई बहन का सुख प्राप्त होता है । विद्या - बुद्धि एवं संतान के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है । षष्ठ भाव में दृष्टि के कारण शत्रु पक्ष पर प्रभाव बना रहता है । नवम भाव में दृष्टि के कारण भाग्य की विशेष उन्नति होती है । आप धर्म का पालन करते है । उच्च शिक्षा अच्छी प्राप्त होती है । दशम में दृष्टि के कारण पिता ,  राज्य एवं रोजगार के क्षेत्र में सुख ,  सम्मान तथा सफलता प्राप्त होती है । ऐसे व्यक्ति मंगल से संबंधित रोजगार करें तो अच्छी सफलता प्राप्त होती है ।
(  मंगल पर केतु की दृष्टि है जिसके कारण उपरोक्त लाभ में कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है । )

♦️बुध आपकी कुंडली में छोटे भाई - बहन , पराक्रम , बाहरी स्थानों से संपर्क एवं खर्च के कारक होते हैं ।  बुध आपकी कुंडली में अकारक ग्रह होते हैं । 
👉शारीरिक स्वास्थ में कुछ परेशानी तथा दुर्बलता रहती है । भाई-बहन का सुख प्राप्त होता है । बाहरी स्थानों के संपर्क से उन्नति होती है । खर्च अधिक रहता है । सप्तम भाव पर दृष्टि के कारण कुछ कठिनाइयों के साथ पत्नी एवं वैवाहिक जीवन का सुख प्राप्त होता है ।

♦️गुरु आपकी कुंडली में भाग्य , धर्म ,  उच्च शिक्षा , रोग एवं शत्रु के स्वामी होते हैं ।  गुरु आपकी कुंडली में कारक और अकारक दोनों होते हैं । 
👉पराक्रम में वृद्धि होती है । भाई-बहन का सुख प्राप्त होता है । सप्तम भाव में दृष्टि के कारण कुछ कठिनाइयों के साथ पत्नी एवं वैवाहिक जीवन का सुख प्राप्त होता है । नवम भाव में दृष्टि के कारण भाग्य की विशेष उन्नति होती है । आप धर्म का पालन करते हैं । उच्च शिक्षा अच्छी प्राप्त होती है । एकादश भाव में दृष्टि के कारण कुछ कठिनाइयों के साथ आमदनी के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है । ऐसे व्यक्ति शत्रुजयी , धर्मात्मा , उन्नतिशील तथा हिम्मती होते हैं ।

♦️शुक्र आपकी कुंडली में माता , भूमि , भवन , घरेलू सुख एवं आमदनी के स्वामी होते हैं ।  
👉माता भूमि भवन के सुख में कुछ कमी रहती है । ऐसे व्यक्ति जन्म स्थान से दूर जाकर निवास करते हैं । बाहरी स्थानों के संबंध से सफलता एवं सुख की प्राप्ति होती है । बाहरी  स्थानों के संबंध से आमदनी के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती हैं परंतु ऐसे व्यक्ति खर्च अधिक करते हैं । ऐसे व्यक्ति गरीब घर में जन्म लेने पर भी जीवन में बहुत उन्नति करते हैं और सारे सुख प्राप्त करते हैं ।
 ( शुक्र अंश बल में बिल्कुल कमजोर है अतः पूर्ण लाभ प्राप्त नहीं होता है । )

♦️शनि  आपकी कुंडली में  पति / पत्नी , दैनिक व्यवसाय एवं आयु के स्वामी होते हैं ।  शनि  आपकी कुंडली में अकारक होते हैं परंतु ज्यादा कमजोर हो जाए तो पत्नी के स्वास्थ्य एवं आयु में हानि करते हैं । 
👉आयु में वृद्धि होती है परंतु पत्नी तथा वैवाहिक जीवन के सुख में कमी तथा परेशानी होती है । दशम भाव में दृष्टि के कारण पिता ,  राज्य एवं रोजगार के पक्ष में कुछ परेशानी होती है । रोजगार के क्षेत्र में उन्नति धीरे-धीरे होती है । द्वितीय भाव में सूर्य पर दृष्टि के कारण धन एवं कुटुंब के सुख में परेशानी होती है ।  मतभेद बना रहता है । पंचम भाव में दृष्टि के कारण विद्या -  बुद्धि एवं संतान के क्षेत्र में परेशानी होती है ।

 ♦️👉राहु
विद्या - बुद्धि एवं संतान के पक्ष में कठिनाई तथा परेशानी होती है । मस्तिष्क के भीतर चिंता व्याप्त रहते हैं । विलंब से संतान का सुख प्राप्त होता है । वाणी में रूखापन रहता है । ऐसे व्यक्ति जिद्दी होते हैं । नवम भाव में दृष्टि के कारण भाग्य की उन्नति में कठिनाई होती है । उच्च शिक्षा प्राप्त करने में भी परेशानी होती है । धर्म का पालन ठीक से नहीं कर पाते हैं । एकादश भाव में दृष्टि के कारण कभी-कभी अचानक लाभ प्राप्त होता है । ऐसे व्यक्ति को शेयर मार्केट में भी सफलता प्राप्त होती है परंतु विधिवत ट्रेनिंग लेकर ही यह कार्य करना चाहिए ।  लग्न में दृष्टि के कारण शारीरिक स्वास्थ्य , सौंदर्य  , सम्मान  , प्रतिष्ठा  में कमी तथा परेशानी होती हैं । मानसिक परेशानी बनी रहती है ।

♦️👉केतु 
अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए आप कठिन परिश्रम करते हैं । अचानक लाभ - हानि होता रहता है । तृतीय भाव में चंद्रमा एवं मंगल पर दृष्टि के कारण शारीरिक स्वास्थ्य , विद्या  , बुद्धि ,  संतान एवं रोजगार के क्षेत्र में कठिनाई तथा परेशानियों का सामना करना पड़ता है । मानसिक परेशानी बनी रहती है । स्वभाव उग्र होता है एवं जिद्दी स्वभाव के होते हैं । ऐसे व्यक्ति को सीने से संबंधित परेशानी होने की संभावना रहती है अतः सावधान रहना चाहिए । पंचम भाव में दृष्टि के कारण दिमाग बहुत तेज होता है परंतु विद्या प्राप्त करने एवं संतान के क्षेत्र में कठिनाई तथा परेशानियों का सामना करना पड़ता है । किसी संतान के अपंग होने का भी भय बना रहता है । सप्तम भाव में दृष्टि के कारण पत्नी एवं वैवाहिक जीवन के सुख में कठिनाई तथा परेशानी होती है । मतभेद बना रहता है । मुतेन्द्रीय से संबंधित बीमारी होने की संभावना रहती है ।

                       ♦️सारांश♦️

👉 स्वास्थ्य एवं आयु  के लिए –  चन्द्र , राहु , केतु    का उपाय करें । 
  महामृत्युंजय यंत्र स्थापित करके   रुद्राक्ष की माला से  महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें । महामृत्युञ्जय मन्त्र - ॥ ॐ हौं  जुं सः त्रयम्बकं  यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनं उर्वारुकमिव    
बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् सः जुं हौं ॐ ॥  

👉 संतान एवं विद्या बुद्धि के लिए – मंगल , शनि , राहु , केतु    का उपाय करें । 

👉गृहस्थ जीवन के लिए – शनि , केतु     का उपाय करें । 

👉 भाग्य की उन्नति के लिए –  गुरु , राहु    का उपाय करें । 

👉 रोजगार के लिए –  मंगल , शनि , केतु   का उपाय करें । 

👉धन एवं आमदनी के लिए – शुक्र , सूर्य , शनि , राहु , केतु  का उपाय करें । 
  स्फटिक का श्रीयंत्र स्थापित करके स्फटिक की माला से  लक्ष्मी साधना  ( मंत्र जाप  )  करें । लक्ष्मी मंत्र – ॥ ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः  ॥
॥ ऐं ह्रीं  श्रीं क्लीं सौ: जगतप्रसुत्यै नमः  ॥

सुखी जीवन जीने के लिए सरल सामाधन।
ग्रह दोष और शत्रुओं से बचाव के लिए-

दोस्तो,कुंडली मे बुध,या केतु ग्रह परेशान कर रहे हो,मूल नक्षत्रों में जन्म हुआ हो उसमे भी अभुक्त मूल का जन्म हो और इस कारण रोग ऋण शत्रु से परेशानी हो(काल पुरुष की कुंडली के अनुसार बुध छठे भाव का मालिक है और केतु बुध के समान फल कारक है)।ऐसे मे आप
यह उपाय करिये और देखिये कैसे उड़न छू होते है आपके कष्ट।
भगवान गणेश जी के इस मंत्र का जिसमे गणेश जी के बारह नामो का वर्णन है। इन बारह नामों का जप बुधवार को शुरू करके रोज करे और संभव हो तो हर बुधवार को किसी गणेश जी के मंदिर में बैठकर करे। कम से कम 21 बार इस मंत्र का जप करे। 
मंत्र-
गणपूज्यो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्री त्रियम्बक:।
नीलग्रीवो लम्बोदरो विकटो विघ्रराजक:।।
धूम्रवर्णों भालचन्द्रो दशमस्तु विनायक:।
गणपर्तिहस्तिमुखो द्वादशारे यजेद्गणम्।।

Friday, February 16, 2024

#शास्त्रोक्त_जप_करने_की_विधि

जप तीन प्रकार का होता है
 १) वाचिक :- धीरे-धीरे बोलकर किए जाने वाले जप को वाचिक कहते है ।
२) उपांशु :- जिसमे होठ तो हिले पर आवाज न आए उसे उपांशु जप कहते है ।
३) मानसिक :- जिस जप मे जीभ व होठ न हिले व मन ही मन जप हो उसे मानसिक जप कहते है ।

वाचिकश्च उपांशुश्च मानसस्त्रिविधः स्मृतः ।
त्रयाणां जपयज्ञानां श्रैयान् स्यादुत्तरोत्तरम् ।।
  अर्थ :- तीनो जपो में पहले की अपेक्षा दुसरा व दुसरे की अपेक्षा तीसरा प्रकार श्रैष्ठ है । ( नृसिंह पुराण ) 

प्रातः काल हाथ को नाभी के पास, मध्याह्न मे ह्रदय के समीप और सायंकाल मुंह के समानांतर मे रखे । जप की गिनती चंदन, अक्षत, पुष्प, धान्य व मिट्टी से न करे । जप की गिनती के लिए लाख, कुश, सिन्दुर, और सुखे गोबर को मिलाकर गोलिया बना ले । 
    जप करते समय माला दाहिने हाथ मे पकडे व माला को गौमुखी अथवा कपडे मे रखे, ध्यान रहे कपडा गीला न हो । 

#माला_कैसे_फेरे :- जप के लिए माला अनामिका अंगुली पर रखकर अंगुठे से स्पर्श करते हुए मध्यमा अंगुली से फेरना चाहिए तर्जनी अंगुली नही लगाना चाहिए 

   मेरौ तु लड्घिते देवि न मन्त्रफलभाग्भवेत् ।
अर्थ :- सुमेरु का उल्लड्घन कर किये गए जप का फल नही मिलता है । अतः सुमेरु के पास से माला को घुमाकर दूसरी बार जपे ।

जप करते समय हिलना, डुलना, बोलना निषिद्ध है । यदि जप करते समय बोल दिया जाए तो भगवान का स्मरण कर फिरसे जप करना चाहिए । 
    यदि माला गिर जाय तो 108 बार जप करे । यदि माला पैर से गिर जाए तो इसे धोकर पुनः जप करे । 

#जप_कहॉ_करे :- घर मे जप करने से एक गुना, गौशाला मे जप करने से सौ गुना, वन या वाटिका और तीर्थ स्थल मे जप करने से हजार गुना, पर्वत पर दस हजार गुना, नदी तट पर लाख गुना, मंदिर मे करोड गुना तथा शिवलिंग के पास जप करने से अनंत गुना फल मिलता है ।

#जप_माला_कैसी_हो :- वैष्णव भक्त तो तुलसी माला से ही जप करे,  शैव भक्त रुद्राक्ष की माला से जप करे व लक्ष्मी या देवी के जप कमलगटटे या मोती की माला से जप करे ।

यदि किसी बात को लेकर संशय हो तो कमेंट बॉक्स मे प्रश्न पुछ सकते है पोस्ट को शेयर अवश्य करे ।
 


    नित्य नाम जप, पुजा पाठ व सही दिनचर्या के विषय मे शास्त्रोक्त के प्रमाण सहित

Thursday, February 15, 2024

ब्राह्मण में ऐसा क्या है कि सारी दुनिया ब्राह्मण के पीछे पड़ी है।
इसका उत्तर इस प्रकार है।

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है कि भगवान श्री राम जी ने श्री परशुराम जी से कहा कि →
"देव एक गुन धनुष हमारे।
 नौ गुन परम पुनीत तुम्हारे।।"

हे प्रभु हम क्षत्रिय हैं हमारे पास एक ही गुण
अर्थात धनुष ही है आप ब्राह्मण हैं आप में
परम पवित्र 9 गुण है-
ब्राह्मण_के_नौ_गुण :-
रिजुः तपस्वी सन्तोषी क्षमाशीलो जितेन्द्रियः।
दाता शूरो दयालुश्च ब्राह्मणो नवभिर्गुणैः।।

 रिजुः = सरल हो,
 तपस्वी = तप करनेवाला हो,
संतोषी= मेहनत की कमाई पर सन्तुष्ट,
रहनेवाला हो,
 क्षमाशीलो = क्षमा करनेवाला हो,
 जितेन्द्रियः = इन्द्रियों को वश में रखनेवाला हो,
 दाता= दान करनेवाला हो,
शूर = बहादुर हो,
 दयालुश्च= सब पर दया करनेवाला हो,
 ब्रह्मज्ञानी,

 श्रीमद् भगवत गीता के 18वें अध्याय के 42श्लोक में भी ब्राह्मण के 9 गुण इस प्रकार बताए गये हैं-

" शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्म कर्म स्वभावजम्।।"

अर्थात-मन का निग्रह करना ,इंद्रियों को वश
में करना,तप( धर्म पालन के लिए कष्ट सहना),
शौच(बाहर भीतर से शुद्ध रहना),क्षमा(दूसरों के
अपराध को क्षमा करना),आर्जवम्( शरीर,मन
आदि में सरलता रखना,वेद शास्त्र आदि का
ज्ञान होना,यज्ञ विधि को अनुभव में लाना
और परमात्मा वेद आदि में आस्तिक भाव
रखना यह सब ब्राह्मणों के स्वभाविक कर्म हैं।

पूर्व श्लोक में "स्वभावप्रभवैर्गुणै:
"कहा इसलिए स्वभावत कर्म बताया है।

स्वभाव बनने में जन्म मुख्य है। फिर जन्म के बाद संग मुख्य है। संग स्वाध्याय,अभ्यास आदि के कारण स्वभाव में कर्म गुण बन जाता है।

दैवाधीनं जगत सर्वं , मन्त्रा धीनाश्च देवता:। 
ते मंत्रा: ब्राह्मणा धीना: , तस्माद् ब्राह्मण देवता:।। 

धिग्बलं क्षत्रिय बलं,ब्रह्म तेजो बलम बलम्।
एकेन ब्रह्म दण्डेन,सर्व शस्त्राणि हतानि च।। 

इस श्लोक में भी गुण से हारे हैं। त्याग, तपस्या, गायत्री, सन्ध्या, के बल से और आज ब्राह्मण उसी को त्यागते जा रहे हैं,और पूजवाने का भाव जबरदस्ती रखे हुए हैं।

 *विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या।
 *वेदा: शाखा धर्मकर्माणि पत्रम् l।*
 *तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं।
 *छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम् ll*

भावार्थ -- वेदों का ज्ञाता और विद्वान ब्राह्मण एक ऐसे वृक्ष के समान हैं जिसका मूल(जड़) दिन के तीन विभागों प्रातः,मध्याह्न और सायं, सन्ध्याकाल के समय यह तीन सन्ध्या (गायत्री मन्त्र का जप) करना है,चारों वेद उसकी शाखायें हैं,तथा वैदिक धर्म के आचार विचार का पालन करना उसके पत्तों के समान हैं।

अतः प्रत्येक ब्राह्मण का यह कर्तव्य है कि,,इस सन्ध्या रूपी मूल की यत्नपूर्वक रक्षा करें, क्योंकि यदि मूल ही नष्ट हो जायेगा तो न तो शाखायें बचेंगी और न पत्ते ही बचेंगे।। 

पुराणों में कहा गया है ---
विप्राणां यत्र पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता।

जिस स्थान पर ब्राह्मणों का पूजन हो वहाँ
देवता भी निवास करते हैं। अन्यथा ब्राह्मणों के सम्मान के बिना देवालय भी शून्य हो जाते हैं। 
इसलिए .......
ब्राह्मणातिक्रमो नास्ति विप्रा वेद विवर्जिताः।।

 श्री कृष्ण ने कहा-ब्राह्मण यदि वेद से हीन भी हो,
तब पर भी उसका अपमान नही करना चाहिए।
क्योंकि तुलसी का पत्ता क्या छोटा क्या बड़ा
वह हर अवस्था में कल्याण ही करता है।

 ब्राह्मणोस्य मुखमासिद्......

वेदों ने कहा है की ब्राह्मण विराट पुरुष भगवान
के मुख में निवास करते हैं।
इनके मुख से निकले हर शब्द भगवान का ही शब्द है, जैसा की स्वयं भगवान् ने कहा है कि,

विप्र प्रसादात् धरणी धरोहमम्।
विप्र प्रसादात् कमला वरोहम।
विप्र प्रसादात् अजिता जितोहम्।
विप्र प्रसादात् मम् राम नामम् ।।

 ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ही मैंने धरती को धारण कर रखा है। अन्यथा इतना भार कोई अन्य पुरुष कैसे उठा सकता है,इन्ही के आशीर्वाद से नारायण हो कर मैंने लक्ष्मी को वरदान में प्राप्त किया है,इन्ही के आशीर्वाद से मैं हर युद्ध भी जीत गया और ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ही मेरा नाम राम अमर हुआ है, अतः ब्राह्मण सर्व पूज्यनीय है।

और ब्राह्मणों का अपमान ही कलियुग में पाप की वृद्धि का मुख्य कारण है।

प्रश्न नहीं स्वाध्याय करें।। अपना धर्म क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल, नित्य कर्म करते रहिए।
👉जन्म कुंडली में छठे घर को षष्ठ भाव कहते हैं एवं इसके स्वामी को षष्ठेश कहते हैं ।
षष्ठ भाव से गुर्दे , (किडनी ), अंतड़ियां , नाभि , अमाशय , कमर , रोग , ऋण , शत्रु , झगड़ा , घाव , फोड़े – फुंसी , अभाव , चोरी , परिश्रम , नौकरी , कोर्ट केस में जीत होगी या हार इत्यादि विषयों के बारे में विचार किया जाता है ।

👉षष्ठ भाव के कारक ग्रह मंगल एवं शनि हैं ।
षष्ठ भाव को अकारक भाव एवं इसके स्वामी को अकारक ग्रह माना जाता है परंतु सभी लग्न की कुंडली में इसके स्वामी को पूर्णतः अकारक नही माना जाता है ।
👉किसी भी कारक भाव के स्वामी इस भाव में विराजमान हो तो उनसे संबंधित सुख में कमी एवं परेशानी होती है ।
अष्ठम एवं द्वादश भाव के स्वामी षष्ठ भाव में विराजमान हो तो विपरीत राज योग का निर्माण होता है परंतु सभी लग्न में इस नियम को लागू नही कर सकतें हैं ।
👉षष्ट भाव पर क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो शत्रु पक्ष पर प्रभाव होता है परंतु कई बार इसके कारण मामा के सुख में कमी हो जाती है या किडनी , रीढ़ की हड्डी , कमर दर्द , हर्निया , अंतड़ियों से संबंधित रोग भी हो जाते हैं ।
👉 केवल शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति अपने शत्रुओं से भी प्रीति करने वाला होता है । या शांत तरीके से शत्रुता को समाप्त करने की कोशिश करता है ।
कुंडली का षष्ठ भाव कन्या राशि एवं  बुध सभी पर पाप प्रभाव हो तो षष्ठ भाव से संबंधित अंगों में बीमारी होने की संभावना बढ़ जाती है ।

👉यदि षष्ठेश का संबंध द्वितीय या एकादश भाव से हो जाए तो कई बार व्यक्ति कर्ज लेकर अपना काम चलाता है , परंतु यदि द्वितीय भाव या एकादश भाव का स्वामी षष्ठ भाव में विराजमान हो जाए तो ऐसे व्यक्ति को कर्ज चुकाने में बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है या हमेशा कर्जदार बने रहते हैं ।
👉ऐसे व्यक्तियों को पैसे के लेन-देन में बहुत सतर्क रहना चाहिए । यदि एकादश भाव का स्वामी षष्ठ भाव में विराजमान हो जाए तो ऐसे व्यक्ति को उसके मेहनत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है । जहां भी पैसा उधार दे देते हैं वह वापस मिलने में बहुत परेशानी होती है ।

👉षष्ठ भाव से नौकरी के बारे में भी विचार किया जाता है । दशम भाव का स्वामी षष्ठ भाव में विराजमान हो जाए तो ऐसे व्यक्ति को नौकरी में सफलता प्राप्त होती है । स्वयं का रोजगार करने पर सफलता प्राप्त नहीं होती है ।

👉🏼दशम भाव में डॉक्टर बनाने वाले ग्रह सूर्य , मंगल से षष्ठेश का संबंध हो जाए तो ऐसे व्यक्ति डॉक्टर बन सकते हैं ।

👉 कुंडली के षष्ठ भाव से और भी परिवार के विषय में सामान्य जानकारी प्राप्त किया जा सकता है ।
संतान के धन एवं कुटुंब का भाव होता है । माता के छोटे भाई बहन का भाव होता है । पिता के भाग्य का भाव होता है । छोटे भाई बहन के भूमि भवन का भाव होता है । बड़े भाई बहन के आयु का भाव होता है ।