Saturday, March 29, 2025

नवदुर्गा (नवरात्रि) में माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप श्री शैलपुत्री जी की उपासना विधि〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृत शेखराम।वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम॥श्री दुर्गा का प्रथम रूप श्री शैलपुत्री हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाती हैं। नवरात्र के प्रथम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। गिरिराज हिमालय की पुत्री होने के कारण भगवती का प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का है, जिनकी आराधना से प्राणी सभी मनोवांछित फल प्राप्त कर लेता है।माँ शैलपुत्री दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल का पुष्प लिए अपने वाहन वृषभ पर विराजमान होतीं हैं. नवरात्र के इस प्रथम दिन की उपासना में साधक अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं, शैलपुत्री का पूजन करने से ‘मूलाधार चक्र’ जागृत होता है और यहीं से योग साधना आरंभ होती है जिससे अनेक प्रकार की शक्तियां प्राप्त होती हैं।मां दुर्गा शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक सनातन काल से मनाया जाता रहा है. आदि-शक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में पूजा की जाती है. अत: इसे नवरात्र के नाम भी जाना जाता है. सभीदेवता, राक्षस, मनुष्य इनकी कृपा-दृष्टि के लिए लालायित रहते हैं. यह हिन्दू समाज का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है जिसका धार्मिक, आध्यात्मिक, नैतिकव सांसारिक इन चारों ही दृष्टिकोण से काफी महत्व है.दुर्गा पूजा का त्यौहार वर्ष में दो बार आता है, एक चैत्र मास में और दूसरा आश्विन मास में चैत्र माह में देवी दुर्गा की पूजा बड़े ही धूम धाम से की जाती है लेकिन आश्विन मास का विशेष महत्व है. दुर्गा सप्तशती में भी आश्विन माह के शारदीयनवरात्रों की महिमा का विशेष बखान किया गया है. दोनों मासों में दुर्गा पूजा का विधान एक जैसा ही है, दोनों ही प्रतिपदा से दशमी तिथि तक मनायी जाती है।माता शैलपुत्री की कथा〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा।अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।'शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी।सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे।परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है।वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होअपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे 'शैलपुत्री' नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था।कलश स्थापना: विधि〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️नवरात्रा का प्रारम्भ आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना के साथ होता है. कलश को हिन्दु विधानों में मंगलमूर्ति गणेश कास्वरूप माना जाता है अत: सबसे पहले कलश की स्थान की जाती है. कलश स्थापना के लिए भूमि को सिक्त यानी शुद्ध किया जाता है. भूमि की शुद्धि के लिए गाय के गोबर और गंगा-जल से भूमि को लिपा जाता है।शैलपुत्री पूजा विधि:〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️शारदीय नवरात्र पर कलश स्थापना के साथ ही माँ दुर्गा की पूजा शुरू की जाती है. पहले दिन माँ दुर्गा के पहले स्वरूप शैलपुत्री की पूजा होती है. दुर्गा को मातृ शक्ति यानी स्नेह, करूणा और ममता का स्वरूप मानकर हम पूजते हैं। अत: इनकी पूजा में सभी तीर्थों, नदियों, समुद्रों, नवग्रहों,दिक्पालों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी योगिनियों को भी आमंत्रित किया जाता और और कलश में उन्हें विराजने हेतु प्रार्थना सहित उनका आहवान किया जाता है। कलश में सप्तमृतिका यानी सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेट किया जाता है और पंच प्रकार के पल्लव से कलश को सुशोभित किया जाता है.इस कलश के नीचे सात प्रकार के अनाज और जौ बोये जाते हैं जिन्हें दशमी तिथि को काटा जाता है और इससे सभी देवी-देवता की पूजा होती है. इसे जयन्ती कहते हैं जिसे इस मंत्र के साथ अर्पित किया जाता है “जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते”. इसी मंत्र से पुरोहित यजमान के परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर जयंती डालकर सुख, सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद देते हैं।कलश स्थापना के पश्चात देवी का आह्वान किया जाता है कि ‘हे मां दुर्गा हमने आपका स्वरूप जैसा सुना है उसी रूप में आपकी प्रतिमा बनवायी है आप उसमें प्रवेश कर हमारी पूजा अर्चना को स्वीकार करें’. देवी दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है और उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, गणेश और विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है और बायीं ओर कार्तिकेय, देवी महासरस्वती और जया नामक योगिनी रहती है तथा भगवान भोले नाथ की भी पूजा की जाती है. प्रथम पूजन के दिन “शैलपुत्री” के रूप में भगवती दुर्गा दुर्गतिनाशिनी की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती हैं।शैलपुत्री की ध्यान 〰️〰️🌼🌼〰️〰️वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्।वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्॥पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥शैलपुत्री की स्तोत्र पाठ:प्रथम दुर्गा त्वंहिभवसागर: तारणीम्।धन ऐश्वर्यदायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥चराचरेश्वरी त्वंहिमहामोह: विनाशिन।मुक्तिभुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥शैलपुत्री की कवच :ओमकार: मेंशिर: पातुमूलाधार निवासिनी।हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥श्रींकारपातुवदने लावाण्या महेश्वरी ।हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥भूमि-भवन वाहन की प्राप्ति हेतु नवरात्रि के प्रथम दिवस के उपाय〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️संपूर्ण प्रयासों के बावजूद भी भूमि-भवन वाहन की प्राप्ति नहीं हो रही है तो नवरात्र के पहले दिन यानी मां शैलपुत्री के दिन रात्रि में 8 बजे के बाद चौकी पर लाल कपड़ा बिछा कर उस पर दुर्गा जी का यंत्र स्थापित करें। तत्पश्चात 1 लौंग, 1गोमती चक्र, एक साबुत सुपारी, एक लाल चंदन का टुकड़ा, 1 रक्त गुंजा, इन समस्त सामग्री को एक पानी से भरे लोटे में रखें। घी का दीपक जला लें। 3 माला ॥ ॐ ह्लीं फट्ï॥ की करें और एक माला ऐं ह्लीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे शैलपुत्री देव्यै नम: की जाप करें। प्रत्येक माला के बाद लोटे पर एक फूंक मारे। फिर उस लोटे के जल को पीपल वृक्ष की जड़ में चढ़ा दें, उन लौंग एवं सुपारी को भी वहीं मिट्टïी में दबा दें। लाल चंदन का टुकड़ा और रक्त गुंजा का अपने ऊपर से उसार करके बहते पानी में बहा दें। अनावश्यक कोर्ट-कचेहरी के मामलों से छुटकारा मिल जाएगा।यदि अनावश्यक रूप से कोर्ट-कचहरी के मामलें परेशान कर रहे हो तो हर रोज 40 दिन तक 108 मोगरे के पुष्प ॐ ह्लीं श्रीं क्रीं शैलपुत्रिये नम:ï। मंत्र का जाप करते हुए अर्पित करें। प्रारंभ प्रथम नवरात्र को यह उपाय शुभ मुहूर्त में प्रारंभ करें।

Saturday, February 1, 2025

पंचांग के अनुसार, हर साल माघ माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस बार यह त्योहार 02 फरवरी 2025 को मनाया जाएगा। इस दिन मुख्य रूप से विद्या, बुद्धि और संगीत की देवी मां सरस्वती की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पूजा-अर्चना करने से सभी रुके हुए कार्य पूरे होने लगते हैं। इसके साथ ही मां सरस्वती की कृपा से बुद्धि और धन की प्राप्ति होती है। इसके अलावा इस दिन आपको पूजा के बाद कुछ विशेष मंत्रों और श्लोकों का जाप जरूर करना चाहिए।माता सरस्वती मंत्र (Mata Saraswati mantra)सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणी,विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु में सदाउपनिषदों की कथा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभिक काल में ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। लेकिन अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे, उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है।[2] हालाकि उपनिषद व पुराण ऋषियो को अपना अपना अनुभव है, अगर यह हमारे पवित्र सत ग्रंथों से मेल नही खाता तो यह मान्य नही है।[3]तब ब्रह्मा जी ने इस समस्या के निवारण के लिए अपने कमण्डल से जल अपने हथेली में लेकर संकल्प स्वरूप उस जल को छिड़कर भगवान श्री विष्णु की स्तुति करनी आरम्भ की। ब्रम्हा जी के किये स्तुति को सुन कर भगवान विष्णु तत्काल ही उनके सम्मुख प्रकट हो गए और उनकी समस्या जानकर भगवान विष्णु ने आदिशक्ति दुर्गा माता का आव्हान किया। विष्णु जी के द्वारा आव्हान होने के कारण भगवती दुर्गा वहां तुरंत ही प्रकट हो गयीं तब ब्रम्हा एवं विष्णु जी ने उन्हें इस संकट को दूर करने का निवेदन किया।[4]ब्रम्हा जी तथा विष्णु जी बातों को सुनने के बाद उसी क्षण आदिशक्ति दुर्गा माता के शरीर से स्वेत रंग का एक भारी तेज उत्पन्न हुआ जो एक दिव्य नारी के रूप में बदल गया। यह स्वरूप एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिनके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ में वर मुद्रा थे । अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। आदिशक्ति श्री दुर्गा के शरीर से उत्पन्न तेज से प्रकट होते ही उन देवी ने वीणा का मधुरनाद किया जिससे संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब सभी देवताओं ने शब्द और रस का संचार कर देने वाली उन देवी को वाणी की अधिष्ठात्री देवी "सरस्वती" कहा।[5]फिर आदिशक्ति भगवती दुर्गा ने ब्रम्हा जी से कहा कि मेरे तेज से उत्पन्न हुई ये देवी सरस्वती आपकी पत्नी बनेंगी, जैसे लक्ष्मी श्री विष्णु की शक्ति हैं, पार्वती महादेव शिव की शक्ति हैं उसी प्रकार ये सरस्वती देवी ही आपकी शक्ति होंगी। ऐसा कह कर आदिशक्ति श्री दुर्गा सब देवताओं के देखते - देखते वहीं अंतर्धान हो गयीं। इसके बाद सभी देवता सृष्टि के संचालन में संलग्न हो गए।[6]सरस्वती को वागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके प्रकटोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-मान-सम्मान और आत्मविश्वास में वृद्धि पाना चाहते हैं तो बसंत पंचमी के दिन इस मंत्र का जाप विशेष रूप से करें। इससे सभी जातकों को लाभ हो सकता है और उत्तम परिणाम भी मिल सकते हैं।नमस्ते शारदे देवी, काश्मीरपुर वासिनी,त्वामहं प्रार्थये नित्यं, विद्या दानं च देहि में,कंबू कंठी सुताम्रोष्ठी सर्वाभरणंभूषिता,महासरस्वती देवी, जिव्हाग्रे सन्नी विश्यताम् ।।शारदायै नमस्तुभ्यं , मम ह्रदय प्रवेशिनी,परीक्षायां समुत्तीर्णं, सर्व विषय नाम यथा।।सरस्वती गायत्री मंत्र – ॐ ऐं वाग्देव्यै विद्महे कामराजाय धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्॥

Monday, July 22, 2024

सभी सनातन प्यारे बंधुओं को सादर प्रणाम 🙏🏻वेदों के शिव 🌺 वेदों में महामृत्युंजय मन्त्र -देवता : रुद्र ॥ ऋषि : वशिष्ठ ॥छंद : विराड् ब्राह्मी अनुष्टुप् ॥ स्वर : धैवत: ॥ मन्त्र : -ॐ त्रम्वकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥त्रम्वकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम् ।उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुत: ॥ - ( यजुर्वेद ३.६० , ऋग्वेद ७.५९.१२ { ऋग्वेद में इस मन्त्र का छन्द : अनुष्टुप् ॥ स्वर : गांधार } ऋग्वेद मैं यह मन्त्र निम्न प्रदत्त है : - त्रम्वकं यजामहे सुगधिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥अर्थ : - हम तीनों दृष्टियों ( आध्यात्मिक , आधिदैविक , आधिभौतिक ) से युक्त परमेश्वर रुद्र देव की उपासना करते है । ये रुद्रदेव जीवन मैं सुगन्धि एवं पुष्टि तथा संरक्षक सत्ता का प्रत्यक्ष बोध कराने वाले हैं । जिस प्रकार पका हुआ फल स्वयं ही डण्ठल से अलग होकर अमृत वन जाता है , उसी प्रकार हम भी मृत्यु के भय सै मुक्त हो ; किन्तु अमृतत्व से दूर न हो , साथ ही भववन्धन से मुक्त हो जाये परन्तु ; अविनाशी सुख सै नहीं ।।हिन्दू समाज में मान्यता है कि वेद में उसी शिव का वर्णन है जिसके नाम पर अनेक पौराणिक कथाओं का सृजन हुआ है। उन्हीं शिव की पूजा-उपासना वैदिक काल से आज तक चली आती है। किन्तु वेद के मर्मज्ञ इस विचार से सहमत नहीं हैं।उनके अनुसार वेद तथा उपनिषदों का शिव निराकार ब्रह्म है।पुराणों में वर्णित शिव जी परम योगी और परम ईश्वरभक्त थे। वे एक निराकार ईश्वर "ओ३म्" की उपासना करते थे। कैलाशपति शिव वीतरागी महान राजा थे। उनकी राजधानी कैलाश थी और तिब्बत का पठार और हिमालय के वे शासक थे। हरिद्वार से उनकी सीमा आरम्भ होती थी। वे राजा होकर भी अत्यंत वैरागी थे। उनकी पत्नी का नाम पार्वती था जो राजा दक्ष की कन्या थी। उनकी पत्नी ने भी गौरीकुंड, उत्तराखंड में रहकर तपस्या की थी। उनके पुत्रों का नाम गणपति और कार्तिकेय था। उनके राज्य में सब कोई सुखी था। उनका राज्य इतना लोकप्रिय हुआ कि उन्हें कालांतर में साक्षात् ईश्वर के नाम शिव से उनकी तुलना की जाने लगी।वेदों के शिव--हम प्रतिदिन अपनी सन्ध्या उपासना के अन्तर्गत नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नम: शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च(यजु० १६/४१)के द्वारा परम पिता का स्मरण करते हैं।अर्थ- जो मनुष्य सुख को प्राप्त कराने हारे परमेश्वर और सुखप्राप्ति के हेतु विद्वान् का भी सत्कार कल्याण करने और सब प्राणियों को सुख पहुंचाने वाले का भी सत्कार मङ्गलकारी और अत्यन्त मङ्गलस्वरूप पुरुष का भी सत्कार करते हैं,वे कल्याण को प्राप्त होते हैं।इस मन्त्र में शंभव, मयोभव, शंकर, मयस्कर, शिव, शिवतर शब्द आये हैं जो एक ही परमात्मा के विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुए हैं।वेदों में ईश्वर को उनके गुणों और कर्मों के अनुसार बताया है--त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।-यजु० ३/६०विविध ज्ञान भण्डार, विद्यात्रयी के आगार, सुरक्षित आत्मबल के वर्धक परमात्मा का यजन करें। जिस प्रकार पक जाने पर खरबूजा अपने डण्ठल से स्वतः ही अलग हो जाता है वैसे ही हम इस मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो जायें, मोक्ष से न छूटें।या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी।तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि।।-यजु० १६/२हे मेघ वा सत्य उपदेश से सुख पहुंचाने वाले दुष्टों को भय और श्रेष्ठों के लिए सुखकारी शिक्षक विद्वन्! जो आप की घोर उपद्रव से रहित सत्य धर्मों को प्रकाशित करने हारी कल्याणकारिणी देह वा विस्तृत उपदेश रूप नीति है उस अत्यन्त सुख प्राप्त करने वाली देह वा विस्तृत उपदेश की नीति से हम लोगों को आप सब ओर से शीघ्र शिक्षा कीजिये।अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमो दैव्यो भिषक्।अहीँश्च सर्वाञ्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्योऽधराची: परा सुव।।-यजु० १६/५हे रुद्र रोगनाशक वैद्य! जो मुख्य विद्वानों में प्रसिद्ध सबसे उत्तम कक्षा के वैद्यकशास्त्र को पढ़ाने तथा निदान आदि को जान के रोगों को निवृत्त करनेवाले आप सब सर्प के तुल्य प्राणान्त करनेहारे रोगों को निश्चय से ओषधियों से हटाते हुए अधिक उपदेश करें सो आप जो सब नीच गति को पहुंचाने वाली रोगकारिणी ओषधि वा व्यभिचारिणी स्त्रियां हैं, उनको दूर कीजिये।या ते रुद्र शिवा तनू: शिवा विश्वाहा भेषजी।शिवा रुतस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे।।यजु० १६/४९हे राजा के वैद्य तू जो तेरी कल्याण करने वाली देह वा विस्तारयुक्त नीति देखने में प्रिय ओषधियों के तुल्य रोगनाशक और रोगी को सुखदायी पीड़ा हरने वाली है उससे जीने के लिए सब दिन हम को सुख कर।उपनिषदों में भी शिव की महिमा निम्न प्रकार से है-स ब्रह्मा स विष्णु: स रुद्रस्स: शिवस्सोऽक्षरस्स: परम: स्वराट्।स इन्द्रस्स: कालाग्निस्स चन्द्रमा:।।-कैवल्यो० १/८वह जगत् का निर्माता, पालनकर्ता, दण्ड देने वाला, कल्याण करने वाला, विनाश को न प्राप्त होने वाला, सर्वोपरि, शासक, ऐश्वर्यवान्, काल का भी काल, शान्ति और प्रकाश देने वाला है।प्रपंचोपशमं शान्तं शिवमद्वैतम् चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः।।७।।-माण्डूक्य०प्रपंच जाग्रतादि अवस्थायें जहां शान्त हो जाती हैं, शान्त आनन्दमय अतुलनीय चौथा तुरीयपाद मानते हैं वह आत्मा है और जानने के योग्य है।यहां शिव का अर्थ शान्त और आनन्दमय के रूप में देखा जा सकता है।सर्वाननशिरोग्रीव: सर्वभूतगुहाशय:।सर्वव्यापी स भगवान् तस्मात्सर्वगत: शिव:।।-श्वेता० ४/१४जो इस संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का कर्ता एक ही है, जो सब प्राणियों के हृदयाकाश में विराजमान है, जो सर्वव्यापक है, वही सुखस्वरूप भगवान् शिव सर्वगत अर्थात् सर्वत्र प्राप्त है।इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है-सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य सृष्टारमनेकरुपम्।विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति।।-श्वेता० ४/१४परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म है, हृदय के मध्य में विराजमान है, अखिल विश्व की रचना अनेक रूपों में करता है। वह अकेला अनन्त विश्व में सब ओर व्याप्त है। उसी कल्याणकारी परमेश्वर को जानने पर स्थाई रूप से मानव परम शान्ति को प्राप्त होता है।नचेशिता नैव च तस्य लिंङ्गम्।।-श्वेता० ६/१उस शिव का कोई नियन्ता नहीं और न उसका कोई लिंग वा निशान है।योगदर्शन में परमात्मा की प्रतीति इस प्रकार की गई है-क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:।। १/१/२४जो अविद्यादि क्लेश, कुशल, अकुशल, इष्ट, अनिष्ट और मिश्र फलदायक कर्मों की वासना से रहित है, वह सब जीवों से विशेष ईश्वर कहाता है।स एष पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात्।। १/१/२६वह ईश्वर प्राचीन गुरुओं का भी गुरु है। उसमें भूत भविष्यत् और वर्तमान काल का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है,क्योंकि वह अजर, अमर नित्य है।महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने भी अपने पुस्तक सत्यार्थप्रकाश में निराकार शिवादि नामों की व्याख्या इस प्रकार की है--(रुदिर् अश्रुविमोचने) इस धातु से 'णिच्' प्रत्यय होने से 'रुद्र' शब्द सिद्ध होता है।'यो रोदयत्यन्यायकारिणो जनान् स रुद्र:' जो दुष्ट कर्म करनेहारों को रुलाता है, इससे परमेश्वर का नाम 'रुद्र' है।यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति, यद्वाचा वदति तत् कर्मणा करोति यत् कर्मणा करोति तदभिसम्पद्यते।।यह यजुर्वेद के ब्राह्मण का वचन है।जीव जिस का मन से ध्यान करता उस को वाणी से बोलता, जिस को वाणी जे बोलता उस को कर्म से करता, जिस को कर्म से करता उसी को प्राप्त होता है। इस से क्या सिद्ध हुआ कि जो जीव जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है। जब दुष्ट कर्म करनेवाले जीव ईश्वर की न्यायरूपी व्यवस्था से दुःखरूप फल पाते, तब रोते हैं और इसी प्रकार ईश्वर उन को रुलाता है, इसलिए परमेश्वर का नाम 'रुद्र' है।(डुकृञ् करणे) 'शम्' पूर्वक इस धातु से 'शङ्कर' शब्द सिद्ध हुआ है। 'य: शङ्कल्याणं सुखं करोति स शङ्कर:' जो कल्याण अर्थात् सुख का करनेहारा है, इससे उस ईश्वर का नाम 'शङ्कर' है।'महत्' शब्द पूर्वक 'देव' शब्द से 'महादेव' शब्द सिद्ध होता है। 'यो महतां देव: स महादेव:' जो महान् देवों का देव अर्थात् विद्वानों का भी विद्वान्, सूर्यादि पदार्थों का प्रकाशक है, इस लिए उस परमात्मा का नाम 'महादेव' है।(शिवु कल्याणे) इस धातु से 'शिव' शब्द सिद्ध होता है। 'बहुलमेतन्निदर्शनम्।' इससे शिवु धातु माना जाता है, जो कल्याणस्वरूप और कल्याण करनेहारा है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम 'शिव' है।निष्कर्ष- उपरोक्त लेख द्वारा योगी शिव और निराकार शिव में अन्तर बतलाया है। ईश्वर के अनगिनत गुण होने के कारण अनगिनत नाम है। शिव भी इसी प्रकार से ईश्वर का एक नाम है। आईये निराकार शिव की स्तुति, प्रार्थना एवं उपासना करे।ॐ नमः शिवायः 🙏🏻🙏🏻

।। श्रीहरिः ।।

दुर्गतिसे बचो 

 प्रश्न‒भूत-प्रेतोंको कीलित करनेवाले तान्त्रिक तो उनके कर्मोंका फल भुगतानेमें सहायक ही बनते हैं, तो फिर उनको पाप क्यों लगता है ?

उत्तर‒वे जिनको कीलित कर देते हैं, जमीनमें गाड़ देते हैं, उन भूत-प्रेतोंका तो यह कर्मफल-भोग है, पर उनको कीलित करनेवालोंका यह नया पाप-कर्म है, जिसका दण्ड उनको आगे मिलेगा । जैसे, कोई जानवरको मारता है तो जानवर अपनी मृत्यु आनेसे ही मरता है । उसकी मृत्यु आये बिना उसको कोई मार ही नहीं सकता । परन्तु उसको मारनेवाला नया पाप करता है; क्योंकि वह लोभ, कामना,स्वार्थ आदिको लेकर ही उसको मारता है । जब कामना आदिको लेकर किया हुआ शुभ कर्म भी बन्धनका कारण बन जाता है तो फिर जो कामना आदिको लेकर अशुभ कर्म करता है, वह तो पापसे बँधेगा ही ।

तात्पर्य है कि किसीको दुःख देना, तंग करना, मारना आदि मनुष्यका कर्तव्य नहीं है, प्रत्युत अकर्तव्य है । अकर्तव्यमें मनुष्य कामनाको लेकर ही प्रवृत्त होता है (३ । ३७) । अतः मनुष्यको कामना, स्वार्थ आदिका त्याग करके सबके हितके लिये ही उद्योग करते रहना चाहिये ।

प्रश्न‒जिन भूत-प्रेतोंको बोतलमें बंद कर दिया गया है, कीलित कर दिया गया है, वे कबतक वहाँ जकड़े रहते हैं ?

उत्तर‒मन्त्रोंकी शक्तिकी भी एक सीमा होती है, उम्र होती है । उम्र पूरी होनेपर जब मन्त्रोंकी शक्ति समाप्त हो जाती है अथवा प्रेतयोनिकी अवधि (उम्र) पूरी हो जाती है,तब वे भूत-प्रेत वहाँसे छूट जाते हैं । अगर उनकी उम्र बाकी रहनेपर भी कोई अनजानमें कील निकाल दे, जमीनको खोदते समय बोतल फूट जाय, पेड़के गिरनेसे बोतल फूट जाय तो वे भूत-प्रेत वहाँसे छूट जाते हैं और अपने स्वभावके अनुसार पुनः दूसरोंको दुःख देने लग जाते हैं ।

प्रश्न‒अगर कोई पेड़में गड़ी हुई कीलको निकाल दे,जमीनमें गड़ी हुई बोतलको फोड़ दे तो उसमें बन्द भूत-प्रेत उसको पकड़ेंगे तो नहीं ?

उत्तर‒वहाँसे छूटनेपर भूत-प्रेत उसको पकड़ सकते हैं; अतः हरेक आदमीको ऐसा काम नहीं करना चाहिये । जो भगवान्‌ के परायण हैं, जिनको भगवान्‌ का सहारा है,हनुमान्‌ जी का सहारा है, वे अगर भूत-प्रेतोंको वहाँसे मुक्त कर दें तो भूत-प्रेत उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते, प्रत्युत उनके दर्शनसे उन भूत-प्रेतोंका उद्धार हो जाता है । सन्त-महापुरुषोंने बहुत-से भूत-प्रेतोंका उद्धार किया है ।
हरिहर 
१. शब्दार्थ- समान्यतः विष्णु को हरि और शिव को हर कहते हैं। शिव का स्मरण ’हर हर महादेव’ से होता है। प्रायः युद्ध में अन्तिम आक्रमण के समय ’हर हर महादेव’ कहते हैं, जब मरने या मारने की स्थिति होती है। लोक भाषा में जगत् और विश्व का एक ही अर्थ है, पर पुराण की वैज्ञानिक भाषा में विष्णु को जगन्नाथ और शिव को विश्वनाथ कहते हैं। दोनों में कुछ एकत्व है जैसा स्कन्दोपनोषद् में कहा गया है-
शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे। शिवस्य हृदयं विष्णुः, विष्णोश्च हृदयं शिवः॥८॥
यथा शिवमयो विष्णुः, एवं विष्णुमयं शिवः। यथान्तरं न पश्यामि तथा मे स्वस्तिरायुषि॥९॥ 
भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है-
रुद्रो नारायणश्चैव सत्त्वमेकं द्विधा कृतम्। लोके चरति कौन्तेय व्यक्तिस्थं सर्वकर्मसु॥
(महाभारत, शान्ति पर्व, ३४१/२७)
भगवान् श्री राम ने भी सेतुबन्ध के बाद रामेश्वर शिवलिङ्ग की स्थापना कर्र कहा था-
शिवद्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहु मोहि न भावा॥७॥
शंकर विमुख भगति चह मोरी। सो नर नारकी मूढ़ मति थोरी॥८॥
(रामचरितमानस, लंका काण्ड, २/७-८)
सामान्यतः विष्णु क्रिया रूप और शिव ज्ञान रूप हैं।
हरिहर शब्द का अर्थ विष्णु और शिव का मिलन है। विष्णु के मोहिनी रूप से शिव को सन्तान हुई थी जिसकी केरल में अयप्पा के नाम से पूजा होती है।
२. गायत्री मन्त्र का खण्ड- एकमूर्तिस्त्रयो देवाः, ब्रह्मविष्णु महेश्वराः। त्रयाणामन्तरं नास्ति गुणभेदाः प्रकीर्तिताः॥ 
(स्कन्द पुराण ५ अवन्ती खण्ड, रेवा खण्ड १४६/११६, पद्म पुराण, २ भूमि खण्ड, ७१/२१) 
गायत्री मन्त्र के ३ पाद ब्रह्म के ३ रूप वर्णन करते हैं-
प्रथम पाद स्रष्टा रूप ब्रह्मा- तत् सवितुर्वरेण्यम्।
द्वितीय पाद क्रिया रूप विष्णु-भर्गो देवस्य धीमहि।
तृतीय पाद ज्ञान रूप शिव-धियो यो नः प्रचोदयात्।
३. हरि, हर-(१) अर्थ-कोष में व्याकरण के अनुसार दोनों शब्दों की एक ही व्युत्पत्ति दी गयी है-जो पापों का हरण करे। अन्तर देखने के लिए वैदिक परिभाषा देखनी पड़ेगी। वेद में प्राण या उसके प्रकाश रूप को हरि कहा है।
प्राणो वै हरिः, स हि हरति (कौषीतकि ब्राह्मण, १७/१)
यहां हरण अर्थ में भी हरि का प्रयोग है।
ऊर्जा का एक रूप किरण है; इस अर्थ में हरि का प्रयोग है-
इन्द्रो मायाभिः पुरु-रूप ईयते, युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश (ऋक्, ६/४७/१८)
= इन्द्र बिना रूप का प्रकाश रूप तेज है, वह माया (आवरण) द्वारा अनेक प्रकार के पुरु रूप में चलता है। पुर का अर्थ रचना है, पुरु उसका क्रिया रूप है। हरयः शतादश = सहस्र किरण।
वेद में शिव के लिए प्रायः रुद्र शब्द है। उसके शान्त रूप को शिव कहा है। 
घोरो वै रुद्रः (कौषीतकि ब्राह्मण, १६/७)
या ते रुद्र शिवा तनूः अघोरा पापकाशिनी॥ (वाज.यजु, १६/२, ४९, श्वेताश्वतर उपनिषद्, ३/५ आदि)
शिव इति शमयन्ति एव एनं (अग्निम्), एतद् अहिंसायै, तथो हैष (अग्निः) इमान् लोकान् शान्तो न हिनस्ति (शतपथ ब्राह्मण, ६/७/३/१५)-वाज. यजु (१२/१७) में शिव का अर्थ।
सूर्य से किरण या कण निकलना उसका रुदन है।
(२) सौर मण्डल के सन्दर्भ में-
सूर्य पिण्ड = अग्नि (पदार्थ पिण्ड)। किरणों का प्रसार = इन्द्र। उनकी ऊर्जा या प्राण = हरि। तेज का अनुभव = हर, रुद्र।
चन्द्र कक्षा तक का क्षेत्र = १०० सूर्य व्यास तक ताप क्षेत्र = रुद्र।
चन्द्र कक्षा केन्द्र में पृथ्वी से शिव क्षेत्र का आरम्भ। इस अर्थ में शिव के ललाट पर चन्द्र है। 
शनि कक्षा तक शिवतर क्षेत्र = १००० सूर्य व्यास तक।
उसके बाहर शिवतम क्षेत्र सौर मण्डल सीमा तक।
सौर मण्डल के बाहर महः लोक में महादेव रूप, महिष सोम।
जनः लोक (ब्रह्माण्ड या गैलेक्सी) में सदाशिव रूप। उसके अप् में शब्द होने से अम्भ होता है, जन्म स्थान होने से अम्ब। ३ पृथिवी (पृथ्वी ग्रह, सौर मण्डळ का आकर्षण क्षेत्र, ब्रह्माण्ड) ३ अम्ब हैं। उसके साथ साम्ब-सदाशिव रूप है।
नमः शिवाय च शिवतराय च (वाजसनेयी सं. १६/४१, तैत्तिरीय सं. ४/५/८/१, मैत्रायणी सं. २/९/७)
यो वः शिवतमो रसः, तस्य भाजयतेह नः। (अघमर्षण मन्त्र, वाजसनेयी सं., ११/५१)
सदाशिवाय विद्महे, सहस्राक्षाय धीमहि तन्नो साम्बः प्रचोदयात्। (वनदुर्गा उपनिषद्, १४१)
आापो वा अम्बयः । (कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद्, १२/२)
अयं वै लोकोऽम्भांसि (तैत्तिरीय ब्राह्मण, ३/८/१८/१)
शत योजने ह वा एष (आदित्य) इतस्तपति (कौषीतकि ब्राह्मण उपनिषद्, ८/३) 
स एष (आदित्यः) एक शतविधस्तस्य रश्मयः । शतविधा एष एवैक शततमो य एष तपति (शतपथ ब्राह्मण, १०/२/४/३) 
युक्ता ह्यस्य (इन्द्रस्य) हरयः शतादशेति । सहस्रं हैत आदित्यस्य रश्मयः (इन्द्रः=आदित्यः) जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण, १/४४/५)
असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमङ्गलः । ये चैनं रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रोऽवैषां हेड ईमहे ॥ (वा.यजु.१६/६) 
महत् तत् सोमो महिषः चकार (ऋक्, ९/९७/४१, सामवेद, १/५४२, २/६०५)
ब्रह्माण्ड के बाहर अनन्त आकाश में परमेश्वर रूप जिसके सङ्कल्प से सृष्टि का आरम्भ।
सूर्य अपने आकर्षण से पृथ्वी आदि ग्रहों को कक्षा में बान्ध कर रखता है। यह सुप्त रूप विष्णु है। उसकी किरण ऊर्जा हरि से पृथ्वी पर जीवन चल रहा है, यह जगन्नाथ या जाग्रत रूप है।
(३) पृथ्वी पर-वेद संहिता संकलन के लिए स्वायम्भुव मनु से कृष्ण द्वैपायन तक २८ व्यास हुए हैं। उनको ज्ञान रूप शिव का अवतार कहा गया है (कूर्म पुराण, अध्याय, १/५२, शिव पुराण, अध्याय, ३/४-५)। असुरों को पराजित कर धर्म स्थापना करने वालों को विष्णु का अवतार कहा गया है। (गीता, ४/७)।
(४) मनुष्य शरीर-शरीर का आवरण रूप लिङ्ग है (लिङ्ग शरीर)-
सूक्ष्मशरीराणि सप्तदशावयवानि लिङ्गशरीराणि । अवय वास्तु ज्ञानेन्द्रियपञ्चकं बुद्धिमनसी कर्मेन्द्रियपञ्चकं चायुपञ्चकं चेति । ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणाख्यानि। (वेदान्त सार, खण्ड १३)।
इसमें ११ इन्द्रियां रुद्र हैं (५ कर्मेन्द्रिय, ५ ज्ञानेन्द्रिय, उभयात्मक मन)। इनमें मन को शिव कहा गया है। इनके रूप १० प्राण और आत्मा हैं।
कतमे रूद्रा इति, दशेमे पुरुषे प्राणा, आत्मा एकादशः, ते यद् यस्मात् मर्त्यात् शरीरात् उत्क्रामन्ति, अथ रोदयन्ति। तद् यद् रोदयन्ति, तस्मात् रुद्रा, इति। (माध्य. शतपथ ब्राह्मण, १/६/३/७, बृहदारण्यक उपनिषद्, ३/९/४)
दश पुरुषे प्राणा, इति ह उवाच। आत्मा एकादशः। ते यत् उत्क्रामन्तः यन्ति अथ रोदयन्ति। तस्मात् रुद्राः, इति। (जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण, २/७७)
४. शिव, विष्णु-विष्णु -वेवेष्टि इति विष्णुः-सर्वत्र व्याप्त है, अतः विष्णु।
शिव-शेरते अस्मिन् सर्वे, इति शिवः-सब कुछ इसी में है।
बाह्य आवरण शिव है, केन्द्र में क्रिया का सञ्चालक विष्णु है। विष्णु क्रिया रूप में यज्ञ है-विष्णुः वै यज्ञः (ऐतरेय ब्राह्मण, १/३३) 
बाह्य आवरण लिङ्ग है। लीनं + गमयति = लिंग। ३ प्रकार के लिंग हैं-
मूल स्वरूप लिङ्गत्वान्मूलमन्त्र इति स्मृतः । सूक्ष्मत्वात्कारणत्वाच्च लयनाद् गमनादपि । 
लक्षणात्परमेशस्य लिङ्गमित्यभिधीयते ॥ (योगशिखोपनिषद्, २/९, १०)
(क) स्वयम्भू लिङ्ग-लीनं गमयति यस्मिन् मूल स्वरूपे। जिस मूल स्वरूप में वस्तु लीन होती है तथा उसी से पुनः उत्पन्न होती है, वह स्वयम्भू लिंग है। यह एक ही है। 
(ख) बाण लिंग-लीनं गमयति यस्मिन् दिशायाम्-जिस दिशा में गति है वह बाण लिंग है। बाण चिह्न द्वारा गति की दिशा भी दिखाते हैं। ३ आयाम का आकाश है, अतः बाण लिंग ३ हैं। 
(ग) इतर लिंग-लीनं गमयति यस्मिन् बाह्य स्वरूपे-जिस बाहरी रूप या आवरण में वस्तु है वह इतर (other) लिंग है। यह अनन्त प्रकार का है, पर १२ मास में सूर्य की १२ प्रकार की ज्योति के अनुसार १२ ज्योतिर्लिंग हैं। 
भाषा भी लिङ्ग (Lingua, Language) है, जिससे हमारे आन्तरिक विचार दीखते हैं।
एषः प्रजापतिर्यद् हृदयमेतद् ब्रह्मैतत् सर्वम्। तदेतत् त्र्यक्षरं हृदयमिति हृ इत्येकमक्षरमभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद। द इत्येकमक्षरं ददन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद। यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोकं य एवं वेद॥ (शतपथ ब्राह्मण १४/८४/१, बृहदारण्यक उपनिषद् ५/३/१) = यह हृदय ही प्रजापति है, तथा ब्रह्म और सर्व है । इसमें ३ अक्षर हैं। एक हृ है जिसमें अपना और अन्य का आहरण होता है। एक ’द’ है जो अपना और अन्य का देता है । एक ’यम्’ है जिसे जानने से स्वर्ग लोक को जाता है।
५. ग्रन्थि भेद-मूलाधार और स्वाधिष्ठान में पृथिवी और जल की ब्रह्म ग्रन्थि है। मणिपूर के ऊपर अग्नि और सूर्यमण्डलों में विष्णु ग्रन्थि है। आज्ञाचक्र के नीचे वायु और आकाश में रुद्र ग्रन्थि है।
योगशिखोपनिषद्, अध्याय १-
प्रविशेच्चन्द्र तुण्डे तु सुषुम्नावदनान्तरे। वायुना वह्निना सार्धं ब्रह्मग्रन्थिं भिनत्ति सा॥८६॥
विष्णु ग्रन्थिं ततो भित्त्वा रुद्रग्रन्थौ च तिष्ठति। ततस्तु कुम्भकैर्गाढं पूरयित्वा पुनः पुनः॥८७॥
३ ग्रन्थियों के भेदन में सहायक ३ बन्ध हैं-मूल बन्ध (मूलाधार), उड्डीयान बन्ध (मणिपूर) और जालन्धर बन्ध (विशुद्धि)। योगशिखोपनिषद्, अध्याय १-
प्रथम् मूलबन्धस्तु द्वितीयोड्डीयानाभिधः। जालन्धरस्तृतीयस्तु लक्षणं कथयाम्यहम्॥१०३॥
कुर्यादनन्तरं बस्त्रीं कुण्डलीमाशु बोधयेत्। भिद्यन्ते ग्रन्थयो वंशे तप्तलोह शलाकया॥११३॥
चण्डी पाठ की साधन समर व्याख्या में उसके ३ चरित्रों को ३ ग्रन्थिभेद कहा गया है। विस्तार के लिये वहीं देखें।
मुण्डकोपनिषद् के भी ३ मुण्डक भी ३ ग्रन्थिभेद हैं-
(१/१/८)-तपसा चीयते ब्रह्म ततो ऽन्नमभिजायते। अन्नात् प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम्॥
(२/२/८)-भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
(३/२/९)-स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित् कुले भवति। तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहा-ग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति॥
६. हरिहर क्षेत्र- लोकभाषाओं के सन्धि क्षेत्रों के नाम हरिहर क्षेत्र हैं। उत्तर पूर्व में काशी में शिव-यज्ञ सम्बन्धी शब्द हैं, मिथिला में कृषि (अथर्व वेद के दर्भ सूक्त तथा कृषिसूक्त) तथा शक्ति के शब्द हैं। मगध में विष्णु (विष्णुपद क्षेत्र गया) के शब्द हैं। इन भाषाओं का सन्धि स्थल हरिहर क्षेत्र है। पश्चिम ओड़िशा का नरसिंह क्षेत्र या हरिशंकर तीर्थ ओड़िया, छत्तीसगढ़ी, तेलुगु का समन्वय है। कर्णाटक का हरिहर क्षेत्र ५ भाषाओं का केन्द्र है-केरल में हरिहर पुत्र अयप्पा (बाइबिल का इयापेन Eapen), महाराष्ट्र के गणेश, आन्ध्र का वराह, तमिलनाडु का सुब्रह्मण्य (कार्त्तिकेय), कर्णाटक का शारदा।
🚩 हमारी एडमिन टीम की ओर से पवित्र श्रावण मास की हार्दिक शुभकामनाएँ 🚩

शिव पञ्चाक्षर स्तोत्रम्

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय । 
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै ‘न’काराय नमः शिवाय ॥१॥ 
मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय । 
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै ‘म’काराय नमः शिवाय ॥२॥ 
शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै ‘शि’काराय नमः शिवाय ॥३॥ 
वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै ‘व’काराय नमः शिवाय ॥४॥ 
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै ‘य’काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ । 
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥६॥

भावार्थ: जिनके कंठ में साँपों का हार है,जिनके तीन नेत्र हैं, भस्म ही जिनका अंगराग(अनुलेपन) है;दिशाएँ ही जिनका वस्त्र है [अर्थात् जो नग्न हैं] , उन शुद्ध अविनाशी महेश्वर ‘न’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है || गंगाजल और चन्दन से जिनकी अर्चना हुई है, मंदार पुष्प तथा अन्यान्य कुसुमों से जिनकी सुन्दर पूजा हुई है, उन नंदी के अधिपति प्रथमगणों के स्वामी महेश्वर ‘म’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है || जो कल्याणस्वरूप हैं, पार्वती के मुखकमल को विकसित(प्रसन्न) करने के लिए जो सूर्यस्वरूप हैं,जो दक्ष के यज्ञ का नाश करने वाले हैं.जिनकी ध्वजा में बैल का चिन्ह है, उन शोभाशाली नीलकंठ ‘शि’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है || वसिष्ठ,अगस्त्य,और गौतम आदि श्रेष्ठ मुनियों ने तथा इन्द्रादि देवताओं ने जिनके मस्तक की पूजा की है, चन्द्रमा,सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं, उन ‘व’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है || जिन्होंने यक्षरूप धारण किया है, जो जटाधारी हैं, जिनके हाथ में पिनाक है. जो दिव्य सनातनपुरुष हैं,उन दिगंबर देव ‘य’कारस्वरूप शिव को नमस्कार है || जो शिव के समीप इस शिवपञ्चाक्षर- स्तोत्र का पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है और वहाँ शिवजी के साथ आनंदित होता है ||

Monday, June 17, 2024

निर्जला एकादशी कथा महात्म्य -साल की सभी चौबीस एकादशियों में से निर्जला एकादशी सबसे अधिक महत्वपूर्ण एकादशी है। बिना पानी के व्रत को निर्जला व्रत कहते हैं और निर्जला एकादशी का उपवास किसी भी प्रकार के भोजन और पानी के बिना किया जाता है। उपवास के कठोर नियमों के कारण सभी एकादशी व्रतों में निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन होता है। निर्जला एकादशी व्रत को करते समय श्रद्धालु लोग भोजन ही नहीं बल्कि पानी भी ग्रहण नहीं करते हैं।जो श्रद्धालु साल की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं है उन्हें केवल निर्जला एकादशी उपवास करना चाहिए क्योंकि निर्जला एकादशी उपवास करने से दूसरी सभी एकादशियों का लाभ मिल जाता हैं।निर्जला एकादशी का व्रत अत्यन्त संयम साध्य है। इस युग में यह व्रत सम्पूर्ण सुख़ भोग और अन्त में मोक्ष कहा गया है।ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाता है। अंग्रेजी माह के अनुसार इस वर्ष 2024 में यह व्रत 18 जून को मंगलवार के दिन रखा जाएगा। निर्जला एकादशी व्रत कथा -युधिष्ठिर ने कहा: जनार्दन! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये।भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन्! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवती नन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं|तब वेदव्यासजी कहने लगे: कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है। द्वादशी के दिन स्नान करके पवित्र हो और फूलों से भगवान केशव की पूजा करे। फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे।यह सुनकर भीमसेन बोले: परम बुद्धिमान पितामह! मेरी उत्तम बात सुनिये। राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव, ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि भीमसेन एकादशी को तुम भी न खाया करो परन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी।भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा: यदि तुम नरक को दूषित समझते हो और तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और तो दोनों पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन नहीं करना।भीमसेन बोले महाबुद्धिमान पितामह! मैं आपके सामने सच कहता हूँ। मुझसे एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं किया जा सकता, तो फिर उपवास करके मैं कैसे रह सकता हूँ। मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है।...इसलिए महामुनि! मैं पूरे वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ। जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये। मैं उसका यथोचित रूप से पालन करुँगा।व्यासजी ने कहा: भीम! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो। केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है।एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है। तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करें। इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे।वर्षभर में जितनी एकादशियाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है।एकादशी व्रत करने वाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते। अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाव वाले, हाथ में सुदर्शन धारण करने वाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आख़िर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं।अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो। स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है। जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है। उसे एक-एक प्रहर में कोटि-कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है।मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है। निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है। इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है।जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे। जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं।कुन्तीनन्दन! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है।...पर्याप्त दक्षिणा और भाँति-भाँति के मिष्ठानों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए। ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं। जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस निर्जला एकादशी का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है।...निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए। जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है। चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है।...पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि मैं भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा। द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे।संसारसागर से तारने वाले हे देव ह्रषीकेश! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये।भीमसेन! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए। उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है।तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है। यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया। तबसे यह लोक में पाण्डव द्वादशी के नाम से विख्यात हुई। निर्जला एकादशी शुभ मुहूर्त :-एकादशी तिथि का प्रारम्भ 17 जून 2024 को सुबह के 04 बजकर 43 मिनट पर पर होगाऔरइसका समापन 18 जून को सुबह 06 बजकर 24 मिनट पर होगा।इसका पारण समय 19 जून को सुबह 05:24 से 07:28 तक रहेगा। निर्जल एकादशी की 10 प्रमुख बातें :- 1. ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी के अलावा भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। भीमसेनी एकादशी और कुछ अंचलों में पांडव एकादशी पड़ा। कुछ ग्रंथों में माघ शुक्ल एकादशी व कार्तिक शुक्ल एकादशी को भी भीमसेनी एकादशी का नाम दिया गया है, परंतु ज्यादातर विद्वान निर्जला एकादशी को ही भीमसेनी एकादशी के रूप में स्वीकार करते हैं। 2. शास्त्रों में उल्लेखों के अनुसार मान्यता है कि पांडव पुत्र भीम के लिए कोई भी व्रत करना कठिन था, क्योंकि उनकी उदराग्नि कुछ ज्यादा प्रज्वलित थी और भूखे रहना उनके लिए संभव न था। मन से वे भी एकादशी व्रत करना चाहते थे। इस संबंध में भीम ने वेद व्यास व भीष्म पितामह से मार्गदर्शन लिया। दोनों ने ही भीम को आश्वस्त किया कि यदि वे वर्ष में सिर्फ निर्जला एकादशी का व्रत ही कर लें तो उन्हें सभी चौबीस एकादशियों (यदि अधिक मास हो तो छब्बीस) का फल मिलेगा। इसके पश्चात भीम ने सदैव निर्जला एकादशी का व्रत किया। 3. पद्मपुराण में निर्जला एकादशी व्रत द्वारा मनोरथ सिद्ध होने की बात कही गई है। 4. निर्जला का अर्थ निराहार और निर्जल रहकर व्रत करना है। इस दिन व्रती को अन्न तो क्या, जलग्रहण करना भी वर्जित है। यानी यह व्रत निर्जला और निराहार ही होता है। शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि संध्योपासना के लिए आचमन में जो जल लिया जाता है, उसे ग्रहण करने की अनुमति है। 5. निर्जला एकादशी व्रत पौराणिक युगीन ऋषि-मुनियों द्वारा पंचतत्व के एक प्रमुख तत्व जल की महत्ता को निर्धारित करता है। पंचत्वों की साधना को योग दर्शन में गंभीरता से बताया गया है। अतः साधक जब पांचों तत्वों को अपने अनुकूल कर लेता है तो उसे न तो शारीरिक कष्ट होते हैं और न ही मानसिक पीड़ा। 6. इस एकादशी के व्रत को विधिपूर्वक करने से सभी एकादशियों के व्रत का फल मिलता है। 7. सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही नहीं अपितु दूसरे दिन द्वादशी प्रारंभ होने के बाद ही व्रत का पारायण किया जाता है। अतः पूरे एक दिन एक रात तक बिना पानी के रहना ही इस व्रत की खासियत है और वह भी इतनी भीषण गर्मी में। 8. निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। निर्जला एकादशी को जल एवं गौ दान करना सौभाग्य की बात मानते थे। इसीलिए आज भी जो लोग गौ दान नहीं कर पाते हैं वे इस समय जलपान जरूर कराते हैं। ज्येष्ठ माह वैसे भी तपता है तो भी जगह प्याऊ लगान और लोगों को पानी पिलाना पुण्य का कार्य है। इस दिन जल में वास करने वाले भगवान श्रीमन्नारायण विष्णु की पूजा के उपरांत दान-पुण्य के कार्य कर समाज सेवा की जाती रही। इसके अलावा लोग ग्रीष्म ऋतु में पैदा होने वाले फल, सब्जियां, पानी की सुराही, हाथ का पंखा आदि का दान करते हैं। 9. इस दिन प्रात:काल उठकर स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें। पूजाघर में धूप दीप जलाएं। इसके बाद भगवान विष्णु का गंगाजल से अभिषेक करें और उन्हें पुष्प एवं तुलसी के पत्ते अर्पित करने के बाद व्रत का संकल्प लें। संकल्प के बाद उनकी और माता लक्ष्मी की आरती करके उन्हें भोग लगाएं। पूजा एवं आरती के बाद जब तक व्रत चलता है तब तक भगवान विष्णु का भजन और ध्यान करें। 10. अपनी सामर्थ के अनुसार अन्न, वस्त्र, जल, जूता, छाता, फल आदि का दान करें। यह नहीं कर सकते हैं तो कम से कम इस दिन जल कलश में जल भरकर उसे सफेद वस्त्र से ढंककर चीनी और दक्षिणा के साथ किसी ब्राह्मण को दान जरूर करें जिससे साल भर की सभी एकादशियों का फल प्राप्त होता है।।। आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो ।। 🙏 धन्यवाद 🙏

Friday, March 8, 2024

महाशिवरात्रि के परम पावन पर्व पर 
आप सभी को हमारी एडमिन टीम की ओर से 
बहुत बहुत हार्दिक शुभ कामनाएं  !
भगवान् शंकर सभी पर अपनी महती कृपा बनाए रखे  !!

रुद्राष्टकम्

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरुपं।।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।।1।।
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।।
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं।।2।।
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा।।3।।
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।।
मृगाधीशचरमाम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।4।।
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।।5।।
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।।
चिदानंद संदोह मोहापहारी। प्रसीद पसीद प्रभो मन्मथारी।।6।।
न यावद् उमानाथ पादारविन्द। भजंतीह लोके परे वा नराणां।।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।7।।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं।।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।।8।।

श्लोक:- रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।9।।

Monday, March 4, 2024

((( हनुमान चालीसा में छिपे मैनेजमेंट के सूत्र)))

कई लोगों की दिनचर्या हनुमान चालीसा पढ़ने से शुरू होती है।
पर क्या आप जानते हैं कि श्री हनुमान चालीसा में 40 चौपाइयाँ हैं,
ये उस क्रम में लिखी गई हैं जो एक आम आदमी की जिंदगी का क्रम होता है।
माना जाता है तुलसीदास ने चालीसा की रचना मानस से पूर्व किया था।
हनुमान को गुरु बनाकर उन्होंने राम को पाने की शुरुआत की।
अगर आप सिर्फ हनुमान चालीसा पढ़ रहे हैं तो यह आपको भीतरी शक्ति तो दे रही है लेकिन अगर आप इसके अर्थ में छिपे जिंदगी के सूत्र समझ लें तो आपको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता दिला सकते हैं।
हनुमान चालीसा सनातन परंपरा में लिखी गई पहली चालीसा है शेष सभी चालीसाऐं इसके बाद ही लिखी गई।
हनुमान चालीसा की शुरुआत से अंत तक सफलता के कई सूत्र हैं।
आइए जानते हैं हनुमान चालीसा से आप अपने जीवन में क्या-क्या बदलाव ला सकते हैं….
शुरुआत गुरु से…

हनुमान चालीसा की शुरुआत गुरु से हुई है…
श्रीगुरु चरन सरोज रज,
निज मनु मुकुरु सुधारि।
अर्थ - अपने गुरु के चरणों की धूल से अपने मन के दर्पण को साफ करता हूँ।
गुरु का महत्व चालीसा की पहले दोहे की पहली लाइन में लिखा गया है।
जीवन में गुरु नहीं है तो आपको कोई आगे नहीं बढ़ा सकता।
गुरु ही आपको सही रास्ता दिखा सकते हैं।
इसलिए तुलसीदास ने लिखा है कि गुरु के चरणों की धूल से मन के दर्पण को साफ करता हूँ।
आज के दौर में गुरु हमारा मेंटोर भी हो सकता है, बॉस भी।
माता-पिता को पहला गुरु ही कहा गया है।
समझने वाली बात ये है कि गुरु यानी अपने से बड़ों का सम्मान करना जरूरी है।
अगर तरक्की की राह पर आगे बढ़ना है तो विनम्रता के साथ बड़ों का सम्मान करें।
ड्रेसअप का रखें ख्याल…
चालीसा की चौपाई है
कंचन बरन बिराज सुबेसा,
कानन कुंडल कुंचित केसा।
अर्थ - आपके शरीर का रंग सोने की तरह चमकीला है, सुवेष यानी अच्छे वस्त्र पहने हैं, कानों में कुंडल हैं और बाल संवरे हुए हैं।
आज के दौर में आपकी तरक्की इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप रहते और दिखते कैसे हैं।
फर्स्ट इंप्रेशन अच्छा होना चाहिए।
अगर आप बहुत गुणवान भी हैं लेकिन अच्छे से नहीं रहते हैं तो ये बात आपके करियर को प्रभावित कर सकती है।
इसलिए, रहन-सहन और ड्रेसअप हमेशा अच्छा रखें।
आगे पढ़ें - हनुमान चालीसा में छिपे मैनेजमेंट के सूत्र...
सिर्फ डिग्री काम नहीं आती
बिद्यावान गुनी अति चातुर,
राम काज करिबे को आतुर।
अर्थ - आप विद्यावान हैं, गुणों की खान हैं, चतुर भी हैं।
राम के काम करने के लिए सदैव आतुर रहते हैं।
आज के दौर में एक अच्छी डिग्री होना बहुत जरूरी है।
लेकिन चालीसा कहती है सिर्फ डिग्री होने से आप सफल नहीं होंगे।
विद्या हासिल करने के साथ आपको अपने गुणों को भी बढ़ाना पड़ेगा, बुद्धि में चतुराई भी लानी होगी। हनुमान में तीनों गुण हैं, वे सूर्य के शिष्य हैं, गुणी भी हैं और चतुर भी।
अच्छा लिसनर बनें

प्रभु चरित सुनिबे को रसिया,
राम लखन सीता मन बसिया।
अर्थ -आप राम चरित यानी राम की कथा सुनने में रसिक है, राम, लक्ष्मण और सीता तीनों ही आपके मन में वास करते हैं।
जो आपकी प्रायोरिटी है, जो आपका काम है, उसे लेकर सिर्फ बोलने में नहीं, सुनने में भी आपको रस आना चाहिए।
अच्छा श्रोता होना बहुत जरूरी है।
अगर आपके पास सुनने की कला नहीं है तो आप कभी अच्छे लीडर नहीं बन सकते।
कहाँ, कैसे व्यवहार करना है ये ज्ञान जरूरी है
सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा।
अर्थ - आपने अशोक वाटिका में सीता को अपने छोटे रुप में दर्शन दिए।
और लंका जलाते समय आपने बड़ा स्वरुप धारण किया।
कब, कहाँ, किस परिस्थिति में खुद का व्यवहार कैसा रखना है, ये कला हनुमानजी से सीखी जा सकती है।
सीता से जब अशोक वाटिका में मिले तो उनके सामने छोटे वानर के आकार में मिले, वहीं जब लंका जलाई तो पर्वताकार रुप धर लिया।
अक्सर लोग ये ही तय नहीं कर पाते हैं कि उन्हें कब किसके सामने कैसा दिखना है।
अच्छे सलाहकार बनें
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेश्वर भए सब जग जाना।
अर्थ - विभीषण ने आपकी सलाह मानी, वे लंका के राजा बने ये सारी दुनिया जानती है।
हनुमान सीता की खोज में लंका गए तो वहां विभीषण से मिले।
विभीषण को राम भक्त के रुप में देख कर उन्हें राम से मिलने की सलाह दे दी।
विभीषण ने भी उस सलाह को माना और रावण के मरने के बाद वे राम द्वारा लंका के राजा बनाए गए।
किसको, क्हाँ, क्या सलाह देनी चाहिए, इसकी समझ बहुत आवश्यक है।
सही समय पर सही इंसान को दी गई सलाह सिर्फ उसका ही फायदा नहीं करती, आपको भी कहीं ना कहीं फायदा पहुँचाती है।
आत्मविश्वास की कमी ना हो
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही, जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।
अर्थ - राम नाम की अंगुठी अपने मुख में रखकर आपने समुद्र को लाँघ लिया, इसमें कोई अचरज नहीं है।
अगर आपमें खुद पर और अपने परमात्मा पर पूरा भरोसा है तो आप कोई भी मुश्किल से मुश्किल टॉस्क को आसानी से पूरा कर सकते हैं।
आज के युवाओं में एक कमी ये भी है कि उनका भरोसा बहुत टूट जाता है। आत्मविश्वास की कमी भी बहुत है। प्रतिस्पर्धा के दौर में आत्मविश्वास की कमी होना खतरनाक है।
अपने-आप पर पूरा भरोसा रखे।
जय श्री राम 🙏🚩

Thursday, February 29, 2024

स्वास्तिक शब्द का हिंदी अर्थ :~~~

संस्कृत में यह शब्द सु+अस+क से बना है। इसमें सु- का अर्थ है शुभ, अस- का अर्थ है अस्तित्व और क- से तात्पर्य है कर्ता। इस प्रकार स्वास्तिक शब्द का अर्थ हुआ शुभ के अस्तित्व को स्थापित करने वाला। भारत में इसे सौभाग्य का प्रतीक कहा जाता है।

सिंदूर में क्या मिलाकर स्वास्तिक बनाना चाहिए?
इन दिशाओं में देवी देवताओं का वास होता है। अतः उत्तर और पूर्व दिशा में स्वास्तिक बनाना उत्तम माना जाता है। इससे देवी देवता भी प्रसन्न होते हैं। स्वास्तिक का निशान हमेशा हल्दी या सिंदूर से बनाए ।

स्वास्तिक कितने प्रकार के होते हैं? 
मान्यता के अनुसार लाल और पीले रंग के स्वास्तिक चिन्ह को श्रेष्ठ और उत्तम फल प्रदान करने वाला माना गया है. स्वास्तिक में चार रेखाएं होती हैं.

 स्वास्तिक से क्या लाभ होता है?

स्वास्तिक के चिह्न को घर के लिए बहुत शुभ माना जाता है और ऐसा माना जाता है कि किसी भी शुभ काम में स्वास्तिक बनाना शुभता का प्रतीक होता है। पूजा -पाठ से लेकर नए घर में प्रवेश करने तक में स्वास्तिक बनाने से उस काम में सफलता मिलती है और ये समृद्धि को आकर्षित करता है।

मंगल चिह्न : शुभ है स्वास्तिक

स्वास्तिक मन्त्र

स्वस्तिक मंत्र शुभ और शांति के लिए प्रयुक्त होता है। ऐसा माना जाता है कि इससे हृदय और मन मिल जाते हैं। मंत्रोच्चार करते हुए दर्भ से जल के छींटे डाले जाते थे तथा यह माना जाता था कि यह जल पारस्परिक क्रोध और वैमनस्य को शांत कर रहा है। गृहनिर्माण के समय स्वस्तिक मंत्र बोला जाता है। मकान की नींव में घी और दुग्ध छिड़का जाता था। ऐसा विश्वास है कि इससे गृहस्वामी को दुधारु गाएँ प्राप्त हेती हैं एवं गृहपत्नी वीर पुत्र उत्पन्न करती है। खेत में बीज डालते समय मंत्र बोला जाता था कि विद्युत् इस अन्न को क्षति न पहुँचाए, अन्न की विपुल उन्नति हो और फसल को कोई कीड़ा न लगे। पशुओं की समृद्धि के लिए भी स्वस्तिक मंत्र का प्रयोग होता था जिससे उनमें कोई रोग नहीं फैलता था। गायों को खूब संतानें होती थीं।
यात्रा के आरंभ में स्वस्तिक मंत्र बोला जाता था। इससे यात्रा सफल और सुरक्षित होती थी। मार्ग में हिंसक पशु या चोर और डाकू नहीं मिलते थे। व्यापार में लाभ होता था, अच्छे मौसम के लिए भी यह मंत्र जपा जाता था जिससे दिन और रात्रि सुखद हों, स्वास्थ्य लाभ हो तथा खेती को कोई हानि न हो।
पुत्रजन्म पर स्वस्तिक मंत्र बहुत आवश्यक माने जाते थे। इससे बच्चा स्वस्थ रहता था, उसकी आयु बढ़ती थी और उसमें शुभ गुणों का समावेश होता था। इसके अलावा भूत, पिशाच तथा रोग उसके पास नहीं आ सकते थे। षोडश संस्कारों में भी मंत्र का अंश कम नहीं है और यह सब स्वस्तिक मंत्र हैं जो शरीररक्षा के लिए तथा सुखप्राप्ति एवं आयुवृद्धि के लिए प्रयुक्त होते हैं।

मंगल चिह्न : शुभ है स्वास्तिक

भारतीय संस्कृति और धर्म में स्वास्तिकको शुभ माना जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि न केवल हिंदू धर्म, बल्कि कुछ दूसरे धर्मावलंबी भी बडी श्रद्धा और भक्ति भाव से इसे अपने भवनों, दुकानों और प्रतिष्ठानों में लगाते हैं। यहां तक कि विदेश में भी विभिन्न जाति और धर्म को मानने वाले लोग उत्सव के अवसर पर इसे मंगल चिह्न के रूप में बनाते हैं।

मंगलवार को धारण करें महिलाएं -
महिलाएं अपने आभूषणों मसलन हार, कंगन और कुंडलों आदि में इसका प्रयोग करती हैं। पुराण में कहा गया है जो स्त्रियां इस मंगल चिह्न वाले गहने को मंगलवार के दिन धारण करती हैं, उनकी कामनाएं श्री ब्रह्मा जी अवश्य पूरी करते हैं। बाणभट्टके एक ग्रंथ कादंबरी में भी गोबर से स्वास्तिकबनाने का उल्लेख है।

इसके अलावा, हडप्पा व मोहनजोदडो की खुदाई से निकले सिक्कों पर भी स्वास्तिक के मंगल चिह्न बने हुए हैं। चारो पुरुषार्थो को दर्शाता है स्वास्तिकका चिह्न दो तरह से बनाया जाता है। एक सीधा और दूसरा उल्टा। ऐसी मान्यता है कि इसकी चार भुजाएं चार पुरुषार्थो को दर्शाती हैं। ऊपर बाईभुजा धर्म की प्रतीक है और दाहिनी ओर अर्थ, यानी संपत्ति की है।

नीचे बाई ओर काम, संपत्ति तथा दाहिनी ओर की भुजा मोक्ष दर्शाती है। यह इस बात को दर्शाता है कि धर्म की प्रतिष्ठा से ही अर्थ, काम, और मोक्ष की भी प्रतिष्ठा होती है। कहने का मतलब है कि हमारे जीवन में मंगल तभी आ सकता है, जब हम धर्म का पालन करेंगे। सच तो यह है कि संपूर्ण विश्व का कल्याण धर्म की स्थापना से ही हो सकता है। स्वास्तिकका निर्माण अलग-अलग धातुओं और तत्वों से मिलकर होता है। गोबर और मिट्टी से बना स्वास्तिक मंगल कार्यो में बनाना चाहिए। खासकर विवाह, मुंडन, संतान पैदा होने और गोबर्धनपूजा के दिन।
पूजा की विधि-
हिंदू धर्म में स्वास्तिककी पूजा की विधि भी बताई गई है। अमूमन मंगल और वृहस्पतिवार को इसकी पूजा करनी चाहिए। सूरज निकलने से पहले नहा धोकर परिवार सहित स्वास्तिककी विधिपूर्वक पूजा करना फलदाई माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि चावल, लाल डोरा, फूल, पान और सुपारी के साथ पूजन करने से न केवल परिवार की सारी मनोकामनाएंपूरी होती हैं, बल्कि दुखों से भी मुक्ति मिलती है।

शास्त्र के अनुसार अच्छी सेहत, धन और आज्ञाकारी संतान के लिए घर के मुखिया को न केवल स्वास्तिक धारण करना चाहिए, बल्कि उनके मंत्रों का जाप भी करना चाहिए। पूजा के मंत्र वेदों में विश्व कल्याण के लिए हजारों मंत्रों की व्याख्या की गई है। इनमें स्वास्तिक की पूजा करने के लिए भी मंत्र बताए गए हैं। इन मंत्रों का उच्चारण संपूर्ण विश्व के लिए कल्याणकारी माना गया है। इसमें सबसे पहले ज्ञान स्वरूप परमात्मा की स्तुति की गई है। इसमें कहा गया है, हे परमात्मा आप हमारे पिता हैं और मैं आपका पुत्र हूं। जिस तरह से पिता अपने पुत्र की हर समय भलाई के बारे में सोचता रहता है, उसी तरह आप भी हमारी भलाई में लगे रहो।

हर तरह के उत्सवों, यज्ञों आदि के अवसर पर इसके गायन की परंपरा है। प्राचीनकाल से यज्ञ की हवन-वेदी के चारों ओर स्वास्तिक का निर्माण किया जाता रहा है और विधिपूर्वक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। कहते हैं कि इन मंत्रों का उच्चारण करने वाले व्यक्ति में न केवल संकल्प शक्ति दृढ होती है, बल्कि वह साहसी भी होता है। यह प्रतीक और जाप हमें पे्ररणा देते हैं कि हमें केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सबके कल्याण के लिए सोचना और कार्य करना चाहिए।

स्वास्तिक की गरिमा, विदेशों में भी

स्वास्तिक का भारतीय संस्कृति में बडा महत्व है। विघ्नहर्ता गणेश जी की उपासना धन, वैभव और ऎश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ ही शुभ लाभ, और स्वास्तिक की पूजा का भी विधान है। विभिन्न प्रकार के सुख और समृद्धि का प्रतीक स्वास्तिक घर, द्वार, आंगन आदि में प्रत्येक शुभ एवं मांगलिक कार्य के आरम्भ बनाया जाता है। यह मंगल भावना और सुख-सौभाग्य का द्योतक है। इसे सूर्य और विष्णु का प्रतीक माना जाता है। ऋग्वेद में स्वास्तिक के देवता संतृन्त का उल्लेख है। सविन्तृ सूत्र के अनुसार इस देवता को मनोवांछित फलदाता, सम्पूर्ण जगत का कल्याण करने और देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाला कहा गया है। " सिद्धान्तसार " के अनुसार इसे ब्रम्हाण्ड का प्रतीक माना जाता है। इसके मघ्य भाग को विष्णु की नाभि, चारों रेखाओं को ब्रम्हाजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित करने की भावना है। देवताओं के चारों ओर घूमने वाले आभामंडल का चिह्न ही स्वास्तिक के आकार का होने के कारण इसे शास्त्रों में शुभ माना जाता है। तर्क से भी इसे सिद्ध किया जा सकता है।

श्रुति, अनुभूति तथा युक्ति इन तीनों का यह एक-सा प्रतिपादन प्रयागराज में होने वाले संगम के समान है। दिशाएं मुख्यत: चार हैं, खडी और सीधी रेखा खींचकर, जो धन चिह्न (+) जैसा आकार बनता है। यह आकार चारों दिशाओं का द्योतक है, ऎसी मान्यता सर्वत्र है। स्वस्ति का अर्थ है—क्षेम, मंगल अर्थात् शुभता और क अर्थात कारक या करने वाला। इसलिए देवताओं के तेज के रूप में शुभत्व देने वाला स्वास्तिक है। स्वास्तिक को भारत में ही नहीं, अपितु विश्व के कई अन्य देशों में विभिन्न स्वरूपों में मान्यता प्राप्त है।

जर्मनी, यूनान, फ्रांस, रोम, मिस्त्र, ब्रिटेन, अमरीका, सिसली, स्पेन, सीरिया, तिब्बत, चीन, साइप्रस और जापान आदि देशों में भी स्वास्तिक का प्रचलन है। स्वास्तिक की रेखाओं को कुछ विद्वान अग्नि उत्पन्न करने वाली, अश्वत्थ अथवा पीपल की दो लकडियां मानते हैं। प्राचीन मिस्त्र के लोग स्वास्तिक को निर्विवाद रूप में काष्ठ दण्डों का प्रतीक मानते हैं। यज्ञ में अग्नि मंथन के कारण इसे प्रकाश का भी प्रतीक माना जाता है। अधिकांश लोगों की मान्यता है कि स्वास्तिक सूर्य का प्रतीक है। जैन धर्मावलम्बी अक्षत पूजा के समय स्वास्तिक चिह्न बनाकर तीन बिन्दु बनाते हैं। पारसी इसे चतुर्दिक दिशाओं और चारों समय की प्रार्थना का प्रतीक मानते हैं। व्यापारी वर्ग इसे शुभ-लाभ का प्रतीक मानते हैं। बहीखातों में ऊपर की ओर श्री लिखा जाता है। इसके नीचे स्वास्तिक बनाया जाता है।

ऎतिहासिक साक्ष्यों में स्वास्तिक का महत्व भरा पडा है। मोहनजोदडो, हडप्पा, संस्कृति, अशोक के शिलालेखों, रामायण, हरवंश पुराण, महाभारत आदि में इसका अनेक बार उल्लेख मिलता है। दूसरे देशों में स्वास्तिक का प्रचार महात्मा बुद्ध की चरण पूजा से बढा है। तिब्बती इसे अपने शरीर पर गुदवाते हैं और चीन में इसे दीर्घायु और कल्याण का प्रतीक माना जाता है। विभिन्न देशों के रीति-रिवाज के अनुसार पूजा पद्धति में परिवर्तन होता रहता है। सुख, समृद्धि और रक्षित जीवन के लिए ही स्वास्तिक पूजा का विधान है। यह प्रथा हजारों वर्षो पूर्व से चली आ रही है।

स्वास्तिक दर‍असल समृद्धि का सूचक है। संस्कृत में इस शब्द का अर्थ ही होता है समृद्धि या अक्षय जीवन ऊर्जा। स्वास्तिक हज़ारों साल से हिन्दू और बौद्ध परम्परा में इसी प्रतीक के रूप में चला आ रहा है। जर्मनी में नाज़ियों ने स्वास्तिक को पहले अपने पार्टी-चिन्ह के रूप में अपनाया था और बाद में उसे जर्मनी का राजकीय-चिन्ह बना दिया था। तीन सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व की हडप्पा-सभ्यता के स्मारकों की खुदाई में भी बर्तनों और दीवारों पर स्वास्तिक बना हुआ मिला था। इसलिए दुनिया में कोई भी इसे मानवविरोधी या संस्कृतिविरोधी प्रतीक नहीं मानता है।

समृद्धि के प्रतीक के रूप में दुनिया के बहुत से देशों की जातियाँ स्वास्तिक का उपयोग करती रही हैं। ख़ुद अमरीका के बहुत से मूल निवासी भी इसे अपना धार्मिक प्रतीक मानते हैं। यही नहीं बीसवीं शताब्दी के शुरू में, जब यह बात सामने आई थी कि इंडोयूरोपियन जातियाँ एक-दूसरे की सहोदर जातियाँ हैं और आर्य ही उनके पूर्वज थे तो पश्चिमी देशों में स्वास्तिक बहुत लोकप्रिय हो गया था। यह अलग बात है कि जर्मन नाज़ियों ने सबसे पहले उसका व्यापक तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया। कनाडा में तो स्वास्तिक नाम का एक शहर भी है।

लेकिन जैसाकि कभी-कभी होता है, हज़ारों वर्षों की इस परम्परा का बीसवीं शताब्दी के एक दशक ने ही पूरी तरह से मटियामेट कर दिया। इसलिए यहूदियों की नाराज़गी को भी समझा जा सकता है।

बरीस वलख़ोन्स्की ने कहा:

ब्रुकलीन न्यूयार्क का यहूदी बहुल इलाका है। इस इलाके में प्रायः यहूदी-विरोधी कार्रवाइयाँ भी होती रहती हैं। दीवारों पर प्रायः यहूदी विरोधी नारे लिख दिए जाते हैं या स्वास्तिक का चिन्ह बना दिया जाता है। इसलिए शो-केस से स्वास्तिक को हटवाने का काम एकदम उचित था।

यह अलग बात है कि जिस अधिकारी ने यानी स्कॉट स्ट्रिंगर ने यह काम किया उन्होंने सख़्ती से काम लिया और ज़रा भी विनम्रता नहीं दिखाई। इसका कारण शायद उनका यह अज्ञान रहा कि हिन्दू और बौद्ध परम्परा में यही स्वास्तिक एक धार्मिक प्रतीक भी है, तभी तो उन्होंने उसे सभ्यता का अपमान बता दिया।

नाज़ी सैनिकों की वर्दियों पर स्वास्तिक का चिन्ह बने होने के साथ-साथ यह भी लिखा रहता था- ‘Gott mit uns’ यानी ख़ुदा हमारे साथ है। अब न्यूयार्क के अफ़सर इस आधार पर सारी दुनिया में मन्दिर और मस्ज़िद या गिरजे थोड़े ही बन्द करवाएँगे या वे सारे धार्मिक साहित्य पर प्रतिबन्ध थोड़े ही लगाएँगे।

शायद इंटरनेट पर एक ब्लॉगर ने इस बारे में जो लिखा है, वह बात ही एकदम ठीक है। उसका कहना है कि हमें सहिष्णुता से काम लेना चाहिए। यदि किसी को किसी चीज़ से अपमान महसूस होता है तो उस चीज़ से बचने की ज़रूरत है। दुनिया में पहले ही मुसीबतों की कमी नहीं है।
ज्योतिष को अंधविश्वास का प्रतीक मानने वाली एक महिला राजनेता का रसोई घर तो पहले से ही द.-प .(S .W .)में था जो कलह की जड़ था ही;अब उसी क्षेत्र में नल -कूप भी लगवा लिया है.परिणामस्वरूप पहली छमाही क़े भीतर ही ज्येष्ठ पुत्र को आपरेशन का शिकार होना पड़ गया.

चित्र के बारे में
१ .चित्रा-२७ नक्षत्रों में मध्यवर्ती तारा है जिसका स्वामी इंद्र है ,वही इस मन्त्र में प्रथम निर्दिष्ट है.
२ .रेवती -चित्रा क़े ठीक अर्ध समानांतर १८० डिग्री पर स्थित है जिसका देवता पूषा है.नक्षत्र विभाग में अंतिम नक्षत्र होने क़े कारण इसे मन्त्र में विश्ववेदाः (सर्वज्ञान युक्त )कहा गया है.
३ .श्रवण -मध्य से प्रायः चतुर्थांश ९० डिग्री की दूरी पर तीन ताराओं से युक्त है.इसे इस मन्त्र में तार्क्ष्य (गरुण )है.
४ .पुष्य -इसके अर्धांतर पर तथा रेवती से चतुर्थांश ९० डिग्री की दूरी पर पुष्य नक्षत्र है जिसका स्वामी बृहस्पति है जो मन्त्र क़े पाद में निर्दिष्ट हुआ है.

इस प्रकार हम देखते हैं कि धार्मिक अनुष्ठानों में स्वास्तिक निर्माण व स्वस्ति मन्त्र का वाचन पूर्णतयः ज्योतिष -सम्मत है.धर्म का अर्थ ही धारण करना है अर्थात ज्ञान को धारण करने वाली प्रक्रिया ही धर्म है.इस छोटे से स्वस्ति -चिन्ह और छोटे से मन्त्र द्वारा सम्पूर्ण खगोल का खाका खींच दिया जाता है. अब जो लोग इन्हें अंधविश्वास कह कर इनका उपहास उड़ाते हैं वस्तुतः वे स्वंय ही अन्धविश्वासी लोग ही हैं जो ज्ञान (Knowledge ) को धारण नहीं करना चाहते.अविवेकी मनुष्य इस संसार में आकर स्वम्यवाद अर्थात अहंकार से ग्रस्त हो जाते हैं.अपने पूर्व -संचित संस्कारों अर्थात प्रारब्ध में मिले कर्मों क़े फलस्वरूप जो प्रगति प्राप्त कर लेते हैं उसे भाग्य का फल मान कर भाग्यवादी बन जाते हैं और अपने भाग्य क़े अहंकार से ग्रसित हो कर अंधविश्वास पाल लेते हैं.उन्हें यह अंधविश्वास हो जाता है कि वह जो कुछ हैं अपने भाग्य क़े बलबूते हैं और उन्हें अब किसी ज्ञान को धारण करने की आवश्यकता नहीं है.जबकि यह संसार एक पाठशाला है और यहाँ निरंतर ज्ञान की शिक्षा चलती ही रहती है.जो विपत्ति का सामना करके आगे बढ़ जाते हैं ,वे एक न एक दिन सफलता का वरन कर ही लेते हैं.जो अहंकार से ग्रसित होकर ज्ञान को ठुकरा देते हैं,अन्धविश्वासी रह जाते हैं.ज्योतिष वह विज्ञान है जो मनुष्य क़े अंधविश्वास रूपी अन्धकार का हरण करके ज्ञान का प्रकाश करता है.

Sunday, February 25, 2024

वैदिक ज्योतिष में षोडश वर्ग कुंडली महत्त्व -

     
लग्नचक्र या राशीचक्र देखकर ही सही फलादेश संभव होता तो... हमारे आदि ऋषी-मुनि कभी भी "षोडश वर्गीय कुंडली" अथवा "प्राण-दशा" जैसी अति शूक्ष्म एवं जटिल गणनाऔं को खोजने पर अपना बहुमूल्य समय कदापि व्यय नहीं करते ।।

आज जानते हैं..षोडश वर्गीय कुंंडली क्या होती है.

षोडश अर्थात 16 वर्ग का फलित ज्योतिष में विशेष महत्व है, क्यों की कुंडली का सूक्ष्म अध्ययन करने में उनकी ही विशेष भूमिका होती है। आईये सबसे पहले जानें शोडश वर्ग क्या है......

तो पहले गणितीय समझ लीजिए :-

कुंडली के सभी 12 भाव 360 अंश परिधि के होते हैं, यानि आकाश मंडल के 360 अंश के 12 भाग ही कुंडली के 12 भाव हैं। अत: कुंडली का कोई भी एक भाव 30 अंश परिधि का माना जाता है। इन 12 भावों में प्रथम भाव "लग्न" कहलाता है। इस "लग्न" भाव के 30 अंशों के विस्त्रत क्षेत्र को यदि 2 से भाग किया जाये तो प्रत्येक भाग 15-15 अंश का होगा इस डिवीजन की लग्न भाग को होरा लग्न कहते हैं, इसी प्रकार यदि इस 30 अंश के 3 भाग किये जायें तो प्रत्येक भाग 10 अंश का होगा, इसे द्रेष्कांण और इस के लग्न भाग को द्रेष्कांण लग्न कहते हैं। चार भाग किसे जायेंगे तो इसके लग्न को चतुर्थांश कहेंगे। इसी प्रकार 7 भाग करने पर ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌सप्तमांश लग्न, 9 भाग करने पर नवमांश लग्न, 10 भाग करने पर दशमांश लग्न, 12 भाग करने पर द्वादशांश लग्न, तथा 16, 20, 24, 30 और 60 भाग करने पर क्रमशः षोडशांश, विंशांश, चतुर्विंशांश तथा त्रिशांश लग्न आदि कहते हैं।

इस तरह "वैदिक ज्योतिष" में 16 कुंडली बनती है जिसे "षोड़श वर्ग" कहते हैं और ये षोडश चक्र ही जीवन के बिभिन्न पहलुओं के सटीकतम फलादेश करने में सहायक होते हैं।

या ऐसे भी कह सकते हैं कि इन वर्गों के अध्ययन के बिना जन्म कुंडली का विश्लेषण सटीक होता ही नहीं है।

  क्योंकि लग्न कुंडली या राशि कुंडली से मात्र जातक के शरीर, उसकी शूक्ष्म संरचना एवं प्रवृत्ति के बारे में ही जानकारी मिलती है।

षोडश वर्ग कुंडली का प्रत्येक चक्र जातक के जीवन के एक विशिष्ट कारकत्व या घटना के अध्ययन में सहायक होता है। 

जातक के जीवन के जिस पहलू के बारे में हम जानना चाहते हैं, उस पहलू के वर्ग का जब तक हम अध्ययन न करें तो, विश्लेषण अधूरा ही रहता है।

जैसे :- यदि जातक की संपत्ति, संपन्नता या प्रतिष्ठा आदि के विषय में जानना हो, तो जरूरी है कि होरा वर्ग का अध्ययन किया जाए। इसी प्रकार व्यवसाय के बारे में पूर्ण जानकारी के लिए दशमांश चक्र की सहायता ली जाती है। जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं को जानने के लिए षोड़श चक्र कुंडली में से किसी विशेष चक्र का अध्ययन किए बिना फलित गणना में चूक हो सकती है।

षोडश वर्गीय कुंडली में सोलह चक्र बनते हैं, जो जातक के जीवन के विभिन्न पहलुओं की जानकरी देते हैं। वैदिक ज्योतिष- जीवन की किसी भी समस्या का सटीक समय और समाधान खोजने में पूर्ण सक्षम है।
जैसे :-

होरा से संपत्ति , समृद्धि एवं मान प्रतिष्ठा।

द्रेष्काण से भाई-बहन व पराक्रम।

चतुर्थांश से भाग्य, चल एवं अचल संपत्ति। 

सप्तांश से संतान एवं उनकी प्रकृति।

नवमांश से वैवाहिक जीवन व जीवन साथी।

दशमांश से व्यवसाय व जीवन की उपलब्धियां।

द्वादशांश से माता-पिता।

षोडशांश से सवारी एवं सामान्य खुशियां।

विंशांश से पूजा-उपासना और आशीर्वाद।

चतुर्विंशांश से विद्या, शिक्षा, दीक्षा, ज्ञान आदि।

सप्तविंशांश से बल एवं दुर्बलता।

त्रिशांश से दुःख, तकलीफ, दुर्घटना, अनिष्ट।

खवेदांश से शुभ या अशुभ फल।

अक्षवेदांश से जातक का चरित्र।

षष्ट्यांश से जीवन के सामान्य शुभ-अशुभ फल आदि अनेक पहलुओं का सूक्ष्म अध्ययन किया जाता है।

षोडश वर्ग में सोलह वर्ग ही होते हैं, लेकिन इनके अतिरिक्त और चार वर्ग पंचमांश, षष्ट्यांश, अष्टमांश, और एकादशांश भी होते हैं।

पंचमांश से जातक की आध्यात्मिक प्रवृत्ति, पूर्व जन्मो के पुण्य एवं संचित कर्मों की जानकारी प्राप्त होता है।

षष्ट्यांश से जातक के स्वास्थ्य, रोग के प्रति अवरोधक शक्ति, ऋण, झगड़े आदि का विवेचन किया जाता है।

एकादशांश जातक के बिना प्रयास के धन लाभ को दर्शाता है। यह वर्ग पैतृक संपत्ति, शेयर, सट्टे आदि के द्वारा स्थायी धन की प्राप्ति की जानकारी देता है।

अष्टमांश से जातक की आयु एवं आयुर्दाय के विषय में जानकारी मिलती है।

षोडश वर्ग में सभी वर्ग महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आज के युग में जातक धन, पराक्रम, भाई-बहनों से विवाद, रोग, संतान वैवाहिक जीवन, साझेदारी, व्यवसाय, माता-पिता और जीवन में आने वाले संकटों के बारे में अधिक प्रश्न करता है।
इन प्रश्नों के विश्लेषण के लिए सात वर्ग होरा, द्रेष्काण, सप्तांश, नवांश, दशमांश, द्वादशांश और त्रिशांश ही पर्याप्त हैं।

।। आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो ।।

               🙏 धन्यवाद 🙏

Saturday, February 24, 2024

10 महाविद्या: हर संकट से तुरंत उबारती हैं ये महाविद्याएं, जानिए उपासना का महत्व और मंंत्र
हमारे शास्त्रों में दस महाविद्याओं का उल्लेख किया गया है। तंत्र क्रिया में विद्या में इन 10 महाविद्याओं का विशेष महत्व होता है। इन 10 विद्याओं की साधना और उपासना से विशेष फल की प्राप्ति होती है। ये महाविद्याओं को दशावतार माना गया है। 10 महाविद्याएं मां दुर्गा के ही रूप है जिसे सिद्धि देने वाली मानी जाती है। मां दुर्गा के इन दस महाविद्याओं की साधना करने वाला व्यक्ति सभी भौतिक सुखों को प्राप्त कर बंधन से भी मुक्त हो जाता है। मां को प्रसन्न करने के लिए तांत्रिक साधकों द्वारा यह पूजा की जाती है। ये दस महाविद्याएं इस प्रकार है- काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी व कमला। 
1- काली
सभी 10 महाविद्याओं में काली को प्रथम रूप माना जाता है। माता दुर्गा ने राक्षसों का वध करने के लिए माता ने यह रूप धारण किया था। सिद्धि प्राप्त करने के लिए माता के इस रूप की पूजा की जाती है। जिस तरह से भगवान शिव जल्दी प्रसन्न और जल्द रूठने वाले देवता है उसी तरह काली माता भी स्वभाव है। इसलिए जो भी भक्त इनकी साधना कर चाहता है उसे एकनिष्ठ और पवित्र मन का होना चाहिए। देवताऔं और दानवों के बीच हुए युद्ध में मां काली ने ही देवताओं को विजय दिलवाई थी। मुख्य बातें-
- दस महाविद्या में काली प्रथम रूप है।

हमारे शास्त्रों में दस महाविद्याओं का उल्लेख किया गया है। तंत्र क्रिया में विद्या में इन 10 महाविद्याओं का विशेष महत्व होता है। इन 10 विद्याओं की साधना और उपासना से विशेष फल की प्राप्ति होती है। ये महाविद्याओं को दशावतार माना गया है। 10 महाविद्याएं मां दुर्गा के ही रूप है जिसे सिद्धि देने वाली मानी जाती है। मां दुर्गा के इन दस महाविद्याओं की साधना करने वाला व्यक्ति सभी भौतिक सुखों को प्राप्त कर बंधन से भी मुक्त हो जाता है। मां को प्रसन्न करने के लिए तांत्रिक साधकों द्वारा यह पूजा की जाती 

ये दस महाविद्याएं इस प्रकार है- काली, तारा, छिन्नमस्ता, षोडशी, भुवनेश्वरी, त्रिपुर भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी व कमला। 
1- काली
सभी 10 महाविद्याओं में काली को प्रथम रूप माना जाता है। माता दुर्गा ने राक्षसों का वध करने के लिए माता ने यह रूप धारण किया था। सिद्धि प्राप्त करने के लिए माता के इस रूप की पूजा की जाती है। जिस तरह से भगवान शिव जल्दी प्रसन्न और जल्द रूठने वाले देवता है उसी तरह काली माता भी स्वभाव है। इसलिए जो भी भक्त इनकी साधना कर चाहता है उसे एकनिष्ठ और पवित्र मन का होना चाहिए। देवताऔं और दानवों के बीच हुए युद्ध में मां काली ने ही देवताओं को विजय दिलवाई थी। कोलकाता, उज्जैन और गुजरात में महाकाली के जाग्रत चमत्कारी मंदिर हैं।
मुख्य बातें-
- दस महाविद्या में काली प्रथम रूप है।
- माता का स्वरूप हाथ में त्रिशूल और तलवार
- पूजा के लिए विशेष दिन शुक्रवार और अमावस्या
- कालिका पुराण में इनका विस्तार से वर्णन किया गया है
- काली को ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा के प्रसन्न किया जा सकता है।
- कोलकाता, उज्जैन और गुजरात में महाकाली के जाग्रत चमत्कारी मंदिर हैं।
 
2- तारा
सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ठ ने तारा की आराधना की थी। यह तांत्रिकों की मुख्य देवी हैं। देवी के इस रूप की आराधना करने पर आर्थिक उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में तारापीठ है इसी स्थान पर देवी तारा की उपासना महर्षि वशिष्ठ ने करके तमाम सिद्धियां हासिल की थी। तारा देवी का दूसरा प्रसिद्ध मंदिर हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में स्थित है।
मुख्य बातें-
- चैत्र मास की नवमी तिथि और शुक्ल पक्ष के दिन तंत्र साधकों के लिए सर्वसिद्धिकारक माना गया है।
- तारा मां को जगृति करने के लिए ऊँ ह्नीं स्त्रीं हुम फट' मंत्र का जाप कर सकते हैं।
- परेशनियों को दूर करने के कारण इन्हें तारने वाली माता तारा कहा जाता हैत्रिपुर सुंदरी
इन्हें ललिता, राज राजेश्वरी और त्रिपुर सुंदरी भी कहते हैं। त्रिपुरा में स्थित त्रिपुर सुंदरी का शक्तिपीठ है। यहां पर माता की चार भुजा और 3 नेत्र हैं। नवरात्रि में रुद्राक्ष की माला से ऐं ह्नीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम: मंत्र का जाप कर सकते हैं।
मुख्य बातें-
- इनकी चार भुजा और तीन नेत्र हैं।
- ऐ ह्नीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम: मंत्र का जाप कर सकते हैं।
 
4- भुवनेश्वरी
पुत्र प्राप्ति के लिए माता भुवनेश्वरी की आराधना फलदायी मानी जाती है। यह शताक्षी और शाकम्भरी नाम से भी जानी जाती है। इस महाविद्या की आराधना से सूर्य के समान तेज ऊर्जा प्राप्ति होती है और जीवन में मान सम्मान मिलता है।

मंत्र- ह्नीं भुवनेश्वरीयै ह्नीं नम:- छिन्नमस्ता
इनका स्वरूप कटा हुआ सिर और बहती हुई रक्त की तीन धाराएं से सुशोभित रहता है। इस महाविद्या की उपासना शांत मन से करने पर शांत स्वरूप और उग्र रूप में उपासना करने पर देवी के उग्र रूप के दर्शन होते है। छिन्नमस्तिके का यह मंदिर झारखंड की राजधानी रांची में स्थिति है। कामाख्या के बाद यह दूसरा सबसे लोकप्रिय शक्तिपीठ है।
मंत्र- 
 'श्रीं ह्नीं ऎं वज्र वैरोचानियै ह्नीं फट स्वाहा
6-भैरवी
भैरवी की उपासना से व्यक्ति सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है। इनकी पूजा से व्यापार में लगातार बढ़ोतरी और धन सम्पदा की प्राप्ति होती है। 
मंत्र- ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:
7-धूमावती
धूमावती माता को अभाव और संकट को दूर करने वाली माता कहते है। इनका कोई भी स्वामी नहीं है। इनकी साधना से व्यक्ति की पहचान महाप्रतापी और सिद्ध पुरूष के रूप में होती है। ऋग्वेद में इन्हें 'सुतरा' कहा गया है।

मंत्र- ऊँ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:
8- बगलामुखी
बगलामुखी की साधना दुश्मन के भय से मुक्ति और वाक् सिद्धि के लिए की जाती है। जो साधक नवरात्रि में इनकी साधना करता है वह हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है। महाभारत के युद्ध में कृष्ण और अर्जुन ने कौरवों पर विजय हासिल करने के लिए माता बगलामुखी की पूजा अर्चना की थी। भारत में मां बगलामुखी के तीन प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर माने गए हैं।

मंत्र-
- ऊँ ह्नीं बगुलामुखी देव्यै ह्नीं ओम नम:' 
- 'ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ॐ स्वाहा
 
9- मातंगी
जो भक्त अपने गृहस्थ जीवन को सुखमय और सफल बनाना चाहते हैं उन्हें मां मातंगी की आराधना करना चाहिए। मतंग भगवान शिव का भी एक नाम है। जो भक्त मातंगी महाविद्या की सिद्धि प्राप्त करता है वह अपने खेल, कला और संगीत के कौशल से दुनिया को अपने वश में कर लेता है।

मंत्र- ऊँ ह्नीं ऐ भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:
10- कमला
मां कमला की साधना समृद्धि, धन, नारी, पुत्र की प्राप्ति के लिए की जाती है। इनकी साधना से व्यक्ति धनवान और विद्यावान हो जाता है।

मंत्र- हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा:
जन्म कुंडली के अनुसार विवाह की उम्र की गणना मैं पहले पोस्ट किया था परंतु उसमें और प्रमाणिक गणना करने के लिए आज हम हस्तरेखा का भी सहयोग लेंगे ।
👉 हस्तरेखा की जो तस्वीर पोस्ट की गई है उसमें जो हरे ( green )रंग का बॉक्स बना है वह बुध पर्वत पर बना है । हृदय रेखा से लेकर कनिष्ठा उंगली के प्रारंभ होने के स्थान तक का जो स्थान है उसे 50 वर्ष माना जाता है । इन दोनों को दो भाग में विभाजित करने से 25 - 25 वर्ष का योग बनेगा । यदि हृदय रेखा से ऊपर जहां 25 लिखा है उसके ऊपर यदि विवाह रेखा है तो 25 वर्ष के बाद विवाह का योग बनेगा यदि 25 वर्ष के ऊपर के बीच से भाग दिया जाए तो वह लगभग 32 वर्ष के आसपास का उम्र बनेगा इसके अनुसार आप अपने हस्तरेखा में 2 - 3 भाग में विभाजित करके विवाह की उम्र निकाल सकते हैं ।
👉 कई व्यक्तियों की विवाह रेखा के स्थान पर दो तीन रेखाएं बनी रहती है उनमें से जो सबसे साफ स्पष्ट रेखा होगी उसे ही विवाह रेखा माना जाएगा ।
🔹🔹🔹🔹🔹
💢 सामान्य मान्यता के अनुसार विवाह का समय
💥 आधुनिक समय के अनुसार
जल्दी विवाह करवाने वाले ग्रहों के वर्ष  को और विलंब से समझना  चाहिए जो कि सरकारी मान्यता के अनुसार नियम है । यह विवाह का समय पूर्व में लिखे गए ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार है । 40 -  50 वर्ष पूर्व बहुत कम उम्र में विवाह होता था परंतु समय के अनुसार परिवर्तन होता रहता है । 
💥आज के समय में दिए गए उम्र से दो-तीन वर्ष बढ़ाकर मानें  । एवं सरकार के नियम के अनुसार 21 वर्ष के बाद ही विवाह का समय मानें । 

♦️बुध सप्तमेश हो तो 16 से 18 वर्ष की आयु में 
♦️ मंगल सप्तमेश हो तो 18 से 20 वर्ष की आयु में 
♦️ शुक्र हो तो 20 से 22 वर्ष की आयु में 
♦️ चंद्रमा हो तो 22 से 24 वर्ष की आयु में 
♦️ गुरु हो तो 24 से 26 वर्ष की आयु में 
♦️ सूर्य हो तो 26 से 28 वर्ष की आयु में 
♦️ शनि हो तो 28 से 30 वर्ष की आयु में 

💢सप्तमेश कम आयु में विवाह करने वाला ग्रह हो परंतु सप्तम भाव पर राहु ,  केतु , शनि जैसे  विलंब से  विवाह करवाने वाले ग्रहों की  दृष्टि या प्रभाव हो तो  30 - 32 वर्ष के बाद विवाह का योग बनता है । 💢

👉  यदि सप्तमेश , शुक्र या गुरु बिल्कुल कमजोर हो एवं सप्तम भाव पर एक से ज्यादा विलंब करवाने वाले ग्रहों का प्रभाव हो तब  विवाह में बहुत ज्यादा विलंब हो जाता है ।
👉 विवाह का समय आने पर शुक्र , गुरु  , सप्तमेश ,  द्वितीयेश या सप्तम भाव में मित्र ग्रह की दृष्टि या विराजमान ग्रह  की अंतर्दशा - प्रत्यंतर दशा में  विवाह का योग बनता है ।
🔹🔹🔹🔹🔹
💥 कुंडलि या हाथ का फोटो कमेंट में ना चिपकाए ।  आप स्वयं देखकर अपने हाथ से मिलान करें अध्ययन करें ।
🔹🔹🔹🔹🔹

Thursday, February 22, 2024

मिथुन लग्न – प्रथम भाव में शनि 

मिथुन राशि शनि देव की मित्र राशि है । अतः शनि की महादशा में भाग्य पूर्ण साथ देता है, प्रोफेशन में उन्नति होती है । छोटे भाई बहन , पत्नी, बिज़नेस पार्टनर से लाभ मिलता है । विवाह के बाद प्रोफेशनल लाइफ और बेहतर होती है । 

मिथुन लग्न – द्वितीय भाव में शनि 

ऐसे जातक को धन , परिवार कुटुंब का भरपूर साथ मिलता है । जातक उत्तम वाणी वाला एवं न्यायप्रिय बात करता है । माता , मकान, वाहन , भूमि का सुख प्राप्तकरता है । रुकावटें दूर होती हैं , बड़े भाई बहनों का साथ मिलता है। 

मिथुन लग्न – तृतीय भाव में शनि 

जातक बहुत परिश्रमी होता है । जातक का भाग्य बहुत परिश्रम के बाद ही उसका साथ देता है ।। छोटी बहन का योग बनता है । पेट खराब , कमजोर याददाश्त , क्षीण संकल्प , संतान को अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है । पिता से नहीं बनती , फिजूल खर्च व् विदेश यात्रा होती है । 

मिथुन लग्न – चतुर्थ भाव में शनि 

जातक को भूमि , मकान , वाहन का सुख मिलता है । काम काज शनि देव से जुड़ा हो तो बेहतर स्थिति में होता है । प्रतियोगिता में विजयश्री हाथ आती है , कोर्टकेस में जीत होती है । 

मिथुन लग्न – पंचम भाव में शनि 

पुत्री का योग बनता है । अचानक लाभ की स्थिति बनती है । जातक की याददाश्त बहुत बेहतर होती है । प्रेम विवाह का योग बनता है । पत्नी , पार्टनर्स से संबंधमधुर रहते हैं । बड़े भाइयों बहनो से संबंध मधुर रहते हैं, मनचाहे काम के पूरा होने का योग बनता है । धन , कुटुंब का सहयोग रहता है । 

मिथुन लग्न – षष्टम भाव में शनि 

यदि लग्नेश बुद्ध बलवान हों और शुभ स्थित भी हों तो विपरीत राजयोग बनता है और अधिकतर परिणाम शुभ ही प्राप्त होते हैं । यदि बुद्ध कमजोर हों या शुभ स्थित नहों तो बहुत मेहनत करने पर भी परिणाम नकारात्मक रहते हैं । लोन वापसी का रास्ता नहीं दिखता , फिजूल व्यय , हर काम में रुकावट आती है । 

मिथुन लग्न – सप्तम भाव में शनि 

भार्या बुद्धिमान होती है व् साझेदारों से लाभ मिलता है । जातक पितृ भक्त, न्यायप्रिय होता है , भाग्य साथ देता है , मकान, वाहन, सम्पत्ति का सुख मिलता है औरमाता का आशीर्वाद हमेशा सर पर बना रहता है । 

मिथुन लग्न – अष्टम भाव में शनि 

जातक के हर काम में रुकावट आती है , टेंशन बनी रहती है । परिवार साथ नहीं देता है । काम काज ठप हो जाता है । संतान को/से कष्ट मिलता है । याददाश्त कमजोर हो जाती है । विपरीत राजयोग की स्थिति में परिणाम शुभ जान्ने चाहियें । 

मिथुन लग्न – नवम भाव में शनि 

स्वग्रही होने से ऐसा जातक पितृ भक्त , भाग्यवान होता है । जातक बहुत परिश्रमी होता है , प्रतियोगिता में विजयी होता है । विदेश यात्राएं करने वाला होता है । 

मिथुन लग्न – दशम भाव में शनि 

जातक का काम काज बहुत अच्छा चलता है । विदेश सेटलमेंट का योग बनता है । भूमि, मकान, वाहन का सुख मिलता है । सातवें भाव सम्बन्धी सभी लाभ प्राप्तहोते हैं ।

मिथुन लग्न – एकादश भाव में शनि 

नीच राशि मेष में आने से जातक न्याय का साथ देने वाला नहीं होता है । यहां स्थित होने पर बड़े भाई बहनो से क्लेश बना रहता है । पुत्री प्राप्ति का योग बनता है, यादाश्त बहुत कमजोर होती है, संकल्प शक्ति मजबूत नहीं होती है। रुकावटों दूर होने का नाम नहीं लेती हैं । 

मिथुन लग्न – द्वादश भाव में शनि 

विदेश सेटलमेंट का योग बनता है, काम काज ठप हो जाता है , कोर्ट केस चलता है, फिजूल खर्च होते है । परिवार का साथ नहीं मिलता, वाणी बहुत खराब होतीहै। जातक नास्तिक होता है , पिता से रुष्ट रहता है । 

जानिए भगवान विष्णु के श्री हरि और नरायण नामों का रहस्य...

संसार के पालनहार भगवान विष्णु की विशेष पूजा गुरुवार को की जाती है। इस दिन भक्त पूरे विधि – विधान के साथ भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार गुरुवार को भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करने से जीवन के सभी संकटों से छुटकारा मिलता है। साथ ही वैवाहिक जीवन में खुशहाली आती है।

पुराणों में भगवान विष्णु के दो रूप बताए गए हैं। एक रूप में तो उन्हें बहुत शांत, प्रसन्न और कोमल बताया गया है और दूसरे रूप में प्रभु को बहुत भयानक बताया गया है। श्रीहरि, काल स्वरूप शेषनाग पर आरामदायक मुद्रा में बैठे हैं। कहा जाता है कि भगवान विष्णु का शांत चेहरा कठिन परिस्थितियों में व्यक्ति को शांत रहने की प्रेरणा देता है। भगवान विष्णु का मानना है कि समस्याओं का समाधान शांत रहकर ही सफलतापूर्वक ढूंढा जा सकता है।

भगवान विष्णु के 'हरि' नाम का रहस्य
भगवान विष्णु को 'हरि' नाम से भी बुलाया जाता है। हरि की उत्पत्ति हर से हुई है। "हरि हरति पापानि" का अर्थ है - हरि भगवान हमारे जीवन में आने वाली सभी समस्याओं और पापों को दूर करें। इसीलिए भगवान विष्णु को हरि भी कहा जाता है, क्योंकि सच्चे मन से श्रीहरि का स्मरण करने वालों को कभी निराशा नहीं मिलती। कष्ट और दु:ख चाहे जितने भी हो, श्रीहरि सब हर लेते हैं।

भगवान विष्णु के 'नारायण' नाम का रहस्य
भगवान विष्णु अपने भक्तों पर हर रूप और हर स्वरूप से कृपा बरसाते हैं और इसीलिए वो जगत के पालनहार कहलाते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान विष्णु का नाम नारायण क्यों है? उनके भक्त उन्हें नारायण क्यों बुलाते हैं? एक पौराणिक कथा के अनुसार पानी का जन्म भगवान विष्णु के पैरों से हुआ है। पानी को नीर या नर भी कहा जाता है।
भगवान विष्णु भी जल में ही निवास करते हैं। इसलिए नर शब्द से उनका नारायण नाम पड़ा है। इसका अर्थ ये है कि पानी में भगवान निवास करते हैं। इसीलिए भगवान विष्णु को उनके भक्त 'नारायण' नाम से बुलाते हैं।
♦️भूमि, भवन, वाहन, पशु एवं भाग्य योग♦️

♦️(1) यदि चतुर्थेश और नवमेश मिलकर लग्न में स्थित हों तो जातक को वाहन, भूमि, भवन पशु एवं भाग्य की प्राप्ति होती है।

♦️(2) यदि गुरु चतुर्थ भाव को देखे अथवा उसमें स्थित हो तो जातक को बहुत सुख की प्राप्ति होती है और धीरे-धीरे जातक भूमि, भवन, वाहन आदि का मालिक बन जाता है।

♦️(3) यदि चतुर्थ भाव का स्वामी और गुरु किसी केन्द्र अथवा त्रिकोण स्थान में इकट्ठे हों तो जातक सुखी जीवन एवं भूमि, भवन, वाहन आदि को पाता है।

♦️(4) वाहन कारक शुक्र चतुर्थ भाव के स्वामी के साथ चतुर्थ भाव में स्थित हो तो वाहन,भूमि, मकान आदि की सुगम रूप से प्राप्ति होती है।

♦️ (5) यदि चतुर्थ भाव का स्वामी और शुक्र दोनों एकादश नवम अथवा दशम भाव में स्थित हो तो विशेष रूप से अच्छे वाहन की प्राप्ति होती है।

♦️ (6) यदि चतुर्थ भाव के स्वामी की युति अथवा दृष्टि आदि द्वारा चन्द्रमा से सम्बन्ध हो तो टांगा आदि ऐसे वाहन की प्राप्ति होती है जिसमें अश्व का उपयोग होता हो।

♦️ (7) कर्क लग्न हो और बुध, शुक्र चतुर्थ भाव में स्थित हों तो बुध और की दशा में शत्रु ग्रह शत्रु की भुक्ति में जातक को वाहन, भूमि आदि की प्राप्ति होती है।

♦️ (8) यदि चतुर्थ भाव में बृहस्पति स्थित हों तो जातक को घोड़े की सवारी प्रिय होती है।

♦️ (9) यदि चतुर्थेश लाभ स्थान में हो और लाभेश चतुर्थ स्थान में हो तो भाग्य वाहन योग सिद्ध होता है।

♦️(10) यदि पांचवें भाव का स्वामी नवम भाव में हो और यदि नवम भाव का स्वामी दशम भाव में हो तो जातक की कुण्डली में भाग्य, वाहन योग सिद्ध होता है।
वास्तु दोष का प्रभाव कम करने के लिए दिशा अनुसार मंत्रोच्चार -

आजकल शायद ही कोई ऐसा घर हो जो वास्तु दोष से मुक्त हो। वास्तु दोष का प्रभाव कई बार देर से होता है तो कई बार इसका प्रभाव शीघ्र असर दिखने लगता है।
इसका कारण यह है कि सभी दिशाएं किसी न किसी ग्रह और देवताओं के प्रभाव में होते हैं। जब किसी मकान मालिक ( जिसके नाम पर मकान हो) पर ग्रह विशेष की दशा चलती है तब जिस दिशा में वास्तु दोष होता है उस दिशा का अशुभ प्रभाव घर में रहने वाले व्यक्तियों पर दिखने लगता है।

आज में आपको सभी दिशाओं के दोष को दूर करने का सबसे आसान तरीका बता रहा हूँ।। इन मंत्र जप के प्रभाव स्वरूप (फलस्वरूप) आप काफी हद तक अपने वस्तुदोषो से मुक्ति प्राप्त कर पायेंगें ।। ध्यान रखें मन्त्र जाप में में आस्था और विश्वास अति आवश्य हैं। यदि आप सम्पूर्ण भक्ति भाव और एकाग्रचित्त होकर इन मंत्रो को जपेंगें तो निश्चित ही लाभ होगा।। देश- काल और मन्त्र सधाक की साधना(इच्छा शक्ति) अनुसार परिणाम भिन्न भिन्न हो सकते हैं।।

ईशान दिशा -

इस दिशा के स्वामी बृहस्पति हैं। और देवता हैं भगवान शिव। इस दिशा के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए नियमित गुरू मंत्र ' ॐ बृं बृहस्पतये नमः’ मंत्र का जप करें। शिव पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय का 108 बार जप करना भी लाभप्रद होता है।

पूर्व दिशा -

घर का पूर्व दिशा वास्तु दोष से पीड़ित है तो इसे दोष मुक्त करने के लिए प्रतिदिन सूर्य मंत्र ‘ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः’ का जप करें। सूर्य इस दिशा के स्वामी हैं। इस मंत्र के जप से सूर्य के शुभ प्रभावों में वृद्घि होती है। व्यक्ति मान-सम्मान एवं यश प्राप्त करता है। इन्द्र पूर्व दिशा के देवता हैं। प्रतिदिन 108 बार इंद्र मंत्र ‘ॐ इन्द्राय नमः’ का जप करना भी इस दिशा के दोष को दूर कर देता है।।

आग्नेय दिशा -

इस दिशा के स्वामी ग्रह शुक्र और देवता अग्नि हैं। इस दिशा में वास्तु दोष होने पर शुक्र अथवा अग्नि के मंत्र का जप लाभप्रद होता है। शुक्र का मंत्र है ‘ॐ शुं शुक्राय नमः’। अग्नि का मंत्र है ‘ॐ अग्नेय नमः’। इस दिशा को दोष से मुक्त रखने के लिए इस दिशा में पानी का टैंक, नल, शौचालय अथवा अध्ययन कक्ष नहीं होना चाहिए।

दक्षिण दिशा -

इस दिशा के स्वामी ग्रह मंगल और देवता यम हैं। दक्षिण दिशा से वास्तु दोष दूर करने के लिए नियमित ‘ॐ अं अंगारकाय नमः’ मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए। यह मंत्र मंगल के कुप्रभाव को भी दूर कर देता है। ‘ॐ यमाय नमः’ मंत्र से भी इस दिशा का दोष समाप्त हो जाता है।

नैऋत्य दिशा -

इस दिशा के स्वामी राहु ग्रह हैं। घर में यह दिशा दोषपूर्ण हो और कुण्डली में राहु अशुभ बैठा हो तो राहु की दशा व्यक्ति के लिए काफी कष्टकारी हो जाती है। इस दोष को दूर करने के लिए राहु मंत्र ‘ॐ रां राहवे नमः’ मंत्र का जप करें। इससे वास्तु दोष एवं राहु का उपचार भी उपचार हो जाता है।

पश्चिम दिशा -

यह शनि की दिशा है। इस दिशा के देवता वरूण देव हैं। इस दिशा में किचन कभी भी नहीं बनाना चाहिए। इस दिशा में वास्तु दोष होने पर शनि मंत्र ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ का नियमित जप करें। यह मंत्र शनि के कुप्रभाव को भी दूर कर देता है।

वायव्य दिशा -

चन्द्रमा इस दिशा के स्वामी ग्रह हैं। यह दिशा दोषपूर्ण होने पर मन चंचल रहता है। घर में रहने वाले लोग सर्दी जुकाम एवं छाती से संबंधित रोग से परेशान होते हैं। इस दिशा के दोष को दूर करने के लिए चन्द्र मंत्र ‘ॐ चन्द्रमसे नमः’ का जप लाभकारी होता है।

उत्तर दिशा -

यह दिशा के देवता धन के स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा बुध ग्रह के प्रभाव में आता है। इस दिशा के दूषित होने पर माता एवं घर में रहने वाले स्त्रियों को कष्ट होता है।। माता एवं घर में रहने वाले स्त्रियों को कष्ट होता है। आर्थिक कठिनाईयों का भी सामना करना होता है। इस दिशा को वास्तु दोष से मुक्त करने के लिए ‘ॐ बुधाय नमः या ‘ओम कुबेराय नमः’ मंत्र का जप करें। आर्थिक समस्याओं में कुबेर मंत्र का जप अधिक लाभकारी होता है। 

।। आपका आज का दिन शुभ मंगलमय हो ।।

                 🙏 धन्यवाद 🙏
यदि जन्म विवरण सही है तो मात्र लग्न कुंडली से सभी समस्याओं के विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

♦️विवाह के लिए सप्तम भाव द्वितीय भाव एवं गुरु या शुक्र को देखा जाता है ।
👉 सप्तम भाव एवं द्वितीय भाव के स्वामी मंगल उच्च राशि में विराजमान है एवं सप्तम भाव में स्वराशि में दृष्टि भी डाल रहे हैं । 
परंतु मंगल  – राहु ,  केतु , शनि से पीड़ित है ।  वैवाहिक जीवन में समस्या का सबसे बड़ा कारण है । यदि सप्तम भाव या सप्तमेश पर  राहु – शनि का प्रभाव हो तो विवाह में बहुत ज्यादा विलंब होता है
👉 और सप्तम भाव में विलंब करवाने वाले ग्रह शनि स्वयं विराजमान है एवं द्वितीय भाव में सूर्य भी राहु से पीड़ित है अर्थात द्वितीय भाव भी पीड़ित माना जाएगा । 
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ऐसे योग में 30 – 32  वर्ष  के पहले विवाह होना मुश्किल है और यदि इसके पहले विवाह हो जाता है तो ज्यादातर देखा गया है कि दो विवाह का योग बन जाता है । 
💥और विवाह का समय जानने के लिए जन्म कुंडली के साथ हस्तरेखा में भी विवाह रेखा की स्थिति को देखना आवश्यक है । क्योंकि पहले के समय में जो ग्रहों के अनुसार विवाह के समय की गणना की गई है आज में बहुत अंतर है । जैसे पहले ग्रहों के अनुसार गणना करके 16 वर्ष में भी विवाह का योग बताया गया था और उस समय होता भी था । परंतु आज तो किसी का नहीं होता है ।
 ♦️अब कोई भी उपाय करके वैवाहिक जीवन के समय को आगे पीछे नहीं किया जा सकता है ।
👉 उपाय करने से वैवाहिक जीवन में जो समस्या का योग बन रहा है अर्थात की विवाह होने के बाद जो परेशानी , मतभेद , विच्छेद इत्यादि का योग बन रहा है उसका समाधान किया जा सकता है । 
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